पुस्तक अंश: वही छोटा-सा तिरछा दाँत – राम ‘पुजारी’

वही छोटा-सा तिरछा दाँत - राम 'पुजारी' | फ्लाईड्रीम्स पब्लिकेशंस

किशोरवय उम्र के प्यार का असर कुछ और ही होता है। वो ज्यादा मारक होता है। फिर 90 के दशक में जब सम्पर्क के माध्यम कम होते थे तो ऐसे प्रेम की कसक अपने चरम पर होती थी। इसी दशक के दो किरदारों कृष्ण और श्रावणी की प्रेम कहानी लेखक राम ‘पुजारी’ अपने उपन्यास ‘वही छोटा-सा तिरछा दाँत’ में पाठकों के समक्ष लेकर आए हैं। एक बुक जर्नल पर पढ़ें इस उपन्यास का प्रथम अध्याय ‘पहली नज़र’:


पहली नज़र

“अरे, वो कत्थई बालों वाली लड़की, जिसके कंधे पर गुलाबी रंग का बैग है, वही तो है।” कृष्ण सिंह को कोहनी मारते हुए उसके साथ खड़े एक दोस्त ने कहा।

“क्या यही है श्रावणी जोशी?” कृष्ण एक लड़की की ओर देखते हुए बोला, “पहले क्यों नहीं दिखाई दी, छुट्टी पर थी क्या श्रावणी जोशी?”

“श्रावणी जोशी! भाई इसे तो सब माता जी कहते हैं!” दोस्त ने हँसी उड़ाते हुए कहा।

“क्यों? माता जी जैसी दिखती तो नहीं है, फिर तुम माता जी क्यों कहते हो?” कृष्ण की आँखें अभी भी नाज़ुक, संतुलित काया वाली श्रावणी पर ही टिकी थीं, जो स्कूल कम्पाउंड से होते हुए जीने की ओर जाने वाले ईंटों से बने हुए रास्ते की ओर बढ़ रही थी। उसके चलने में एक हल्की-सी थिरक थी, ऐसी जो अपनी उम्र की सादगी और ताज़गी अपने आप दिखा देती है।

उसकी मंज़िल थी बारहवीं ‘बी’, जो की दूसरी मंज़िल पर थी, जिसके सामने कॉरिडोर में दीपक और कृष्ण खड़े थे।

कृष्ण का इस स्कूल में आज तीसरा दिन था। इससे पहले वह दिल्ली के एक प्रतिष्ठित स्कूल में था। लेकिन पिता का यहाँ ट्रांसफ़र होने के कारण उसका दाखिला इलाके के एकमात्र कॉन्वेंट स्कूल में करा दिया गया था। उसके पिता विक्रमवीर सिंह, केंद्रीय निर्माण विभाग में बड़े इंजीनियर थे, जिनका यहाँ इस पहाड़ी कस्बे में हाल ही में ट्रांसफ़र हुआ था।

कृष्ण पहले दिन से ही श्रावणी के बारे में सुन रहा था। लड़कों ने बताया था कि श्रावणी बेहद खूबसूरत और पढ़ाकू लड़की है। वह स्कूल के प्रिंसिपल ब्रदर टी जे जोसफ से लेकर चपरासी पूरन सिंह तक सभी की चहेती थी। ये उसकी प्रशंसा करते कभी थकते नहीं थे। वैसे देखा जाया तो श्रावणी थी ही ऐसी।

श्रावणी सीढ़ियों से ऊपर आयी। एक नज़र दोनों पर डाली और ‘हाय’ कह कर क्लास-रूम में दाखिल हो गयी।

“बड़ी बुझी-बुझी सी लग रही है।” दोस्त बोला, “लगता है बीमार थी!” वह भी अब क्लास में दाखिल हो चुका था और अपनी सीट पर था।

कृष्ण ने अपनी भूरी आँखों से दोस्त की ओर देखा पर कुछ कहा नहीं। उसकी सुंदर मगर सूनी आँखें देखकर वह दोस्त भी कुछ बोला। दोस्त का नाम दीपक था। दीपक ही वह पहला लड़का था जिससे कृष्ण की सबसे पहले बात हुई थी। कृष्ण नहीं जानता था कि दीपक क्लास का शैतान और शरारती लड़का है।

अभी पहला पीरियड शुरू होने में 15 मिनट थे, पहले प्रेयर होनी थी, जिसके लिए सभी को नीचे ग्राउंड में इकठ्ठा होना था। कृष्ण की सीट ऐसी जगह थी जहाँ से श्रावणी का चेहरा साफ दिखाई दे रहा था। कृष्ण अपनी सीट पर बैठा सोच रहा था, इस नये स्कूल और नये साथियों के बारे में। वह जानता था कि उसका एडमिशन यहाँ किन परिस्थितियों में हुआ है।

लगभग दो महीने पहले वह अपने मम्मी-पापा, राजेश्वरी और विक्रम सिंह, के साथ दिल्ली के एक प्रतिष्ठित स्कूल में प्रिंसिपल ऑफिस में सिर झुकाए बैठा था। कृष्ण सफ़ाई दे रहा था, पर कोई भी उसकी बात नहीं सुन रहा था। वह खो चुका था। पापा और उसके बीच में बहुत कम बातचीत होती थी, इसीलिए उसने पापा से तो नहीं पर मम्मी से कई बार बात करने की कोशिश की थी। मगर मम्मी भी क्या करती, वह भी उसकी खिलाफ होने वाली शिकायतों से तंग आ चुकी थी। और, जब इस बार प्रिंसिपल ने घर पर फोन करके लड़की की शिकायत की बात की तो राजेश्वरी आग-बबूला हो गयी थी।

वह समझ चुकी थी कि अब फिर एक बार कृष्ण की हरकतों के कारण उन्हें शर्मिंदा होना पड़ेगा। उसे विक्रम सिंह के ऑफिस न चाहते हुए भी फोन करना पड़ा था। फ़ोन जब एक जूनियर महिला इंजीनियर ने उठाया तो वह तड़प उठी। अपनी भावनाओं को किसी तरह संयत करते हुए वह बस इतना ही कह पायी कि विक्रम सिंह जी को इन्फॉर्म कर दीजिए घर पहुँचे, अर्जेंट काम है।

घर पर जब विक्रम सिंह को पता चला तो वह राजेश्वरी पर ही चिल्लाने लगा था। उसने पूछा, “कब चलना है इसके स्कूल?”

और अगले दिन दोनों प्रिंसिपल ऑफिस में उनके सामने बैठे हुए थे और कृष्ण सिर झुकाए अपने चमकते हुए काले जूतों को देख रहा था, जिनके अग्रभाग पर स्टील का चमचमता हुआ बक्कल लगा हुआ था, जिसमें कोई चाहे तो अपना चेहरा भी देख सकता था। उसके मम्मी-पापा प्रिंसिपल मिसेज डायना डिसूजा के सामने अपने एकलौते बेटे कृष्ण की शरारतों की वजह से शर्मिंदा हो रहे थे।

“प्लीज मै’म, इस बार कृष्ण को माफ कर दीजिए। मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ कि कृष्ण ऐसा फिर से नहीं करेगा। चलो, सॉरी बोलो मै’म को।” कृष्ण के कंधे पर हाथ रखकर उस पर दबाव बनाते हुए विक्रम सिंह बोले, “सॉरी बोलो मै’म से।”

कृष्ण ने दाएँ बैठी हुई अपनी मम्मी राजेश्वरी की ओर बड़ी ही आशा से देखा। वहाँ पर हमदर्दी नहीं थी। नम आँखों से उसने बाएँ बैठे अपने पापा विक्रम सिंह को देखा, मानो कहना चाह रहा हो कि मैं बेकसूर हूँ, मैंने कुछ नहीं किया। मगर इस वक़्त पापा की आँखों में क्रोध और घृणा के सिवाय कुछ नहीं था।

वह अपने आपको नितांत अकेला महसूस कर रहा था। वह चुप ही रहा।

“मिस्टर सिंह, हाउ लॉन्ग एम आय सपोज़्ड टू इंड्योर दिस एंड कीप फॉर्गिविंग हिम एवरी टाइम? देयर’ज़ अ लिमिट टू फॉर्गिवनेस टू।” डायना मै’म गुस्से से तमतमाई हुई थी और सिर दाएँ-बाएँ हिलाते हुए बोले जा रही थीं — माफ़ करने की भी एक हद होती है। आख़िर कब तक ये ऐसे ही परेशान करता रहेगा और मैं माफ़ करती रहूँगी?

विक्रम सिंह ने एक नज़र कृष्ण की मम्मी राजेश्वरी की ओर देखा। आशय था वह कुछ बोले और बात को सम्हाल ले। राजेश्वरी इस घड़ी केवल एक माँ थी, अपने आपस के मन-मुटाव और लड़ाई-झगड़े एक तरफ करके जैसे ही वह बोलने को हुई, डायना मै’म अपनी चेयर से उठकर शेल्फ़ से एक फ़ाइल निकाल कर देखने लगी।

“ट्राइ टू अंडरस्टैंड, मुझे भी मैनेजमेंट को जवाब देना होता है। इस बार तो इसका नाम काटना ही पड़ेगा।” डायना मै’म दुखी स्वर में बोलीं, “सिगरेट पीते देखा तो समझाया। क्लास रूम में व्हिस्की पीने से लेकर हुड़दंग मचाते देखा तो डाँटा। टॉइलेट में गंदे चित्र बनाए और अपनी क्लास की लड़कियों के नाम लिखे तो वॉर्निंग लेटर दिया। मगर आप दोनों ने क्या किया? कभी कृष्ण के साथ बैठे, बात की… आख़िर वह ऐसा क्यों करता है बताओ? तुम्हें अपने मंदिरों और एनजीओ से फुरसत नहीं और इन्हें अपने काम से।”

राजेश्वरी उठकर प्रिंसिपल के पास पहुँची जो खिड़की से बाहर ग्राउंड में खेलते हुए बच्चों को देख रही थी। वह प्रार्थना भरे स्वर में बोली, “मै’म, प्लीज़ कृष्ण का नाम न काटिए, इस समय इसे कहीं एडमिशन भी नहीं मिलेगा। इसके भविष्य का सवाल है!”

कृष्ण के पापा ने एक नज़र अपनी रिस्ट वॉच पर डाली, फिर खुद भी चेयर से उठकर उन दोनों के पास पहुँचे और विनती करते हुए बोले, “मै’म, कृष्ण के भविष्य का क्या होगा?”

“कृष्ण के भविष्य का? कभी ये सोचा है… इस स्कूल के नाम और प्रतिष्ठा का क्या होगा? चलो, मैं इस बार भी इसे बचा लूँ तो क्या गारंटी है कि यह फिर से ऐसी हरकत नहीं करेगा। इसने लड़की की स्कर्ट के नीचे… न जाने क्या करना चाहता था। उसके बाद उस लड़की की जो हँसी उड़ाई है इसने और इसके दोस्तों ने। बेचारी के तो आँसू ही नहीं रुक रहे थे। भला हो गाइडेंस टीचर का जो लड़की को समझा-बुझा कर मेरे पास ले आयी। एंड यू से, व्हाट विल हैपन टू हिस फ्यूचर? नहीं, इस बार इसका नाम काटना ही पड़ेगा, तभी इसको और इसके जैसों को सीख मिलेगी। अब आप जा सकते हैं।” अपनी चेयर पर बैठते हुए प्रिंसिपल बोली।

विक्रम सिंह और राजेश्वरी के सामने कोई और चारा नहीं था। कृष्ण की ओर हिकारत से देखते हुए वह प्रिंसिपल ऑफिस से बाहर आ गए। उनके बाहर निकलते ही अंदर टेलीफ़ोन की घंटी बज उठी।

तभी स्कूल में घंटी बजी और कृष्ण अपनी यादों से वर्तमान में आया, घंटी बजने पर सभी बच्चे प्रेयर में जाते थे। कुछ ही क्षणों में क्लास-रूम खाली हो चुका था, अपने स्कूल बैग रख कर सभी ग्राउंड में जा चुके थे सिवाय कृष्ण के। कृष्ण भी नीचे जाने को हुआ।

उसे ग्राउंड फ्लोर पर श्रावणी दिखाई दी, जो इस वक़्त माइक और एक्सेसरीज़ ले कर ग्राउंड की तरफ जा रही थी।

कृष्ण ने अपने मन में सोचा— ओ माइ गॉड, इसकी आँखें तो नीली हैं…आसमान-सी नीली!

उसके दिमाग़ में कुछ विचारों ने जन्म लिया। वह मुस्कुराने लगा।

ज़मीन से करीब दो फूट ऊँचे सीमेंट के बड़े से प्लेटफ़ार्म पर दो लड़कों और दो लड़कियों के अलावा स्पोर्ट्स टीचर, प्रिंसिपल ब्रदर जोसफ व अन्य टीचर भी थे। उन्हें श्रावणी का इंतज़ार था। प्रेयर उसी ने करवानी थी।

प्रेयर शुरू हुई —

तेरी है ज़मीन तेरा आसमां
तू बड़ा मेहरबां तू बख्शीश कर
तेरी है जमीन तेरा आसमां
तू बड़ा मेहरबां तू बख्शीश कर
सभी का है तू, सभी तेरे
ख़ुदा मेरे तू बख्शीश कर

कुछ बच्चे आँखें मूँदें प्रेयर कर रहे थे और कुछ आँखें खोले मस्ती। जो आँखें खोले खड़े थे, उनमें एक नाम और जुड़ गया था। ये नाम था — कृष्ण।

कृष्ण श्रावणी की मीठी आवाज़ पर मोहित हो चुका था। उसे संगीत का शौक था। जब कभी अकेला होता तो बाँसुरी और माउथ ऑर्गन बजा कर ही समय बिताया करता था।

उसी दिन रिसेस में ब्रेड-पकोड़ा लेने के लिए लाइन में घुसते हुए एक लड़के से कृष्ण झड़प हो गयी। यह प्रदीप नेगी था। दीपक नेगी का छोटा भाई— उसके चाचा का लड़का। दीपक ने बीच में आकर बात सम्हाल ली और प्रदीप को बताया— नया है, अपना दोस्त है।

फिर तीनों एक कोने में बैठ गए और लाइन में खड़ी हुई श्रवणी को ‘देखने’ लगे।

श्रावणी भी उन्हें ही देख रही थी, फिर काउंटर वाले भैया ने खुद ही बुलाकर उसे एक सैंडविच पकड़ा दिया।

जवाब में श्रावणी ने मुस्कुराते हुए कहा, “थैंक यू दद्दा।”

दीपक बोला, “देखा। देखा तूने… कैसे बिना लाइन के ही उसे सैंडविच दे दिया।”

“पर वो तो लाइन में ही खड़ी थी।” कृष्ण ने बिना दीपक की ओर देखे जवाब दिया। उसकी नज़रें तो श्रावणी के कानों में पड़ी पतली-पतली सुनहरी बालियों पर ही ठहरी हुई थी।

प्रदीप थोड़ा उत्तेजित होकर बोला, “यही तो। भाई यही ती उसकी अदा ठहरी। उसके भीलेपन और मासूमियत का जादू इस स्कूल के सभी प्राणियों पर चढ़ा हुआ है। सच कह रहा हूँ, कई बार मैंने इसके पास गिलहरी और तोतों को भी बैठे देखा… इसने सभी को सम्मोहित कर रखा।”

“जाने दे न।” दीपक बीच में बोला, “अपना ब्रेड-पकोड़ा खा, कभी-कभी तो आती है ये… यहाँ पर। नहीं तो जब देखो इसके टिफिन में दाल-चावल, सब्जी। बेचारी गरीब कहीं की। कृष्ण, सर्दियों में देखना, इसके पास एक पुराना-सा लाल स्वेटर है, वही पहन कर आएगी। तीन सालों से वही स्वेटर पहन रही…”

“ये ग़रीब है क्या?” कृष्ण ने पूछा।

“और नहीं तो, इसके पापा यहाँ टीचर न होते तो इसका एडमिशन भी नहीं होता यहाँ।” प्रदीप तरस खाते हुए बोला, “गरीब कहीं की… च्च च्च!”

कृष्ण सोचने लगा। ग़रीब और मुख पर राजकुमारियों वाली आभा। वह सोचने लगा — होगी बेचारी की कोई मजबूरी।

श्रावणी जोशी इस वक़्त अपनी स्कूल यूनिफॉर्म सफ़ेद सूट-सलवार और लाल दुपट्टे में थी। उसने अपना दुपट्टा जो कि एक कंधे से लटकता हुआ कैंटीन के फ्लोर को चूम रहा था, ठीक किया और एक नज़र इन तीनों पर डाल कर, मुस्कुराते हुए बाहर चली गयी।


श्रावणी सब को कैसे मोहित कर लेती थी? कृष्ण के दिल में क्या था? दीपक और प्रदीप को क्यों लगता था कि श्रावणी साधारण कन्या नहीं है? जानने के लिए पढ़िए, यह मासूम प्रेम कहानी ‘वही छोटा-सा तिरछा दाँत‘।

पुस्तक के विषय में:

वही छोटा-सा तिरछा दाँत - राम 'पुजारी' | फ्लाईड्रीम्स पब्लिकेशंस
वही छोटा-सा तिरछा दाँत – राम ‘पुजारी’ | फ्लाईड्रीम्स पब्लिकेशंस

नब्बे के दशक के पहाड़ी कस्बे में, स्कूल की घंटियों और प्रार्थनाओं के बीच जन्म लेती है एक मासूम-सी प्रेमकहानी। कृष्ण — गलतफहमियों, टूटते रिश्तों और किशोरावस्था की भटकन से जूझता हुआ लड़का; और श्रावणी— शांत, संवेदनशील, अपने अकेलेपन और कस्बे की अफ़वाहों के बीच खड़ी लड़की।

पहली नज़र का आकर्षण धीरे-धीरे भरोसे, चाहत और दर्द में बदलता है। यह उपन्यास सिर्फ़ स्कूल वाला इश्क़ नहीं, बल्कि उस उम्र का सच है जहाँ हर भावना गहरी होती है और हर गलती भारी पड़ती है।

‘वही छोटा-सा तिरछा दाँत’ यादों, पछतावे और पहले प्यार की वह कहानी है, जो मुस्कुराते हुए भी भीतर तक चुभ जाती है।

पुस्तक लिंक: अमेज़न | साहित्य विमर्श


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