दैनिक जागरण द्वारा वर्ष 2026 की दूसरी तिमाही यानी अप्रैल से जून के बीच सबसे ज्यादा बिकने वाली किताबों की सूची जारी की जा चुकी है। कथा, कथेतर, अनुवाद और कविता श्रेणी में यह सूची जारी की गयी है। कविता श्रेणी में जिन पुस्तकों ने जगह बनाई है वह निम्न हैं:
नास्तिक की प्रार्थना – मानव कौल

पुस्तक विवरण:
नास्तिक की प्रार्थना मानव कौल का कविता-संग्रह है। कविताओं की ओर लौटने, अपने भीतर के घर में वापस आने और बरसों से बची हुई बात को कह पाने की बेचैनी से जन्मी किताब।
मानव कौल ने अपनी रचनात्मक यात्रा की शुरुआत कविताओं से की थी। फिर नाटक, कहानियाँ और उपन्यास लिखते-लिखते वे अपनी ही भाषा से जैसे कुछ दूर चले गए। भीतर एक भूख बनी रही, घर लौटने की, अपनी पहली आवाज़ तक पहुँचने की। उनके लिए यह घर कविताएँ थीं।
एक उपन्यास पर काम करते हुए जब उसका अंत एक कविता में खुला, तब उन्हें लगा कि वे फिर अपने घर के आसपास हैं, उसकी गलियों, आँगन और गंध के पास। उसी क्षण से कविताएँ लौटने लगीं। यह संग्रह उसी लौटने की यात्रा है।
‘नास्तिक की प्रार्थना’ उन कविताओं की किताब है, जो ‘कुछ कहना छूट गया है’ की टीस और भूख से निकली हैं। इसमें आत्मीयता है, बेचैनी है, स्मृति है और वह स्वाद है, जो लंबे समय बाद घर के खाने में मिलता है।
यह संग्रह पाठक को भी अपने भीतर के किसी पुराने, भूले हुए घर तक ले जा सकता है।
प्रकाशक: हिंद युग्म | पुस्तक लिंक: अमेज़न
बेबाक हूँ बेअदब नहीं – शालिनी सिंह

पुस्तक विवरण:
‘बेबाक हूँ बेअदब नहीं’ एक ऐसी पुस्तक है, जिसमें हर शब्द दिल की गहराई से निकली भावनाओं और अनुभूतियों से रंगा हुआ है। यह संग्रह शेरो-शायरी के माध्यम से जीवन के विभिन्न पहलुओं को उजागर करता है, जहाँ हर शेर एक नई दुनिया का दरवाज़ा खोलता है। यह पुस्तक शायरी प्रेमियों के लिए एक अनोखा अनुभव है, जो पाठकों को भावनाओं की गहराइयों में ले जाती है। इसके जरिए आप एक ऐसी शख़्सियत से रूबरू होते हैं, जो अपने शब्दों से आपको कला की एक अनूठी दुनिया में प्रवेश कराती हैं। शालिनी सिंह की लेखनी इतनी प्रभावशाली है कि उनके शब्द आसानी से पाठकों के दिल और दिमाग में अपनी जगह बना लेते हैं। यह पुस्तक आपको कला की एक ऐसी अनूठी दुनिया में ले जाएगी, जहाँ आप ख़ुद को और अपनी भावनाओं को जुड़ा हुआ महसूस करेंगे।
प्रकाशक: ओम बुक इंटरनेशनल | पुस्तक लिंक: अमेज़न
उस से मुहब्बत – वरुण आनंद

पुस्तक विवरण:
‘उस से मुहब्बत’ इस उन्वान से ही ज़ाहिर है कि वरुण आनंद की शायरी का ये मजमूआ, मुहब्बत की ग़ज़लों, नज़्मों और मसनवियों से सजा है। मुहब्बत की शायरी की इस किताब में महबूब से इजहार है, शिकायतें हैं और जुदाई के लम्हें दर्ज हैं। यहाँ मुहब्बत का हर रंग देखने को मिलेगा तो कहीं कहीं तंज़ का रंग इसे और दिलकश बनाता है। वरुण आनंद की शायरी आधुनिकता और परम्परा का अद्वितीय संगम है। एक ओर जहाँ आज की बातों को उनकी ग़ज़लों में जगह मिली है वहीं बड़ी बहर की पारम्परिक ग़ज़लें, नज़्में और मसनवियाँ इसे परम्परा का गाढ़ा रंग देती हैं।
प्रकाशक: अंबाउंड स्क्रिप्ट | पुस्तक लिंक: अमेज़न
पंछियों का सरदार – संदीप द्विवेद्वी

पुस्तक विवरण:
संदीप द्विवेदी हिन्दी के चर्चित मोटिवेशनल कवि हैं, जिनकी कविताएँ न केवल प्रेरित करती हैं, बल्कि भीतर छुपी हुई हिम्मत को जगाने का काम भी करती हैं। ‘पंछियों का सरदार’ उनके चुनिंदा और श्रेष्ठ प्रेरक कविताओं का एक सशक्त संग्रह है, जो संघर्ष, आत्मविश्वास और हार न मानने की भावना को केंद्र में रखता है।
प्रकाशक: अंबाउंड स्क्रिप्ट | पुस्तक लिंक: अमेज़न
ईश्वर और बाज़ार – जसिंता केरकेट्टा

पुस्तक विवरण:
दिवासी जन-जीवन पर मँडराते सभ्यता-प्रेषित ख़तरों को पहचानना, सीधे-सरल ढंग से उन्हें शब्दों में अंकित करना और नागर केंद्रों से जंगलों-पहाड़ों की तरफ़ बढ़ते विकास की आक्रामक मुद्राओं का सशक्त प्रतिवाद गढ़ना जसिंता केरकेट्टा की कविताओं की विशेषताएँ रही हैं। उनकी कविताएँ अपनी सहज और संवादपरक मुद्रा में आदिवासी समाज की पीड़ाओं को समग्रता के साथ हम तक पहुँचाती रही हैं। इन कविताओं में उनके इस मूल स्वर के साथ कुछ और भी जुड़ा है। संग्रह में संकलित कई कविताएँ ऐसी हैं जो शोषण के चालाक षड्यंत्रों में ईश्वर की अवधारणा और असहाय जन-मानस में उसके भय की भूमिका को चीन्हती हैं। भीतर और बाहर की कई जकड़नों में धर्म, ईश्वर और आस्था ने जिस तरह मनुष्य-विरोधी ताक़त के रूप में काम किया है, वह बृहत् भारतीय समाज की विडम्बना है; लेकिन आदिवासी साधनहीनता पर उनका प्रभाव और भी घातक होता है।
‘मज़दूर जब अपने अधिकार के लिए उठे/तो कुछ ईश्वर भक्तों ने उनसे/हाथ जोड़कर प्रार्थना करने को कहा।’ और ‘धीरे-धीरे हर हिंसा हमारे लिए/ईश्वर द्वारा ली जा रही परीक्षा बन गई।’
इस विडम्बना को ये कविताएँ हर सम्भव कोण से पकड़ने का प्रयास करती हैं।आधुनिक शहरी सभ्यता के सम्पर्क से आदिवासी जीवन शैली में दिखाई देने वाली विरूपताओं की तरफ़ भी जसिंता की नज़र गई है जिससे पता चलता है कि विकास का हमला सिर्फ़ जंगल के संसाधनों और वहाँ के निवासियों के दोहन तक ही सीमित नहीं है, वह उनके सांस्कृतिक बोध को भी विकृत कर रहा है।जल, जंगल और आदिवासी जीवन से बाहर देश के सामान्य हालात भी इस संग्रह की कविताओं में जगह-जगह झाँकते दिखाई देते हैं। सत्ता का तानाशाही मिज़ाज हो या अपने ही देश की सैनिक ताक़त को अपने ही लोगों के ख़िलाफ़ इस्तेमाल करने की प्रवृत्ति, कुछ भी कवि की निगाह से नहीं चूकता। यह संकलन निश्चय ही जसिंता की रचना-यात्रा का अगला चरण है।
प्रकाशक: राजकमल प्रकाशन | पुस्तक लिंक: अमेज़न
