हिंदी के मशहूर अपराधकथा लेखक सुरेन्द्र मोहन पाठक की आत्मकथा के पाँचवे खंड का प्रीऑर्डर शुरु हो गया है। लेखक की आत्मकथा का पाँचवा खंड ‘एक सीस का मानवा’ साहित्य विमर्श प्रकाशन द्वारा प्रकाशित किया जा रहा है।

अपनी आत्मकथा के इस पाँचवे खंड में लेखक ने अपने जीवन के उन अनछुए पहलुओं को पाठकों के सामने रखा है जिनका जिक्र अभी तक जारी चार खंडों (‘ना बैरी न कोई बेगाना‘, ‘हम नहीं चंगे बुरा ना कोय‘, ‘निंदक नियरे राखिए‘, ‘पानी केरा बुदबुदा‘) में नहीं हुआ है। मूलतः चार खंडों में विभाजित इस आत्मकथा में उनकी विदेश यात्राओं, उनके जीवन के कुछ यादगार पलों, साहित्य समारहों के अनुभवों और उम्र के इस पड़ाव पर हुए उनके मौजूदा अनुभवों को जगह दी गयी है।
सुरेन्द्र मोहन पाठक की आत्मकथा के पाँचवे खंड ‘एक सीस का मानवा’ को उनके प्रशंसक साहित्य विमर्श की वेबसाइट पर जाकर प्री ऑर्डर कर सकते हैं।
सुरेंद्र मोहन पाठक के संबंध में
सुरेंद्र मोहन पाठक का जन्म 19 फरवरी, 1940 को पंजाब के खेमकरण में हुआ था। विज्ञान में स्नातकोत्तर उपाधि हासिल करने के बाद उन्होंने भारतीय दूरभाष उद्योग में नौकरी कर ली। युवावस्था तक कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय लेखकों को पढ़ने के साथ वह मौलिक लेखन करने लगे। बाजार में उनके कुछ उपन्यासों के आने के बाद उन्होंने मारियो पूजो और जेम्स हेडली चेज़ के उपन्यासों का अनुवाद भी शुरू किया। सन 1959 में, आपकी अपनी कृति, प्रथम कहानी ’57 साल पुराना आदमी’ मनोहर कहानियाँ नामक पत्रिका में प्रकाशित हुई। आपका पहला उपन्यास ‘पुराने गुनाह नए गुनाहगार’, सन 1963 में ‘नीलम जासूस’ नामक पत्रिका में छपा था। सुरेंद्र मोहन पाठक के प्रसिद्ध उपन्यास असफल अभियान और खाली वार थे, जिन्होंने पाठक जी को प्रसिद्धि के सबसे ऊँचे शिखर पर पहुँचा दिया। इसके पश्चात उन्होंने अभी तक पीछे मुड़ कर नहीं देखा। उनका पैंसठ लाख की डकैती नामक उपन्यास अंग्रेज़ी में भी छपा और उसकी लाखों प्रतियाँ बिकने की ख़बर चर्चा में रही। उनकी अब तक 313 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं।
