पुस्तक टिप्पणी: सीक्रेट एजेंट – सुरेन्द्र मोहन पाठक

सीक्रेट एजेंट - सुरेन्द्र मोहन पाठक | नीलेश गोखले | राजा पॉकेट बुक्स

पहला वाक्य:
सुबह ग्यारह बजे का वक़्त था जबकि मुंबई पुलिस हेडक्वाटर्स कि तीसरी मंजिल के एक मिनी कांफ्रेंस रूम जैसे कमरे में एक मिनी कांफ्रेंस ही जारी थी।

कहानी

पुलिस की नौकरी से निष्कासित और कलंकित नीलेश गोखले के सामने एक ऐसे प्रोजेक्ट की पेशकश थी जिसमें उसे एक सीक्रेट एजेंट के बतौर एक ऐसे आइलैंड पर जाना था जहाँ पर लोकल थानेदार का एकछत्र राज्य था। मिशन आत्मघाती था, शेर की मांद में घुसने समान था। ये एक ऐसी पेशकश थी जिसमें उसे कलंकित करने वाली नौकरी ही उसके पाप धो सकती थी। (अमेज़न से)

टिप्पणी

सीक्रेट एजेंट सुरेन्द्र मोहन पाठक जी के थ्रिलर उपन्यासों में ६० वाँ और वैसे प्रकाशित उपन्यासों में २८५ वाँ है। यह उपन्यास नीलेश गोखले सीरीज का दूसरा उपन्यास है। इस सीरीज का पहला उपन्यास गवाही था जिसके विषय में आप यहाँ क्लिक करके पढ़ सकते हैं।

हालाँकि यह नीलेश गोखले शृंखला का दूसरा उपन्यास है पर इस उपन्यास को एक एकल उपन्यास की तरह भी पढ़ा जा सकता है। नीलेश के विषय में आप अगर नहीं जानते हैं तो बता दूँ नीलेश कभी अपराधिक तत्वों के साथ मिलकर इस भ्रष्टाचारी सिस्टम का हिस्सा हुआ करता था। लेकिन फिर उसके जीवन में कुछ ऐसा हुआ कि वो उन्ही लोगों के ऊपर टूट पड़ा जिनका कि वो अब तक साथ देता था। इससे उन सामजिक तत्वों का अंत तो हुआ ही लेकिन इसका एक परिणाम ये भी था कि नीलेश अब मुंबई पुलिस में कार्यरत नहीं था। वो अब एक बार में एक मामूली बाउंसर की नौकरी बजा रहा था। अपनी इस ज़िन्दगी ने एक अवसाद में उसे डाल दिया था। प्रस्तुत उपन्यास की शुरुआत यहीं से होती है। फिर नीलेश को ऐसा मिशन पुलिस की तरफ से मिलता है कि उसे अपनी खोई नौकरी पाने के आसार दिखने लगते हैं और वह उसे पाने के लिए मिशन पर जा निकलता है। यह मिशन क्या था और इधर वो क्या क्या करता है वही इस उपन्यास का कथानक बनता है।

वैसे तो मुझे सीक्रेट एजेंट पढ़े हुए अब एक महिना होने को आया लेकिन इसके विषय में लिखने का वक़्त ही अब मिल पाया है। इस बीच ऐसा नहीं है कि मैंने कुछ पढ़ा ही नहीं है, पढ़ना बिना रुके जारी है बस उनके विषय में लिखना कम हो रहा है। खैर, अभी बात करतें हैं उपन्यास के विषय में। सीक्रेट एजेंट एक पठनीय उपन्यास है। लेकिन इसमें मुझे गवाही से थोड़ा कम रोमांच लगा। इसमें नीलेश को पहले गुपचुप तरीके से कार्यवाही करनी होती है इसलिए वो कभी भी उपन्यास के खलनायक के सामने खुलकर नहीं आता है। फिर उसकी दोस्त का क़त्ल हो जाता है जो कि पाठक को पता होता है किसने किया लेकिन नीलेश को इसकी जानकारी नहीं होती है। इससे थोड़ा थ्रिल कम हुआ। मेरी राय में अगर पाठक को भी इस जानकारी से महरूम रखा जाता और फिर नीलेश के माध्यम से ये गुत्थी सुलझती तो बेहतर होता।

इसके इलावा मेरी शिकायत ये भी रही कि जैसे ही उपन्यास में एक्शन आना शुरू हुआ वैसे ही तूफ़ान ने आकर सारा मज़ा किरकिरा कर दिया। कोनकोना जजीरे में तूफ़ान आने से नीलेश और जजीरे कि त्रिमूर्ति ट्रिपल ऍम का सामना आनन फानन में हुआ जिसने कि उपन्यास के कथानक से वो थ्रिल ख़त्म कर दिया जो कि उपन्यास में तब होता जब नीलेश सारे सबूत जुटाकर उन तीनों को धर दबोचता ।और अंत में जब नीलेश और उपन्यास के मुख्य खलनायक अनिल महाबोले का टकराव हुआ तो वो भी इतना ख़ास नहीं लगा।

कुल मिलाकर कहूँ तो ये उपन्यास और बेहतर बन सकता था लेकिन बना नहीं। अभी तो यह एक औसत उपन्यास जिसकी कहानी को और बेहतर किया जा सकता था। हाँ, पाठक जी कि लेखनी अभी भी बेमिसाल है और वो पाठक को उपन्यास से  बाँधे रखती है। उपन्यास आप पढ़ते चले जाते हो।

प्रकाशक: राजा पॉकेट बुक्स | शृंखला: नीलेश गोखले #2

पुस्तक लिंक: अमेज़न


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Author

  • विकास नैनवाल

    विकास नैनवाल शिक्षा मूलतः पौड़ी गढ़वाल उत्तराखंड से आते हैं और फिलहाल गुरुग्राम में वक्त गुजार रहे हैं।

    किस्से कहानियाँ पढ़ने और गढ़ने का शौक है। अच्छी कहानियों को अनुवाद के माध्यम से हिंदी पाठकों के बीच लाने को भी वो लालायित रहते हैं। वह लेखन और अनुवाद के अतिरिक्त सम्पादन कार्य भी करते हैं। कई प्रकाशनों के लिए उन्होंने फ्री लांस सम्पादन का कार्य भी किया है।

    उनकी कई रचनाएँ और अनुवाद पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए हैं।

    वह एक बुक जर्नल नाम से यह वेब पत्रिका और दुईबात नाम से वह अपनी व्यक्तिगत वेबसाइट का संचालन भी करते हैं।

    पुस्तकें:
    रचना संकलन: एक शाम तथा अन्य रचनाएँ
    बाल साहित्य: 'इशिता की सूझबूझ' (सचित्र बाल कथा)
    अनुवाद: नेवर गो बैक, चाल पे चाल, 'फैटल फॉलाउट: एक गलती, घातक परिणाम'

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