संस्करण विवरण:
फॉर्मेट : हार्डबैक | पृष्ठ संख्या : 176 | प्रकाशक : राजकमल प्रकाशन
पहला वाक्य :
मेरे हमसफर,
किसी ने पूछा था – यह सड़क कहाँ जाती है?
कहानी
रिचर्ड और मनु की मुलाकात एक नाटक के रिहर्सल के दौरान हुई। फिर दोनों में आकर्षण हुआ और फिर प्यार। रिचर्ड एक पादरी था जो अक्सर भारत आया करता था। वो दुनिया भर में घूमा करता था। हाँ, एक बात और थी। दोनों ही शादी शुदा थे।
उनकी ज़िन्दगी में आगे क्या हुआ? रिचर्ड और मनु के इस रिश्ते का उनके शादीशुदा जीवन पर क्या असर पड़ा?
विचार
मृदुला गर्ग का उपन्यास ‘चित्तकोबरा’ पहली बार 1979 में प्रकाशित हुआ था। यानी आज से सैंतीस साल पहले। इतने वर्षों में काफी कुछ बदला है लेकिन विवाह के बाहर के संबंध आज भी गलत नज़रिए से देखे जाते हैं। पूरा समाज जज बन जाता है और संबंध में जाने वाला इंसान मुजरिम। उस वक्त क्या स्थिति रही होगी ये सोचना ही मेरे लिए काफी मुश्किल है।
मैं अक्सर सोचता हूँ ऐसे संबंध क्यों बनते हैं। अगर लोग अपने पार्टनर से खुश नहीं है तो वो उन्हें छोड़ क्यों नहीं देते और अगर खुश हैं तो फिर इन संबंधों का क्या कारण है। क्या ये है की शादी इंसान के लिए एक अप्राकृतिक चीज़ है?
उपन्यास की बात करें तो इस उपन्यास के घटनाक्रम को मनु के दृष्टिकोण से दिखलाया गया है। उपन्यास की शुरुआत में जब वो अपने और रिचर्ड के विषय में बता रही होती है तो मेरा ध्यान इस बात पे ज्यादा था कि मनु के पति और रिचर्ड की पत्नी के ऊपर इनके रिश्ते का क्या असर पड़ रहा होगा। क्या उन्हें उनके इस रिश्ते का पता होगा? देखा जाए तो वो एक तरह से यहाँ विक्टिम थे। फिर जिस तरह से महेश का वर्णन किया रहता है उससे ऐसा प्रतीत नहीं हो रहा था कि महेश एक खराब इंसान था। वो मनु का ख्याल रखता था। ऐसे में आप पढ़ते हुए ये सोचने लगते हो कि आखिर क्या कारण था कि मनु रिचर्ड के प्रति आकर्षित हुई? इसी बात को मृदुला जी ने बढ़ी सुंदरता से दर्शाया है। उपन्यास में जब आपको इस आकर्षण का कारण पता लगता है तो आप मनु को समझने की कोशिश करने लगते हैं।
मनु और रिचर्ड दोनों आम इंसान हैं। वो न समाज से लड़ना चाहते हैं और न ही अपने अपनी शादी ही तोड़ना चाहते हैं। इसके पीछे उनके अपने अपने कारण भी हैं।
उनके उठाये गये यह कदम उनकी निगाह में सही है, भले ही पाठक की निगाह में न हों। इस उपन्यास को पढ़कर रिश्तों को देखने का एक नया दृष्टिकोण पाठक को मिलता है।
हाँ, चूँकि हम कहानी मनु की ज़बानी सुनते हैं तो हमे उसके परिवार के विषय में ज्यादा पता चलता है। रिचर्ड के विषय में जो भी पता रहता है वो केवल मनु के द्वारा या फिर रिचर्ड ने जो मनु को बताया रहता है उससे ही पता लगता है। उसमें सच्चाई कितनी है ये कहना मुश्किल है। रिचर्ड ने अपनी पत्नी की जो तस्वीर मनु के सामने उकेरी है वो भी कितनी सही है इस बात का अंदाजा पाठक को नहीं लगता है। मैं एक आदमी हूँ और ये जानता हूँ की एक आदमी, फिर चाहे वो असल ज़िन्दगी में करे या न करे, लेकिन वो अनेक लड़कियों के साथ होना चाहता है। कई लोग इस भावना को काबू कर लेते हैं लेकिन कई लोग इस फंतासी को पूरा कर देते हैं। इसके लिए कई शादीशुदा मर्द अपनी पत्नी को खलनायिका के तौर पर भी प्रस्तुत करते हैं। यह आम बात है। ऐसे में पढ़ते हुए लगता है कि अगर पाठक को रिचर्ड का दृष्टकोण मिलता तो चीजें और साफ होती। इसका एक कारण ये भी है की मनु के पति और रिचर्ड की पत्नी की प्रतिक्रियायें एक दूसरे से एक दम उलट होती हैं।
उपन्यास के विषय में आखिर में तो यही कहूँगा ये एक जटिल विषय को दर्शाता है। पात्र जीवंत हैं और यथार्थ के काफी नज़दीक हैं। और लेखिका ने पात्रों को छोड़ दिया है। ऐसा लगता नहीं है कि उन्होंने अपनी या समाज की सोच के हिसाब से कहानी को ढालने की कोशिश की है। जैसा की इस तरह की कहानियों में अक्सर देखने को मिलता है।
उपन्यास मुझे बहुत अच्छा लगा। अगर आपने इस उपन्यास को पढ़ा है तो अपनी राय ज़रूर दीजियेगा। अगर आपने इस उपन्यास को नहीं पढ़ा है तो आप इसे निम्न लिंक से मँगवा सकते हैं:
उपन्यास के कुछ अंश :
मैंने अपने पर्स में से छोटा सा आईना निकाला और चाँद के अक्स को उसमें कैद कर लिया। अब नीला घेरा मेरे बहुत करीब था। इतने करीब की हाथ बढाकर मैं उसे छू सकती थी। मैंने हाथ नहीं बढ़ाया। आजकल मैं काफी होशियार हो गई हूँ, सच्चाई पर पड़ी ख्वाब की झीनी चादर खींचा नहीं करती। हाथ बढाऊँ और वह आईने से टकरा जाए.. ख्वाब टूट न जायेगा।
इतनी छातियाँ एक साथ धड़क रही हैं, पर अलग से दिल एक भी नहीं। मरीज की नब्ज-सी हल्की पीली रौशनी ही मौजूं है यहाँ।
आखिर दर्द की असंख्य लकीरों से खुदे, भीगे चेहरे को बिना सँभाले, वह मुस्कुरा दिया। धीरे से।
“सबसे अच्छी बात यह है”, मैंने कहा, “तुम्हें दुःख देकर भी अच्छा लगता है। “
“नहीं,” उसने कहा, “वह नहीं है। सबसे अच्छी बात यह है कि तुम दुःख दे सकती हो। पिछले बत्तीस बरस में कोई मुझे दुःख नहीं दे सका। तुम दे सकी हो। बखूबी। बेपनाह।”
बात मैंने मज़ाक में कही थी। वह हँसा था और मैं भी हँस दी थी। कई बार मज़ाक मज़ाक में हम अनजाने कितना बड़ा सच बोल जाते हैं! पर यह मैंने बहुत बाद में सोचा था। सोचते हम हमेशा बाद में हैं।सच के अनुभव के बाद….
“दुःख मत करना,” उसने कहा, “शायद कोई भी इंसान एक ही समय में एक दूसरे को प्यार नहीं करते…जब एक करता है तो दूसरा नहीं और जब दूसरा करता है… देरी मुझसे हुई, मनु!”
© विकास नैनवाल ‘अंजान’

Sahmat
शुक्रिया।