लघु-कथा: उस पार का योगी – जयशंकर प्रसाद

लघु-कथा: उस पार का योगी - जयशंकर प्रसाद

सामने संध्या-धूसरति जल की एक चादर बिछी है। उसके बाद बालू की बेला है, उसमें अठखेलियाँ करके लहरों ने सीढ़ी बना दी है। कौतुक यह है कि उस पर भी हरी-हरी दूब जम गयी है। उस बालू की सीढ़ी की ऊपरी तह पर जाने कब से एक शिला पड़ी है। कई वर्षाओं ने उसे अपने पेट में पचाना चाहा, पर वह कठोर शिला गल न सकी, फिर भी निकल ही आती थी। नंदलाल उसे अपने शैशव से ही देखता था। छोटी-सी नदी, जो उसके गाँव से सटकर बहती थी, उसी के किनारे वह अपनी सितारी लेकर पश्चिम की धूसर आभा में नित्य जाकर बैठ जाता। जिस रात को चाँदनी निकल आती, उसमें देर तक और अँधेरी रात के प्रदोष में जब तक अंधकार नहीं हो जाता था, बैठकर सितारी बजाता अपनी टपरियों में चला जाता था।

नंदलाल अँधेरे में डरता न था। किंतु चंद्रिका में देर तक किसी अस्पष्ट छाया को देख सकता था। इसलिए, आज भी उसी शिला पर वह मूर्ति बैठी है। गैरिक वसन की आभा सांध्य-सूर्य से रंजित नभ से होड़ कर रही है। दो-चार लटें इधर-उधर मांसल अंश पर वन के साथ खेल रही हैं। नदी के किनारे प्राय: पवन का बसेरा रहता है, इसी से यह सुविधा है। जब से शैशव-सहचरी नलिनी से नंदलाल का वियोग हुआ है, वह अपनी सितारी से ही मन बहलाता है, सो भी एकांत में; क्योंकि नलिनी से भी वह किसी के सामने मिलने पर सुख नहीं पाता था। किंतु हाय रे सुख! उत्तेजनामय आनंद को अनुभव करने के लिए एक साक्षी भी चाहिए। बिना किसी दूसरे को अपना सुख दिखाए हदय भली-भाँति से गर्व का अनुभव नहीं कर पाता। चंद्र-किरण, नदी-तरंग, मलय-हिल्लोल, कुसुम-सुरभि और रसाल-वृक्ष के साथ ही नंदलाल को यह भी विश्वास था कि उस पार का योगी भी कभी-कभी उस सितारी की मीड़ से मरोड़ खाता है। लटें उसके कपोल पर ताल देने लगती हैं।

चाँदनी निखरी थी। आज अपनी सितारी के साथ नंदलाल भी गाने लगा था। वह प्रणय-संगीत था—भावुकता और काल्पनिक प्रेम का सम्भार बड़े वेग से उच्छ्वसित हुआ। अंतःकरण से दबी हुई तरलवृत्ति, जो विस्मृत स्वप्न के समान हलका प्रकाश देती थी, आज न जाने क्यों गैरिक निर्झर की तरह उबल पड़ी। जो वस्तु आज तक मैत्री का सुख-चिह्न थी—जो सरल ह्रदय का उपहार थी—जो उदारता की कृतज्ञता थी—उसने ज्वाला, लालसापूर्ण प्रेम का रूप धारण किया। संगीत चलने लगा।

“अरे कौन है… मुझे बचाओ… आह…,” पवन ने उपयुक्त दूत की तरह यह संदेश नंदलाल के कानों तक पहुँचाया। वह व्याकुल होकर सितारी छोड़ कर दौड़ा। नदी में फाँद पड़ा। उसके कानों में नलिनी का सा स्वर सुनाई पड़ा। नदी छोटी थी—खरस्रोता थी। नंदलाल हाथ मारता हुआ लहरों को चीर रहा था। उसके बाहु-पाश में एक सुकुमार शरीर आ गया।

चंद्रकिरणों और लहरियों को बातचीत करने का एक आधार मिला। लहरी कहने लगी, “अभागे! तू इस दुखिया नलिनी को बचाने क्यों आया, इसने तो आज अपने समस्त दु:खों का अंत कर दिया था।”

किरण, “क्यों जी, तुम लोगों ने नंदलाल को बहुत दिन तक बीच में बहा कर हल्ला-गुल्ला मचाकर, बचाया था।”

लहरी, “और तुम्हीं तो प्रकाश डालकर उसे सचेत कराती रही हो।”

किरण, “आज तक उस बेचारे को अँधेरे में रक्खा था। केवल आलोक की कल्पना करके वह अपने आलेख्य पट को उद्‌भासित कर लेता था। उस पार का योगी सुदूरवर्ती परदेशी की रम्य स्मृति को शांत तपोवन का दृश्य था।”

लहरी, “पगली! सुख-स्वप्न के सदृश और आशा में आनंद के समान मैं बीच में पड़ी-पड़ी उसके सरल नेह का बहुत दिनों तक संचय करती रही—आंतरिक आकर्षणपूर्ण सम्मिलन होने पर भी, वासना-रहित निष्काम सौंदर्यमय व्यवधान बन कर मैं दोनों के बीच में बहती थी; किंतु नंदलाल इतने में संतुष्ट न हो सका। उछल-कूद कर हाथ चलाकर मुझे भी गँदला कर दिया। उसे बहने, डूबने और उतराने का आवेश बढ़ गया था।”

किरण, “हूँ, तब डूबें बहें।”

पवन चुपचाप इन बातों को सुन कर नदी के बहाव की ओर सर्राटा मार कर संदेशा कहने को भगा। किंतु वे दूर निकल गये थे। सितारी मूच्र्छना में पड़ी रही।

समाप्त


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Author

  • जयशंकर प्रसाद

    जन्म: 30 जनवरी 1889
    निधन: 15 नवम्बर 1937

    जयशंकर प्रसाद छायावादी युग के प्रमुख स्तम्भों में से एक थे। वह कवि, नाटककार, और् उपन्यासकार थे।

    प्रमुख रचनाएँ: छोटा जादूगर (कहानी), इंद्रजाल(कहानी), कंकाल (उपन्यास), तितली (उपन्यास) इत्यादि।

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