खेल खिलाड़ी: और सुनील गावस्कर घूम गये!

खेल खिलाड़ी: और सुनील गावस्कर घूम गये! - योगेश मित्तल

योगेश मित्तल ने सरदार मनोहर सिंह की पत्रिका खेल खिलाड़ी में सम्पादक के तौर पर भी कार्य किया था। वह इस पत्रिका के लिए तस्वीरें निकालने का भी काम करते थे। अपने इस संस्मरण में वह क्रिकेट खिलाड़ियों की तस्वीरों को निकालने से जुड़ा एक संस्मरण साझा कर रहे हैं। आप भी पढ़ें:


दिलीप उन दिनों दलीप ट्रॉफी का एक मैच फिरोज शाह कोटला में उत्तर क्षेत्र से खेलने आये थे और दोनों टीमों के खिलाड़ी जनपथ होटल में ठहराए गए थे।

दिल्ली के जनपथ होटल में दिलीप वेंगसरकर के साथ मैं - एक यादगार क्षण।
दिल्ली के जनपथ होटल में दिलीप वेंगसरकर के साथ मैं – एक यादगार क्षण।

तब फिरोज शाह कोटला में सुनील गावस्कर ने मुझे बहुत खिझाया था और मुझे गावस्कर पर एक बेहतरीन लेख लिखने का सख्त अफ़सोस हुआ था। मेरी दो रील सिर्फ गावस्कर की फोटो खींचने के चक्कर में बरबाद हो गयीं थीं, लेकिन गावस्कर ने उस दिन खून के आँसू रुला दिया, क्योंकि मेरे पास और खिलाड़ियों की फोटो खींचने के लिए रील ही नहीं थी, जबकि मोहेंदर अमरनाथ, सुरेंदर अमरनाथ, लाला अमरनाथ, यशपाल शर्मा आदि की मैं आराम से तस्वीर खींच सकता था। सब बहुत अच्छे से मिल रहे थे और फोटो खिंचवाने के लिए तैयार थे। मगर मेरी बदकिस्मती यह थी कि मैं गावस्कर का पागलों जैसा फैन था और पहले उसी की तस्वीर खींचने की मन में जिद ठाने बैठा था। कपिल देव की एक तस्वीर अवश्य खींची थी, पर उसका प्रिंट नहीं है! हाँ, खेल खिलाड़ी में वह छपी थी, पर महीना और सन् याद नहीं।

हुआ यह था मैं जब भी गावस्कर की तस्वीर खींचने का प्रयास करता, गावस्कर घूम जाते थे। मेरा स्नैप खराब हो जाता। उन दिनों फोटोग्राफी बहुत महंगी थी। बारह स्नैप्स की ब्लैक एंड वाइट रील बीस रुपये की आती थी।

और बीस रुपये के माने क्या थे, इसी से समझ लीजिये कि दिल्ली के गांधीनगर के सुभाष मोहल्ला में रणवीर की डेरी का भैंस का सामने‑सामने दुहा दूध पचास पैसे किलो (लीटर) था। (दरअसल लीटर शब्द बोल-चाल की भाषा में प्रचलित नहीं था।)

गावस्कर बार-बार क्यों घूम जाते थे, इसका कारण था। तब खिलाड़ी इंटरव्यू देने अथवा फोटो खिंचवाने के पैसे माँगने लगे थे।

और खिलाड़ियों को उचित पैसा मिलना चाहिए, इसकी आवाज़ उठाने वाले सरदार बिशन सिंह बेदी थे। बिशन सिंह बेदी की कप्तानी के दिनों में पहली बार क्रिकेट खिलाड़ियों को अहसास हुआ था कि बीसीसीआई (BCCI) उनका शोषण कर रहा है।

गावस्कर तब टीम के उपकप्तान थे।

तब बहुत अच्छे से जिन लोगों से मुलाक़ात हुई, उनमे लाला अमरनाथ ऐसी शख्सियत थे, जिन्होंने मुझे सीने से लगाकर लिपटा लिया था सुरेंदर और मोहिंदर अमरनाथ भी प्रेम से मिले, लेकिन कपिलदेव जब टॉयलेट जा रहे थे, तब कुछ लड़कियों ने उन्हें घेर लिया था, तब मैं भी कपिल देव के निकट पहुँच गया था। मेरे हाथ में कैमरा था।

कपिलदेव ने लड़कियों से बचने के लिए मुझे एक हाथ से लिपटा लिया और बोले, “यहाँ फोटो मत खींचना।”

मैंने उनकी बात मानकर टॉयलेट की गैलरी में उनकी फोटो नहीं खींची थी।


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Author

  • योगेश मित्तल

    25 मार्च 1957 को दिल्ली के चांदनी चौक के पत्थरवालान में जन्में योगेश मित्तल के बचपन के कुछ वर्ष सिविल लाइन्स, शाहदरा में व्यतीत हुए। शाहदरा के बाद उन्होंने कुछ वर्ष चुरू, राजस्थान में गुज़ारे। उसके बाद 1963 से 1968 तक वे अपने परिवार के साथ कलकत्ता में रहे और फिर 1969 में दिल्ली आकर दिल्ली में ही बस गए। तब से लेकर अब तक वह दिल्ली में ही रहते आये हैं।

    कलकत्ता में रहते हुए ही योगेश मित्तल की पहली कविता व कहानी 1964 में कलकत्ता के दैनिक समाचार पत्र 'सन्मार्ग' के 'बालजगत' स्तम्भ में छपी।

    1969 में दिल्ली आने के पश्चात उनकी रचना जब गर्ग एंड कम्पनी की पत्रिका 'गोलगप्पा' में छपी तो वो प्रकाशक ज्ञानेंद्र प्रताप गर्ग की नज़र में आये। इसके पश्चात शुरू हुआ लेखन का सिलसिला आज पाँच दशक से भी ऊपर का समय गुजरने के बाद भी अनवरत ज़ारी है।

    लेखन की पहली पारी में योगेश मित्तल का अधिकतर लेखन ट्रेड नाम के लिए किया गया है। उपन्यास लेखन के अतिरिक्त उन्होंने खेल पत्रकारिता, कॉमिक बुक लेखन और सम्पादन के क्षेत्र में भी कार्य किया।

    अपने लेखन की दूसरी पारी में अब अपने नाम से उनकी पुस्तकें प्रकाशित हो रही हैं।  प्रेतलेखन, वेद प्रकाश शर्मा: यादें बातें और अनकहे किस्से, शैतान: जुर्म के खिलाड़ी नीलम जासूस कार्यालय से और  चांदी की चोंच, लड्डू मास्टर की भैंस, लोमड़ी का दूल्हा, काठ की अम्मा लायंस पब्लिकेशंस से प्रकाशित हुई हैं।

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