संस्मरण: हीरोगिरी - दिलीप कुमार

संस्मरण: हीरोगिरी – दिलीप कुमार

90 के दशक में फिल्में देखना भी उस समय के किशोरों के लिए एक तरह की जद्दोजहद ही हुआ करती थी। अधिकतर घरों में इसे व्यसन माना जाता था और घरवालों की कोशिश रहती थी कि वो फिल्मों से दूर रहें। फिल्म देखने से जुड़ी अपनी ऐसी ही याद लेखक दिलीप कुमार हमारे साथ साझा कर रहे हैं। आप भी पढ़ें:

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पंडी ऑन द वे - दिलीप कुमार

व्यंग्य: पंडी ऑन द वे – दिलीप कुमार

पुस्तक मेलों की अपनी एक अलग धमक होती है। अलग-अलग तरह के लोग वहाँ आते हैं। सबके अपने प्रयोजन होते हैं। पाठक,लेखक, प्रकाशक तो मौजूद रहते ही हैं लेकिन इनके अतिरिक्त भी कुछ लोग होते हैं जो पुस्तक मेलों में बहुदा देखे जाते हैं। लेखक दिलीप कुमार का व्यंग्य ‘पंडी ऑन द वे’ पुस्तक मेलों में मौजूद एक ऐसे ही चरित्र पर चिकोटी काटता है। आप भी पढ़ें।

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