गजानन रैना साहित्यानुरागी हैं। वह सोशल मीडिया पर लिखे अपने चुटीले लेखों के लिए जाने जाते हैं। आज वो अपने एक परिचित मामू के विषय में आपको बता रहे हैं। आखिर कौन थे ये मामू? जानने के लिए पढ़ें गजानन रैना का लिखा यह संस्मरण ‘एक थे मामू’:
ग्रेजुएशन करने के दिन याद आ गये। बी एच यू में पढ़ने का अनुभव, बिना हॉस्टल में रहे, पूरा हो ही नहीं सकता था, ऐसा शास्त्रकारों का कहना था।
बी एच यू मने?
नहीं, नहीं, बी एच यू मने आपकी फैकल्टी और लाइब्रेरी नहीं। बी एच यू मने हॉस्टल। हॉस्टल मने ?
हॉस्टल मने मामू!
हर हॉस्टल की अपनी अपनी विभूतियाँ थीं।
हमारे आचार्य नरेन्द्र देव छात्रावास ( ए एन डी हॉस्टल) की आन,बान और शान थे,मामू।
मामू के बारे में कहा जाता था कि उनका न आदि था,न अंत।
वे स्नातक में प्रवेश ले कर आये थे, 1857 के ग़दर के आसपास।
अब वे शोध कर रहे थे।
कब से कर रहे थे, कब तक करेंगे, यह अपनेआप में एक शोध का विषय था।
वे हॉस्टल के डीह बाबा थे और उनका पूजन, अर्चन छात्रों का परम पुनीत कर्तव्य था।
मामू विश्वविद्यालय की दुनिया के बापों में थे।
अपने से बड़े बापों को वे धरती पर पटक कर सूत चुके थे।
बात बापपन की हो तो मामू काइयाँ से काइयाँ बाप पर, किसी भी दिन, भारी पड़ सकते थे।
छात्र नेता उनको सलाम करते थे और प्रोफेसर्स के साथ वो ड्रिंक करते थे।
परीक्षा के समय वे वाटर बॉटल में आधी बोतल एब्सोल्यूट वोदका और आधी बोतल लिम्का का मिश्रण भर कर ले जाते थे।
प्रश्न कोई भी आये हों, वे वही लिखते जो उन्होंने पिछले चौबीस घंटे में पढ़ा हो।
एक घंटे में इस कार्रवाई से फ़ारिग हो कर वे कक्ष निरीक्षक की ड्यूटी कर रहे गुरु जी को नॉन वेज जोक सुनाते, समोसे बँटवाते और परीक्षा के बाद (जो कि विश्वविद्यालय उनकी लेता था या वो विश्वविद्यालय की लेते थे, अंत तक स्पष्ट नहीं हो सका)
दंडकारण्य पहुँच कर आश्रम में अपनी कुटिया में घोड़े बेच कर सो जाते।
मामू व्यक्ति नहीं घटना थे (कुछ दुष्ट उन्हें दुर्घटना भी कहते थे )।
वे कहीं से भी साबुन, शैम्पू, पेस्ट ले सकते थे। आते-जाते किसी भी विद्यार्थी को मेस से खाना या गुमटी से सिगरेट लाने भेज सकते थे। यह किसी डर से नहीं, प्रेम से होता था।
मामू यहाँ थे, मामू वहाँ थे, मामू हर कहाँ थे। बड़े से बड़ा रंगबाज मामू के चरण छूता था।
मामू सचमुच मामू थे।
नोट्स चाहियें, किताब चाहिए, उधार पैसा चाहिए, कहीं राड़ा कर लिया, लाख दुखों की एक दवा थे मामू।
मामू का पेटेंट आशीर्वाद था, “दूधो नहाओ, पूतों फलों।”
कहा जाता था कि मामू किसी बहुत समृद्ध लेकिन टूटे परिवार के इकलौते फरजंद थे। हमें भी यही लगता है। वो दोनों हाथों से पैसा खर्च करते थे लेकिन थे औघड़बुद्धि। महिलाओं के मूड और मुंबई की बारिश की तरह अनप्रेडिक्टेबल।
जैसे यारों ने सिफारिश की, मामू ने वेज, नॉन वेज, तरल गरल सबकी ऐन चौचक व्यवस्था करवा दी।
पार्टी जम कर हो रही है। घंटे दो घंटे बाद किसी क्षण मामू विरक्त हो, एक निहायत ऊबी उबासी लेते हुए, चटाई उठा कर हॉस्टल की सूनी छत की ओर रवाना हो सकते थे।
जिस जोशो खरोश से मामू मस्ती करते थे, पार्टी करते थे वैसी ही बेरुखी निस्संगता से, सबसे पल्ला झाड़ कर चल भी देते थे।
कॉलेज के बाद कालांतर में इन्हीं मामू से भेंट हुई तो ये ‘मित्रवर’ उपाधि धारण कर चुके थे। अब उनका आशीर्वचन था, “अखंड सौभाग्यवती भव!”
समाप्त
(25.2.2023)
