दस लाख – सुरेन्द्र मोहन पाठक

दस लाख - सुरेन्द्र मोहन पाठक | जीत सिंह सीरीज

पहला वाक्य:
इंस्पेक्टर एक बड़ी बड़ी मूँछों वाला मराठा था जो कि अपनी लाल-लाल आँखों से जीतसिंह को यूँ घूर रहा था जैसे निगाहों से ही उसे भस्म कर डालना चाहता हो। 

प्यार ऐसी चीज़ है जिसकी चाहत दुनिया के हर इंसान को होती है। रोटी, कपड़ा और मकान के साथ साथ प्यार का नाम भी इंसान कि बुनियादी ज़रूरतों में शामिल होता है। एक अदद साथी की तलाश हर किसी को होती है और अगर वो साथी सौभाग्यवश मिल जाए तो फिर इंसान उस साथी के साथ रहने के लिए अपनी पूरी ताकत लगा देता है। जीत सिंह का किस्सा भी इससे जुदा नहीं था। जीत सिंह को अपने पड़ोस में रहने वाली सुष्मिता से इश्क़ हो गया था। एक तरफ जहाँ जीत सिंह मामूली शक्ल सूरत वाला एक साधारण ताला चाबी का कारीगर था वहीं दूसरी तरफ सुष्मिता एक पढ़ी लिखी और बेहद खूबसूरत युवती थी। वो अपने और सुष्मिता के बीच के बुनियादी फासलों से आगाह था इसलिए सुष्मिता की छोटी-छोटी मदद कर कर ही खुश हो जाता था। लेकिन किस्मत के खेल निराले होते हैं।

जब सुष्मिता की बहन की तबियत ख़राब हो गयी और उसे पता चला कि ईलाज के लिए दस लाख रुपयों की ज़रुरत पड़ेगी तो उसके पैरों तले ज़मीन ही खिसक गयी। वो दुःख के ऐसे पहाड़ के समक्ष अपने को पा रही थी जिससे पार पाना उसे मुमकिन नहीं जान पड़ता था। जीत सिंह ने जब मदद का हाथ बढ़ाया तो शुष्मिता उस पर निहाल हो गयी और शुष्मिता ने जीत से वादा किया कि अगर वो उसकी मदद कर देता है तो सुष्मिता जीत के पाँव धो धो कर पियेगी। जीतसिंह ने अपने को अँधा क्या माँगे दो आँखे वाली अवस्था में पाया और वो निकल पड़ा दस लाख की तलाश में।

दस लाख की तलाश उसे गुनाह के ऐसे रास्ते में ले गयी जहाँ वापस न जाने का उसने फैसला किया था। उसके पास दिए गए तीन महीने में से दो हफ़्तों का ही समय रह गया था और अब तक उसके हाथ फूटी कौड़ी नही लगी थी। उसने जो भी काम करना चाहा वो ही काम में या तो फच्चर पड़ गया या वो धोखे का शिकार हुआ।

क्या वक़्त के रहते जीत सिंह अपने किये वादे को पूरा कर पायेगा? क्या वो इतनी रकम जमा कर पायेगा? और अगर करेगा भी तो कैसे??

‘दस लाख’ जीत सिंह सीरीज का पहला उपन्यास है जो कि पहली बार १९९३ में प्रकाशित हुआ था। उपन्यास रोमांच से भरपूर तो है ही लेकिन जीत सिंह की व्यथा इसे मार्मिक भी बना देता है।

जीत सिंह एक पारम्परिक नायक नहीं है। वो एक चोर है जो की अपनी खुदगर्जी के लिए चोरी करता है। लेकिन फिर भी पाठक साब ने इस किरदार को ऐसे गढ़ा है की आप न चाहकर भी जीतसिंह को कामयाब देखना चाहते हैं। उपन्यास में रोमांच भरपूर है और इसका कथानक भी एकदम कसा हुआ है। अक्सर उपन्यासों में कहानी को खींचा जाता है लेकिन पाठक सर की यह खासियत रहती है कि वो अक्सर उतना ही लिखते हैं जितना की ज़रूरी होता है। इससे उपन्यास की लय भी बनी रहती हैं और पाठक का उपन्यास के प्रति रुझान भी। यह बात उपन्यास में भी लागू होती है। अगर आप एक रोमांचकारी उपन्यास को पढ़ना चाहते हैं तो इस उपन्यास को आपको ज़रूर पढ़ना चाहिये।

उपन्यास में एक पाठक की हैसियत से मुझे तो कोई कमी नहीं लगी। हाँ, कुछ जगह सम्पादकीय गलती है जैसे नाम गलत होना या शब्द गलत होना। पर यह इतनी नहीं है कि पाठक कथानक का मज़ा न ले पाये।

अंत में केवल इतना ही कहूँगा कि अगर आप एक उपन्यास पढ़ना चाहते हैं जो कि आपको रोमांचित करे और जिसमे आप खो जाये तो ‘दस लाख’ को चुनकर आप कोई गलती नहीं करेंगे।

पुस्तक लिंक: अमेज़न


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Author

  • विकास नैनवाल

    विकास नैनवाल शिक्षा मूलतः पौड़ी गढ़वाल उत्तराखंड से आते हैं और फिलहाल गुरुग्राम में वक्त गुजार रहे हैं।

    किस्से कहानियाँ पढ़ने और गढ़ने का शौक है। अच्छी कहानियों को अनुवाद के माध्यम से हिंदी पाठकों के बीच लाने को भी वो लालायित रहते हैं। वह लेखन और अनुवाद के अतिरिक्त सम्पादन कार्य भी करते हैं। कई प्रकाशनों के लिए उन्होंने फ्री लांस सम्पादन का कार्य भी किया है।

    उनकी कई रचनाएँ और अनुवाद पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए हैं।

    वह एक बुक जर्नल नाम से यह वेब पत्रिका और दुईबात नाम से वह अपनी व्यक्तिगत वेबसाइट का संचालन भी करते हैं।

    पुस्तकें:
    रचना संकलन: एक शाम तथा अन्य रचनाएँ
    बाल साहित्य: 'इशिता की सूझबूझ' (सचित्र बाल कथा)
    अनुवाद: नेवर गो बैक, चाल पे चाल, 'फैटल फॉलाउट: एक गलती, घातक परिणाम'

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