संस्मरण: हीरोगिरी - दिलीप कुमार

संस्मरण: हीरोगिरी – दिलीप कुमार

90 के दशक में फिल्में देखना भी उस समय के किशोरों के लिए एक तरह की जद्दोजहद ही हुआ करती थी। अधिकतर घरों में इसे व्यसन माना जाता था और घरवालों की कोशिश रहती थी कि वो फिल्मों से दूर रहें। पर उस समय के किशोर और युवा छुपते छिपाते कई परेशानियाँ उठाकर भी अपनी फिल्म देखने की इच्छा को पूरा करते थे। अगर आपने उस समय को जिया है तो आपने भी उस समय के अधिकतर किशोरों की तरह फिल्म देखने के लिए कई पापड़ बेले होंगे। फिल्म देखने से जुड़ी अपनी ऐसी ही याद लेखक दिलीप कुमार हमारे साथ साझा कर रहे हैं। आप भी पढ़ें:

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