आकाश पाठक सव्यसाची शृंखला के लेखक हैं। इस शृंखला में ‘सव्यसाची: छल और युद्ध’, ‘अग्निरथी: नियम और दंड’, ‘मृतयुजीवी: विनाश और सृजन’ नामक तीन उपन्यास मौजूद हैं। यह त्रयी 2021 से 2023 के बीच प्रकाशित हुई थी। पर लेखक के ज़ेहन में इस कहानी को लिखने का विचार कब आया? इसकी शुरुआत कैसे हुई और फिर इसका मौजूदा रूप किस तरह आया? अपने इस लेख में आकाश पाठक अपनी इस लेखन यात्रा के विषय में बता रहे हैं। अगर आपने आकाश पाठक द्वारा रचित यह त्रयी पढ़ी है तो आपको यह लेखक पसंद आएगा और अगर आपने यह त्रयी नहीं पढ़ी है तो हम उम्मीद करते हैं आप इस लेख के पश्चात इस त्रयी को पढ़ने के लिए ज़रूर लालायित हो जाएँगे:
सव्यसाची की कहानी बताने से पहले मुझे लगता है कि मुझे संक्षिप्त में इस त्रयी के विषय में बता देना चाहिए। ऐसा इसलिए भी ज़रूरी है ताकि अगर कोई सव्यसाची की दुनिया से बेखबर हो तो वह भी आगे बढ़ने से पहले थोड़ा बहुत ही सही इस दुनिया को जान सके।

अगर आप मुझसे पूछें कि आखिर क्या है इस त्रयी में? तो मैं कहूँगा कि सीधे सरल और टेक्निकल शब्दों में तो यह एक एपिक फंतासी गाथा है! थोड़ा और आप जानना चाहें तो मैं बताऊँगा कि मुख्य रूप से यह कहानी है कौस्तुभ की जो अपनी नियति स्वयं बनाने के लिए निकल पड़ा है एक दुर्गम सफ़र पर। आरंभ में उसका लक्ष्य है, मेघपुरम में स्थित नभ कुल संप्रदाय का आश्रम जहाँ वह शिक्षा प्राप्त करना चाहता है। लेकिन शीघ्र ही वह उस युद्ध का हिस्सा बन जाता है जो एकद्वीप के ही दो हिस्सों में लड़ा जा रहा है।
सहस्त्रों वर्षों से एकद्वीप एक अखंड साम्राज्य रहा था, लेकिन कुछ वर्षों पूर्व शांति बनाये रखने के लिए इसे दो खंडों में विभाजित कर दिया गया था— उत्तराँचल और दक्षिणांचल!
दक्षिणांचल का वर्तमान शासक शतबाहु दोनों राज्यों को पुनः एक कर उनपर शासन करना चाहता है लेकिन वह सीधे युद्ध से डरता भी है, इसी कारण वह छल का सहारा लेता है और एकद्वीप से निष्काषित जल दस्युओं और पड़ोसी राज्य वृषाण देश की सहायता भी लेता है।
कौस्तुभ और शतबाहु के अतिरिक्त इस गाथा का तीसरा मुख्य पात्र है, शिखी! मरुभूमि के अग्नि कुल संप्रदाय में शिक्षा प्राप्त कर रहा शिखी कुछ ऐसी शक्तियों का स्वामी है जो असाधारण है। इसी कारण कुछ लोग उससे डरते भी हैं, लेकिन कोई भी उसे समझने का प्रयास नही करता! लेकिन उसकी नियति शीघ्र ही उसे भी उस युद्ध का हिस्सा बना देती है जो एकद्वीप के भविष्य का निर्धारण करने वाला है।
इस त्रयी की पुस्तकें—
तो अब आप थोड़ा बहुत इस त्रयी के विषय में जान ही गए होंगे तो चलिए अब इसकी कहानी की तरफ बढ़ते हैं।

सालों पहले, ग्रेजुएशन के शुरुआती दिनों में, जब मैंने लिखना शुरू ही किया था और अधिकतर फैन फिक्शन (राज कॉमिक्स के पात्रों पर आधारित) कहानियाँ लिखता था, तब इस कहानी की रूपरेखा मेरे दिमाग में बनी थी।
शुरुआत में यह मात्र दो भागों में सिमटी हुई एक छोटी सी कहानी थी। पहला भाग कुछ यूँ होता कि एक युवक गलती से राजकुमारी की दोस्त को देख लेता और उसे राजकुमारी समझ बैठता और उससे प्रेम कर बैठता (जैसा कि सव्यसाची के दूसरे अध्याय ‘सरोवर’ में होता है), और दूसरे भाग में वह युवक किसी तरह राजकुमारी तक पहुँचता, उसकी किसी ऐसी समस्या का समाधान करता जो आसान नहीं होती और आखिर में राजकुमारी खुद ही उस युवक को अपनी दोस्त से मिलाती।
लेकिन यह कहानी कभी पन्नों पर नहीं उतर पायी (और शायद यह अच्छा ही हुआ।)
इतिहास एक ऐसा विषय रहा है जिसने मुझे हमेशा से अपनी ओर खींचा है। अगर हम गल्प (फंतासी) कहानियों में देखे तो बड़े युद्धों के पीछे बड़े कारण होते हैं, जैसे पूरी दुनिया पर खतरा, मानवता पर खतरा या कभी कभी पूरे ब्रह्मांड पर खतरा। ‘अगर हम यह नहीं कर पाये तो इस पूरी दुनिया पर काली शक्तियों का राज होगा।’ ‘अगर हम वह नहीं कर पाये तो पूरी मानवता नष्ट हो जायेगी।’ पर इतिहास हमें बताता है कि कभी कभी कारण बहुत ही साधारण और छोटे होते हैं। और इन छोटे कारणों के कारण ही लाखों करोड़ों लोग इन युद्धों की भेंट चढ़ जाते हैं और इतिहास के पन्नों पर उनका कोई नामोनिशान तक नहीं रहता।
इतिहास की बात करें तो मौर्य वंश का उदय, बौद्ध धर्म का उदय, उसका पूरे भारत पर प्रभाव और उसका बँटवारा, हूण, शक और कुषाणों का आगमन, यह सब ऐसी घटनाएँ हैं जो सच होते हुए भी रोमांच से भरी हुई हैं और मैं इनसे सम्बंधित ही कुछ लिखना चाहता था। पर मैं इतिहास नहीं लिखना चाहता था।
मैं कल्पना के धरातल पर एक नये संसार की रचना करना चाहता था जिसमें मुझे पूरी छूट हो। ऐसे में मेरे दिमाग में विचार आया ऐसे दो राज्यों का, जिनमें से एक राज्य दूसरे राज्य को अपना बनाना चाहता हो। इतिहास में इससे साधारण घटना और कौन सी हो सकती है? किसी दूसरे राज्य पर अधिकार करने के लिए युद्ध।
और तब मैंने सोचा कि क्यों न उस युवक और राजकुमारी की कहानी भी इसके साथ ही मिला दी जाये।
और आखिरकार यह कहानी शुरू हुई।
उन दिनों मैं एक ऑनलाइन प्लेटफोर्म पर, एक लम्बी शृंखला (एक औसत उपन्यास के बराबर) लिख चुका था और दूसरी शृंखला लिख रहा था। कॉलेज की पढ़ाई के बाद समय निकाल कर निरंतर लिखने के बाद भी मुझे हमेशा ऐसा लगता था कि एक उपन्यास लिखने में बहुत समय लगेगा। फिर आखिरकार मार्च २०२० में महामारी के कारण पूरी दुनिया घरों में रहने पर मजबूर हो गयी और मैंने सोचा कि क्यों न उपन्यास लिखना शुरू ही किया जाये।
उस समय न तो मेरे दिमाग में उपन्यास का नाम था और न ही यह मालूम था कि मैं इतना बड़ा उपन्यास लिख लूँगा। जैसा कि कहानी दो भागों में होने वाली थी, वैसा ही मैंने सोचा था कि यह उपन्यास भी दो भागों में बँटा होगा, एक एक भाग में लगभग 150 – 200 पन्ने होंगे।

मैंने गुणा भाग किया, और सब हिसाब लगाया कि दो महीने में तो एक भाग हो ही जायेगा और उपन्यास लिखने बैठ गया।
उस समय तक कौस्तुभ का नाम शील था और मैं नहीं चाहता था कि कहानी के तीनों मुख्य पात्रों का नाम ‘श’ से ही शुरू हो। अब शिखी और शतबाहु नाम ऐसे थे जिन्हें मैं किसी भी कीमत पर नहीं बदलना चाहता तो शील को अपना नाम बदलना पड़ा। हालाँकि इसका एक कारण यह भी था कि शील नाम उसके चरित्र के साथ मेल नहीं खा रहा था। उसका चरित्र किसी सिंह की भाँति था, निडर और इसलिए आखिरकार उसका नामकरण हुआ कौस्तुभ।
कहानी में शिखी के आगमन से पूर्व ही यह तय हो चुका था कि मैं एकद्वीप के चार सुदूर कोनों पर चार आश्रमों को दिखाने वाला हूँ, जो सालों पहले एक थे और अब भिन्न। किसी संस्थापक के बाद किसी संस्था के कई भाग हो जाना, यह भी बहुत ही सामान्य घटना है। कहानी में कौस्तुभ को मेघपुरम आश्रम जाना था, उसे मैंने ऐसी जगह इसलिए स्थापित किया जिससे वहाँ तक पहुँचने में कौस्तुभ को कठिनाइयों का सामना करना पड़े, जो उसके चरित्र निर्माण के लिये बहुत ही जरूरी था। और जब शिखी आया तो उसे मैंने निःसंकोच अग्नि कुल आश्रम में डाल दिया, क्योंकि इससे उपर्युक्त जगह उसके लिए और कौन सी हो सकती थी?

आश्रमों को किस आधार पर बाँटा जाये, इसके लिए मैंने सहारा लिया पंचतत्वों का। क्यों? क्योंकि पंचतत्वों की धारणा ने भी मुझे हमेशा से रोमांचित किया है और इससे पहले भी मैं दो कहानियों में पंचतत्वों का प्रयोग कर चुका था। हालाँकि आश्रम पाँच की जगह चार ही थे, महर्षि याचि के पाँच दत्तक पुत्रों में से सबसे बड़े महर्षि भूदेव ने अपना आश्रम नहीं बसाया। हालाँकि उन्होंने ज्ञानशिला की स्थापना की थी। ऐसा करने का कारण क्या था, इसके विषय में मैंने कुछ विशेष लिखा नहीं है।
वैसे कई माइथोलॉजी में पाँच के स्थान पर चार तत्वों को ही प्रमुखता दी जाती है, भूमि, जल, वायु और अग्नि। आकाश या ईथर को ऐसा तत्व माना जाता है जो इन चारों को आपस में जोड़ता है।
पर मैंने चार आश्रमों के लिये चार तत्वों का आधार एक नये कांसेप्ट को बनाया। इसके अनुसार भूमि (अथवा पृथ्वी) प्रमुख है क्योंकि वही जल, वायु, अग्नि और आकाश का आधार है। उसके बिना यह चारों अस्तित्वहीन हैं। हालाँकि इस कांसेप्ट का इस कहानी में कोई प्रयोग नहीं किया गया है, लेकिन जिन दो पहले की कहानियों में मैंने पंचतत्वों के बारे में लिखा था उसमें इसका प्रयोग किया था।
अब बारी थी आदिपशुओं की।
कहानी की शुरुआत तो मैंने इतिहास जैसा एक नया इतिहास लिखने के कांसेप्ट से शुरू की थी, लेकिन जब मैंने शुरू के भाग अपने कुछ पाठक मित्रों को पढ़ने के लिए दिए तो उन्हें कुछ भी रोचक नहीं लगा। यहाँ यह भी बता देना चाहूँगा कि उस समय, पहले भाग में यशवर्धन और प्रसान नगर की कहानी इस शृंखला का बड़ा हिस्सा होने वाली थी। लेकिन शिखी के आगमन के बाद यशवर्धन की कहानी थोड़ी छोटी कर दी गयी। हालाँकि पूरी कहानी पर उसका प्रभाव कहीं भी कम नहीं हुआ है। सव्यसाची के अंत तक तो मेरे दिमाग में यही आइडिया था कि मैं यशवर्धन को मरा हुआ नहीं बल्कि जीवित दिखाऊँगा। जब रम्या वापस आयेगी और यशवर्धन के घर को जलते हुए देखेगी और उसे लगेगा कि यश भी मारा गया, परंतु वास्तविकता में घर में आग लगाने से पहले ही वर्षाण अधमरे यश को बंधक बनाकर अपने साथ ले गये होंगे। लेकिन अग्निरथी शुरू करते करते यह आइडिया पूरी तरह ड्राप कर दिया गया और शायद यह भी एक उचित निर्णय ही था। अगर ऐसा नहीं होता तो शायद रम्या का चरित्र इतना उभर कर नहीं आ पाता।
हाँ, तो बात चल रही थी आदिपशुओं की। अब जबकि लोगों को और शायद एक हद तक मुझे भी कहानी उतनी रोमांचक नहीं लगी तो आखिरकार मैंने इसमें कुछ फंतासी एलिमेंट डालने शुरू किये। इतने भी नहीं कि जिससे इस कहानी का मुख्य थीम ही बदल जाये। पहला एलिमेंट था आदिपशु। जब हम अंग्रेजी फंतासी कहानियाँ पढ़ते हैं तो उनमें एक ऐसा प्राणी जरूर होता है, मुख्यतः ड्रैगन। केवल फंतासी कहानियाँ ही नहीं, दुनिया की सभी सभ्यताएँ ऐसे प्राणियों के ज़िक्र से भरी हुई हैं। और मैंने जिन आदिपशुओं का ज़िक्र किया उनमें से अधिकतर ऐसे ही प्राणी थे। जैसे एकश्रृंगी, यति, और स्फिंक्स। (हालाँकि मैंने स्फिंक्स का नाम नहीं लिखा है, मात्र एक ऐसा जीव लिखा है जिसका सिर मनुष्य का है, शरीर सिंह का जिसके पंख भी हैं जिसकी मदद से वह उड़ सकता है।)
सव्यसाची के अध्याय १० ‘मरुभूमि’ में कौस्तुभ जो कहानी सुनाता है वह पूरी तरह मिस्त्र से प्रभावित थी।
‘चेतना आने पर उसने बताया कि वह पश्चिम में एक दूर देश से आया है…’
‘उसने बताया कि उसके देश में मुख्यतः चहुँओर मरुस्थल है है और उस मरुस्थल के मध्य मात्र एक नदी। वह नदी ही उनकी जीवन-दायिनी थी। उसने विशाल त्रिकोणीय भवनों के विषय में भी बताया, जिनमें वे अपने मृत राजाओं के शव रखते थे।’
यह सभी बातें मिस्त्र से ही प्रभावित थीं। उसी भाग में जल दस्युओं की उत्पत्ति के विषय में भी बताया गया है कि कैसे पश्चिम से आया हुआ आख तेन उन्हें अपने देश चलने के लिये प्रेरित करता है और एकद्वीप के लोग एक विशाल जलयान का निर्माण करते हैं। और वह जलयान सागर के मध्य ही डूब जाता है। यह घटना भी टाइटैनिक के डूबने से ही प्रभावित थी।
खैर, वापस चलते हैं आदिपशुओं पर। अब मुझे शिखी से जुड़ा हुआ एक आदिपशु दिखाना था, लेकिन मुझे ऐसा कोई वास्तविक या मिथकीय जीव मिला नहीं तो मैंने एक नया आदिपशु ही गढ़ दिया, अग्निकृमि। हालाँकि कहानी की शुरुआत में ही मैंने तय कर दिया था कि शिखी और कौस्तुभ के मध्य आदिपशुओं द्वारा युद्ध नहीं होगा। हालाँकि एक समय के लिये मेरे दिमाग में यह आइडिया ज़रूर था कि किसी तीसरे आदिपशु को युद्ध में उतारा जाये, जैसे यति। पर आखिरकार यह आइडिया भी ड्रॉप कर दिया गया।
इसके अतिरिक्त जो दूसरा फंतासी एलिमेंट था, वह था मायावी और उनसे जुड़ी मणि। शुरुआत में जब मैं शिखी के परिचय के लिए मायावियों को कहानी में लाया, तब मैंने भी नहीं सोचा था कि उनका प्रयोग तीसरे भाग तक किया जायेगा या वह कहानी में एक मुख्य भूमिका निभाएँगे। इसके अलावा मणि का काम भी कुछ दूसरा था। हालाँकि यह तो शुरू में ही बता दिया गया था कि वह मणि जीवात्मा को अधिक समय तक रोके रख सकती है, पर कांसेप्ट यह था कि गजबाहु जब अपने पौत्र शतबाहु को नील स्फटिक का भाग देता है तब उसकी जीवात्मा भी उसके साथ ही रह जाती है और वर्तमान में भी शतबाहु अपने पितामह की जीवात्मा से भेंट कर सकता है, बातें कर सकता है। हालाँकि इस आईडिया को भी ड्रॉप किया गया और केवल यह दिखाया गया कि शतबाहु को भ्रम होता है कि उसके पितामह की जीवात्मा उसके साथ ही है और उसे कभी कभी उनका स्वर भी सुनाई पड़ता है।
बाद में नील स्फटिक से जुड़ा हुआ एक नया कांसेप्ट बनाया गया, मृत्युजीवी।

नामकरण
पहला भाग लिखते-लिखते ही समझ आ गया था कि यह कहानी एक भाग तो क्या दो भागों में भी नहीं सिमटने वाली। तब तीन उपन्यासों की शृंखला के बारे में सोचा गया, जो कहानी के तीन मुख्य पात्रों पर आधारित होता, कौस्तुभ, शिखी और शतबाहु।
पहला भाग तो लिखा जा चुका था, लेकिन अब सबसे बड़ी समस्या थी इसका नामकरण। पहले भाग में मैंने कौस्तुभ को एक कुशल धनुर्धर दिखाया है और एक जगह यह भी लिखा था कि वह एक सव्यसाची है। बस वहीं से यह आइडिया आया कि इस भाग का नाम सव्यसाची रखा जाये। यह एक न्यूट्रल नाम था, कौस्तुभ के सव्यसाची होने से कहानी पर कोई अंतर नहीं पड़ रहा। इस आइडिया के बाद कोई दूसरा आइडिया आया ही नहीं तो आखिरकार यही नाम फाइनल किया गया। प्रकाशन के समय इस शृंखला का भी नामकरण करने का विचार था, लेकिन तीन उपन्यासों के बाद भी मैं कोई नाम नहीं ढूँढ पाया। अब जबकि लोग इसे सव्यसाची नाम से जान चुके हैं, पहचान चुके हैं तो आखिरकार इस शृंखला का नाम ‘सव्यसाची शृंखला’ करने का ही निर्णय लिया गया। वैसे भी एक प्रकार से यह कहानी कौस्तुभ अर्थात सव्यसाची की ही कहानी है। शायद यह निर्णय भी आलसपन का ही परिणाम है। इसके अलावा एक और नाम जो दिमाग में था वह था ‘एकद्वीप शृंखला’ लेकिन आप लोग भी शायद यही मानेंगे कि वर्तमान नाम इससे कई गुना बेहतर है।
पहली किताब की प्रकाशन प्रक्रिया के दौरान प्रकाशक महोदय ने सुझाया कि केवल ‘सव्यसाची’ नाम से कुछ मालूम नहीं चल रहा, इसमें कुछ और जोड़ो। तब आखिरकार इसमें ‘छल और युद्ध’ जोड़ा गया। यह भी इतना आसान नहीं था, न जाने कितना सोचा विचारा और यह नाम फाइनल किया। हालाँकि शुरुआत में लोगों को यह भी थोड़ा अटपटा लगा।
छल और युद्ध का तो कोई मेलजोल ही नहीं है, कम से कम शांति और युद्ध कर दो।
पर यह नाम मेरे दिमाग में आ चुका था तो मैंने इसमें ज्यादा बदलाव नहीं किये। शायद आज भी जब लोग पहली बार इस नाम को पढ़ते होंगे तो उन्हें अटपटा लगता होगा।
इसके अलावा एक छोटी समस्या यह भी थी कि सव्यसाची नाम पढ़कर कुछ लोगों ने सहज ही अनुमान लगा लिया कि यह महाभारत के प्रसिद्ध पात्र अर्जुन की कहानी होगी क्योंकि सव्यसाची अर्जुन का एक दूसरा नाम भी है।
पहले भाग का नामकरण किया जा चुका था और अब बारी थी दूसरे भाग की। पहला भाग कौस्तुभ का ही दूसरा नाम था, नाम भी नहीं एक बहुत ही कम प्रचलित उपाधि। इसी कांसेप्ट को ध्यान में रखते हुए दूसरे और तीसरे भाग का नामकरण किया गया। अग्निरथी अर्थात शिखी और मृत्युजीवी अर्थात शतबाहु।
पहले भाग के उपनाम में प्रयोग किये गए शब्द, ‘छल और युद्ध’ में जहाँ कोई मेल नहीं था; वहीं इसके उलट दोनों भागों के उपनामों के शब्द , ‘नियम और दंड’ और ‘विनाश और सृजन’ एक दूसरे के पूरक हैं।
प्रेरणा
‘आपको इस कहानी का आइडिया कहाँ से आया?’ यह मुझसे सबसे अधिक पूछे जाने वाले सवालों में से एक है। और सच कहूँ तो मैं कभी भी सही ढंग से इसका जवाब नहीं दे पाता।
इस पूरी शृंखला को लिखने का विचार कैसे आया यह मैं थोड़ा बहुत इस लेख के शुरुआत में ही बता चुका हूँ। एक और कारण जो मैं सोचता हूँ वह यह है कि हिंदी में ऐसी कहानियाँ बहुत ही कम हैं, इसीलिए कहीं न कहीं मेरे दिमाग में यह जरूर रहता था कि अगर हिंदी में ऐसी और कहानियाँ रहतीं तो कितना मज़ेदार रहता।
ऐसी कहानियों में सबसे मुख्य है चंद्रकांता और चंद्रकांता संतति। चंद्रकांता को पहली बार मैंने आठ नौ साल की उम्र में पढ़ा था और तब से आज तक देवकी नंदन खत्री द्वारा रचित दुनिया मुझे रोमांचित करती है। यह दुखद है कि लगभग डेढ़ सौ साल पहले लिखी गयी इस रचना को विश्व पटल पर जो प्रसिद्धि मिलनी चाहिए थी वह नहीं मिल पायी।
तिलिस्म और ऐयारों की दुनिया में रची बसी एक कहानी मेरे दिमाग में भी है, लेकिन वह किस्सा फिर कभी।
इसके अलावा जितनी भी रचनाएँ हैं वह कहीं न कहीं ऐतिहासिक अथवा माइथोलॉजिकल पृष्ठभूमि पर लिखी गयी हैं। मैं एक ऐसी रचना लिखना चाहता था जो शत प्रतिशत काल्पनिक हो, लेकिन मैं भी ऐसा नहीं कर पाया। सबसे पहले मैंने एकद्वीप के मानचित्र को हूबहू भारतवर्ष का ही मानचित्र बना दिया। हालाँकि यदि मैं एक नया मानचित्र बनाता तो भी कहानी पर अधिक अंतर नहीं पड़ता। इसके अलावा कुछ ऐसे शब्द थे जैसे इंद्र, ऋषि जिन्होंने लोगों को कन्फ्यूज किया कि यह एक माइथोलॉजी (पौराणिक किरदारों) से सम्बंधित कहानी है।

पर ऐसा नहीं है। इस कहानी के लिए मैंने भाषा, सभ्यता सब कुछ शून्य से गढ़ा था। पूरे एकद्वीप में लोग केवल एक ही भगवान की पूजा करते हैं, भगवान एकेश्वर और उनका धर्म एकेश्वरवाद है, अर्थात वह एक ही भगवान की पूजा करते हैं। मैंने ऐसा इसलिए किया जिससे कहानी अधिक जटिल न हो। इस धर्म के अनुसार मृत्यु के पश्चात लोगों की जीवात्मा (आत्मा) ब्रह्मात्मा में मिल जाती है और उसका अस्तित्व समाप्त हो जाता है। यहाँ पुनर्जन्म का कोई कांसेप्ट नहीं है।
पहले भाग में मैंने एकद्वीप वासियों से भगवान एकेश्वर का नाम कुछ अधिक ही बुलवा दिया जो लोगों को थोड़ा अटपटा लगा, इसलिए अगले दो भागों में उसे सीमित कर दिया गया।
अगर बात करें पात्रों की प्रेरणा कहाँ से मिली तो मैं यही कहना चाहूँगा कि कहानी शुरू करते समय किसी भी पात्र के विषय में ऐसा नहीं सोचा था कि उन्हें किसी एक विशेष पात्र जैसा बनाऊँगा। लेकिन अब जब यह कहानी खत्म हो चुकी है तो मुझे ऐसा लगता है कि कुछ पात्र अवश्य ही मेरे द्वारा पढ़े गए पात्रों प्रभावित थे। जैसे शिखी, इसकी कहानी थोड़ी बहुत महाभारत के कर्ण से प्रभावित थी। हालाँकि यह मैंने जानबूझकर नहीं किया था। इसके अलावा शतबाहु और उसके दो भाई, जिनमें से एक उसकी हर बात मानता है और दूसरा उसकी हर बात पर सवाल करता है, यह भी थोड़ा बहुत रामायण के पात्र रावण और उसके दो भाइयों कुम्भकर्ण और विभीषण जैसा ही था। हालाँकि कहानी की शुरुआत करते समय मैंने इसके बारे में भी नहीं सोचा था।
अब आगे क्या?
सव्यसाची की गाथा तो खत्म हो गयी, पर जो काल्पनिक संसार इस शृंखला में रचा जा चुका है वह बहुत ही वृहद और असीमित है। कई सारे पात्र ऐसे हैं जिनके बारे में विस्तार से लिखा जा सकता है जैसे अरिदमन इत्यादि। इसके अलावा कुछ ऐसी घटनाएँ हैं जिनको विस्तार से दिखाया जा सकता है, जैसे एकद्वीप की स्थापना, यनमानी और महर्षि याचि के द्वारा। एकद्वीप का बँटवारा किस कारण हुआ? मायावियों की उत्पत्ति। इसके अलावा इस शृंखला का सीक्वल भी लिखा जा सकता है। हालाँकि कौस्तुभ के बारे में लिखने का अब मेरा कोई विचार नहीं। उसकी कहानी अब पूरी हो चुकी है। इसका मतलब यह नहीं कि उसे अपने जीवन में कठिनाइयों का सामना नहीं करना पड़ेगा, जिंदगी ‘हैप्पी एंडिंग’ पर ही आकर खत्म नहीं हो जाती।
इस कहानी में वृषाण देश के बारे में भी थोड़ा बहुत दिखाया गया है, पर आगे की कहानियों में एकद्वीप के अलावा दूसरे देशों के बारे में दिखाया जा सकता है।
पहला भाग लिखते समय एक विचार यह था कि उसमें मुख्य कहानी के साथ साथ ही यनमानी और महर्षि याचि की कहानी भी दिखाई जाये। क्योंकि जहाँ पहली कहानी एकद्वीप के पुनर्स्थापना की है वहीं दूसरी कहानी एकद्वीप की स्थापना की है। आइडिया यह था कि तीन चार अध्याय के बाद एक छोटा अध्याय लिखा जाये जिसमें दो सहस्त्र वर्ष पूर्व की कहानी हो। ऐसे दो तीन अध्याय मैंने लिखे भी थे। और उनमें से एक को मैंने उस अध्याय में इस्तेमाल भी किया है जहाँ यशवर्धन और रम्या प्रसान नगर में कथावाचकों के द्वारा वह कथा सुनते हैं, यनमानी और याचि के मिलने की कथा। लेकिन बाकी अध्यायों को मैंने हटा दिया। सच तो यह है कि वह कथा इतनी जल्दी सिमट नहीं पाती और उसे इस कहानी के साथ लिखने का कोई लाभ भी नहीं था। यदि सम्भव हुआ तो कभी उस कहानी को विस्तृत रूप से लिखूँगा।
तो यह थी सव्यसाची के बनने की कहानी। मैंने तो अपनी बात कह दी। अगर आप कुछ कहना चाहें तो मुझे ईमेल ज़रूर करें। मेरा ईमेल है: akashpt3232@gmail.com
