खेल खिलाड़ी – योगेश मित्तल

खेल खिलाड़ी - योगेश मित्तल

मैंने बहुत से लेखकों के लिए जासूसी-सामाजिक और बाल उपन्यास लिखे हैं। कभी लोटपोट में मेरी कॉमिक्स स्ट्रिप्स ‘चाचा चक्रम’, ‘मांगेलाल मक्खीचूस’, ‘उपकारी लाल’ आदि छपी हैं।

बहुत से सत्यकथा लेखक अपनी सत्यकथाएँ मुझसे लिखवाते थे।

मैंने बतौर सम्पादक बहुत सी पत्रिकाओं का सम्पादन किया है जिनमें से कुछ में मेरा नाम बतौर सम्पादक छपता रहा है।

खेल खिलाड़ी - योगेश मित्तल
बायें से दायें: मैं, अत्तर सिंह,सरदार मनोहर सिंह, विनोद, किशन

यह फोटो तब की है जब मैं ‘खेल-खिलाड़ी’ पत्रिका में सम्पादक था। सबसे बाएँ हरे स्वेटर में सबसे छोटे कद का शख्स मैं हूँ। मेरे निकट का पतला और लम्बा व्यक्ति अत्तर सिंह है, जो कम्पोजिंग एजेंसी चलाता था। बीच में खेल-खिलाड़ी पत्रिका के स्वामी सरदार मनोहर सिंह। उसके बाद क्लैरिकल काम करने वाला विनोद और सबसे आखिर में पैकिंग तथा क्लैरिकल और भाग-दौड़ के सभी काम करने वाला किशन।

खेल-खिलाड़ी का बस, उतना ही स्टाफ था। लेखकों में सबसे पहले लेखक देवराज पुरी और योगराज थानी ही थे। बाद में देवराज पुरी जी के सुपुत्र नरोत्तम पुरी, सरदार जसदेव सिंह, रवि चतुर्वेदी, सुदीप (धर्मयुग के सम्पादक मंडल में से एक) तथा बहुत से लोग लेखकों की लिस्ट में शामिल हुए, जिनमें मैं भी था।

मैंने पहला खेल सम्बन्धी लेख तब के लिटिल मास्टर सुनील गावस्कर पर लिखा।

तब गावस्कर दादर की जिस गली में रहते थे, वहीं बाहरी तरफ पायोनियर न्यूज़ एजेंसी का बुक स्टाल था, जिसे उस समय दिल्ली के करोल बाग की गफ्फार मार्किट में वीनस पॉकेट बुक्स और मधु प्रकाशन के मालिक ‘पाहवा साहब’ के सुपुत्र अश्वनी पाहवा चलाते थे। अश्वनी ने मुझे बताया कि सुनील गावस्कर की माता जी, सुनील गावस्कर के आर्टिकल वाले लेख की कॉपी चार बार ले गयीं थीं। सुनकर अच्छा लगा।

दरअसल मैंने जब वो लेख लिखा था, उस समय सुनील गावस्कर भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान बन चुके थे और एक मैच में स्पिनर शिवलाल यादव से गेंदबाजी करवाने के उनके स्टेप की बहुत आलोचना हो रही थी, क्योंकि शिवलाल यादव बहुत बुरी तरह पिटे थे।

मैंने उस लेख में गावस्कर के कदम का बचाव किया था और पक्ष में सटीक दलीलें दी थीं।


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Author

  • योगेश मित्तल

    25 मार्च 1957 को दिल्ली के चांदनी चौक के पत्थरवालान में जन्में योगेश मित्तल के बचपन के कुछ वर्ष सिविल लाइन्स, शाहदरा में व्यतीत हुए। शाहदरा के बाद उन्होंने कुछ वर्ष चुरू, राजस्थान में गुज़ारे। उसके बाद 1963 से 1968 तक वे अपने परिवार के साथ कलकत्ता में रहे और फिर 1969 में दिल्ली आकर दिल्ली में ही बस गए। तब से लेकर अब तक वह दिल्ली में ही रहते आये हैं।

    कलकत्ता में रहते हुए ही योगेश मित्तल की पहली कविता व कहानी 1964 में कलकत्ता के दैनिक समाचार पत्र 'सन्मार्ग' के 'बालजगत' स्तम्भ में छपी।

    1969 में दिल्ली आने के पश्चात उनकी रचना जब गर्ग एंड कम्पनी की पत्रिका 'गोलगप्पा' में छपी तो वो प्रकाशक ज्ञानेंद्र प्रताप गर्ग की नज़र में आये। इसके पश्चात शुरू हुआ लेखन का सिलसिला आज पाँच दशक से भी ऊपर का समय गुजरने के बाद भी अनवरत ज़ारी है।

    लेखन की पहली पारी में योगेश मित्तल का अधिकतर लेखन ट्रेड नाम के लिए किया गया है। उपन्यास लेखन के अतिरिक्त उन्होंने खेल पत्रकारिता, कॉमिक बुक लेखन और सम्पादन के क्षेत्र में भी कार्य किया।

    अपने लेखन की दूसरी पारी में अब अपने नाम से उनकी पुस्तकें प्रकाशित हो रही हैं।  प्रेतलेखन, वेद प्रकाश शर्मा: यादें बातें और अनकहे किस्से, शैतान: जुर्म के खिलाड़ी नीलम जासूस कार्यालय से और  चांदी की चोंच, लड्डू मास्टर की भैंस, लोमड़ी का दूल्हा, काठ की अम्मा लायंस पब्लिकेशंस से प्रकाशित हुई हैं।

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