होली के अवसर पर जबकि चारों ओर अबीर-गुलाल की धूम मची थी, कुछ कम्युनिस्ट लोग एक कमरे में जमा थे। यद्यपि इनके वस्त्र भी होली के रंग में रंगे हुए थे, पर इनके मुखमंडल पर होली की मुद्रा का चिन्ह भी नहीं था। ऐसा प्रतीत होता था कि किसी बड़ी गम्भीर समस्या पर विचार हो रहा है।
सहसा एक महाशय बोले, “जब तक कम्यूनिज़्म स्थापित नहीं होता तब तक ये बातें बंद नहीं हो सकतीं।”
“बंद हों चाहे न हों, परंतु हम लोगों को तो विरोध करना ही चाहिए।” दूसरे ने कहा।
“हम लोगों को होली में भाग न लेना चाहिए।” तीसरा बोला।
“हाँ? साथ ही एक सभा करके होली का विरोध करना चाहिए।”
“सभा तो खैर होनी ही चाहिए परंतु और कुछ भी होना चाहिए।”
“और क्या होना चाहिए?”
“कोई ऐसा कार्य जो प्रभावोत्पादक हो।”
सब लोग सोचने लगे परंतु साम्यवादी मस्तिष्क होने के कारण किसी को कुछ न सूझा। साम्यवादी मस्तिष्क की यही विशेषता है कि वह ऐसी ही बात सोचेगा जो सबको सूझ जाय। जो बात सर्वसाधारण की सूझ के परे होती है वह साम्यवादी मस्तिष्क को कभी सूझ ही नहीं सकती।
एक महाशय ने पूछी, “रूस में तो होली होती नहीं।”
“जी नहीं।”
“तब तो केवल यही हो सकता है कि या तो इसमें होली खेलने की प्रथा स्थापित हो अथवा हिंदुस्तान में होली बंद कर दी जाय।इनमें से कौन सा कार्य सरल है?”
“दोनों कार्य कठिन हैं।”
“यह बात ठीक है! मान लिया कि दोनों कठिन हैं।”
“यह बात आप साम्यवाद के विरुद्ध कर रहे हैं कि थोड़े से व्यक्ति एक बात पर विचार कर रहे हैं। सबको विचार करने का अवसर देना चाहिए।”
“तो सभा का आयोजन किया जाय, उससे सब लोग विचार कर लेंगे।”
“हाँ, यह ठीक है। ऐसा ही होना चाहिए।”
अतः दूसरे दिन संध्या समय एक सभा की गयी। अपनेराम भी उसमें सम्मिलित हुए, यद्यपि अपनेराम साम्यवादी नहीं है; परंतु कुछ साम्यवादी मित्रों की कदाचित यह आशा है कि आगे चलकर अपनेराम भी उनके गोल में सम्मिलित हो जाएँगे। इसी कारण वे अपनेराम के साथ खास रियायत करते हैं।
खैर साहब, सभा के समय के पंद्रह मिनट पूर्व अपनेराम सभास्थल में जा पहुंँचे। कुछ लोग आ गये थे और कुछ आ रहे थे। अपनेराम एक कोने में जा बैठे।
सभा का समय हो गया; परंतु मंत्री जी गायब थे। अपनेराम ने पूछा, “क्या देर-दार है?”
“जरा मंत्री जी आ जाएँ तब कार्यवाही आरम्भ हो।”
“मन्त्री जी को इतना विलम्ब क्यों हुआ? उन्हें तो सबसे पहले आना था।” एक महाशय बोले।
अपनेराम ने कहा, “सबसे पहले आ जाना साम्यवाद के विरुद्ध है।”
“क्यों? विरुद्ध क्यों है?”
“मंत्री जी में कौन से सुर्खाब के पर लगे हैं जो वह पहले ही आकर डट जायँ? साम्यवाद के अर्थ तो यह हैं कि सब एक साथ आवें और सब एक साथ जायंँ।”
“परंतु यह भी तो नहीं हो रहा है। सब साथ कहाँ आ रहे हैं?”
“साम्यवादी सिद्धान्त को मानते हैं—व्यवहार में यदि गड़बड़ी होती है तो उसके जिम्मेदार साम्यवादी नहीं हैं।”
एक साम्यवादी महाशय बोल उठे, “नहीं ऐसी बात तो नहीं है। हम लोग जो कहते हैं उसे व्यवहार में लाने का प्रयत्न भी करते हैं।”
इसी समय मंत्री जी आ गये।
“लीजिए मंत्री जी आ गये। अब कार्य आरम्भ हो जायगा।”
मंत्री के एक हाथ में कुछ कागज-पत्र थे जिन्हें उन्होंने मेज पर रख दिया और एक बार सभा स्थल का सिंहावलोकन किया। इसके पश्चात् मंत्री जी कुछ सहकारियों से खुसुर-फुसुर करने लगे। कुछ वार्तालाप करके वह अपनेराम के पास आये और बोले, “सभापति के लिये आपका नाम उपस्थित करते हैं।”
“क्या?”
“आप सभापति बन जायँ!”
“यह आशीर्वाद दे रहे हैं या प्रार्थना कर रहे हैं?”
“नहीं, सभापति बनने के लिए प्रार्थना कर रहे हैं।”
“परंतु आपको उचित है कि किसी कम्युनिस्ट को सभापति बनाएँ।”
“नहीं, यह कार्य आप ही को करना होगा।”
“कदाचित कम्युनिस्ट सब बराबर हैं, इस कारण उनमें से कोई सभापति नहीं बनाया जा सकता!”
“नहीं, ऐसी बात तो नहीं!”
“तब फिर उन्हीं में से किसी को बना दीजिए।”
“इस योग्य यहाँ कोई है नहीं।”
“क्या कहा! कॉमरेडों में कोई सभापति बनने योग्य नहीं। यह आप अपनी ओर से कह रहे हैं या सब की सलाह से?”
“इस मामले में सलाह लेने की क्या आवश्यकता है।”
“बिना सलाह के आप सब कॉमरेडों को सभापतित्व की योग्यता से खारिज दिये दे रहे हैं?”
“जी हाँ! आप ऐसा ही समझ लीजिए। शीघ्रता कीजिए, बड़ा विलम्ब हो रहा है।”
अपनेराम ने देखा कि अब तो आ ही फँसे हैं, इसलिये सभापति बने बिना कल्याण नहीं। अतः अपनेराम ने स्वीकार कर लिया।
अपनेराम के लिए सभापति का प्रस्ताव होने पर अपनेराम सभापति के आसन पर विराजमान हो गये। मंत्री जी ने बोलने वालों की सूची पेश की। कई नाम थे।
पहले एक महोदय ने एक कविता पढ़ी। उसमें यही कहा गया था कि ऐसे कुसमय में जबकि अन्न-वस्त्र मिलता नहीं–होली मनाना अनुचित है। इस कविता पर खूब तालियाँ पिटीं। एक महोदय बोले, “इसे फिर से पढ़िये!”
अपनेराम ने कहा, “यदि आप कविता दो बार पढ़वाएँगे तो भाषण भी दो बार दिये जाएँगे।”
“भाषणों पर यह नियम लागू नहीं होता।” मंत्री जी बोले।
“होना चाहिए! अन्यथा कम्युनिस्ट सिद्धांत ही बदल जायगा। सब को समान अधिकार मिलने चाहिये!”
“यदि अपनेराम के सभापतित्व में कोई श्रोता किसी भाषण को सुन कर बोल उठा– ‘यह भाषण दोबारा होना चाहिये’ तो अपनेराम उसे दोबारा बोलने की आज्ञा दे देंगे।”
“परंतु भाषण याद कैसे रहेगा? कविता तो लिखी रहती है।”
“खैर मुझे इससे बहस नहीं है। मैं दोबारा आज्ञा दे दूँगा।”
खैर साहब पहले एक महाशय ने आकर बोलना प्रारम्भ किया, “सज्जनो यद्यपि रूस में होली नहीं होती, परंतु तब भी हम लोग अपना भारतीय त्योहार मान कर इसे मनाते हैं।”
“न मनाना चाहिये।” एक कॉमरेड ने आवाज लगायी।
“क्यों?” एक ने प्रश्न किया।
“क्योंकि इस समय देश में सुख-शांति नहीं है।”
एक महोदय खड़े होकर बोले, “मेरी राय में तो होली मनाना चाहिये। सुख-शांति ऐसे ही अवसरों पर मिलती है।”
हमने कहा, “अच्छा तो आपको सुख-शांति की तलाश है!”
“मुझे ही क्या, संसार उसकी खोज में हैं। परंतु सुख शांति कुछ थोड़े से धनीमानी सज्जनों को ही मिलती है, सर्व-साधारण को नहीं मिलती।”
“धनीमानी सज्जनों को सुख-शांति! यह आपसे किसने कहा?”
“लोगों का खयाल तो ऐसा ही है”
“बिल्कुल गलत खयाल है। धनीमानी सज्जनों को जितनी चिंता सवार रहती है उतनी निर्धन को नहीं रहती।”
“क्या?” वक्ता ने पूछा।
“धनी को दुनिया भर की चिंता रहती है। किसी का देना है, किसी से पावना है, किसी से मिलना है, किसी से बात करना है—ऐसे बीसों झंझट लगे रहते हैं। निर्धन को ऐसी कोई चिंता नहीं रहती।” अपने राम ने कहा।
वक्ता ने पुनः कहना आरम्भ किया, “आप सभापति जी की बात पर ध्यान न देकर मेरी बात पर ध्यान दें। सभापति जी इन बातों को नहीं समझ सकते। हाँ तो ऐसे कुसमय में होली मनाना अनुचित है। जितना पैसा रंग-गुलाल में खर्च किया जायेगा उतना यदि किसी अच्छे काम में लगाया जाय तो राष्ट्र की सेवा हो जाय।”
“मेरी समझ में वह पैसा कम्युनिस्टों को दान कर दिया जाय!” एक कॉमरेड महाशय बोले।
अपनेराम बोले, “हियर! हियर! इससे बढ़के और पुण्य क्या होगा! परंतु क्या कॉमरेड लोग यह आश्वासन दे सकते हैं कि जो पैसा पुण्य करके आप लोगों को देगा उसे अगले जन्म में वह पैसा छह सात गुना होकर मिलेगा?”
“हम लोग तो अगला जन्म मानते ही नहीं।”
“तब तो आपको पुण्य-दान मिल चुका। दान लेना हो तो अगला जन्म अवश्य मानिए।”
“और दान देने वाला छै गुना सातगुना कैसे माँग सकता है? इतनी सूदखोरी उचित नहीं।”
“यह सूदखोरी नहीं, ब्लैक मार्केटिंग है। एक रुपया देकर सात मिलने की आशा रखना क्या कहलाएगा?”
“अपने शास्त्रों में तो यही लिखा हैं।” अपनेराम ने कहा।
“शास्त्रों की निर्धारित की हुई ब्याज की दर मान्य नहीं हो सकती।”
“यह दर तो ईश्वर की ओर से नियुक्त की गयी है।”
“इसीलिये तो हम लोग ईश्वर को नहीं मानते। ईश्वर सबसे बड़ा ब्याज लेना वाला है। जुआरियों के लिये सुना था कि बड़ा लम्बा सूद देते हैं, सबेरे सौ ले जाते हैं तो शाम को एक सौ पाँच दे जाते हैं। परंतु ईश्वर ने उनके भी कान कतर लिए।”
उनके पश्चात् एक अन्य सज्जन आये उन्होंने कहना आरम्भ किया, “सज्जनो! मैं ये व्यर्थ की बातें पसंद नहीं करता। मैं तो सीधी बात कहता हूँ कि होली का त्योहार बंद कर दिया जाए, यद्यपि हमारी घरवाली बंद करने के विरुद्ध है।”
“क्यों?” प्रश्न किया गया।
“इसलिये कि वह कम्युनिस्ट नहीं है।”
यह सुनते ही अपनेराम ने कहा, “खूब याद आया! जिन कॉमरेडों की स्त्रियाँ कम्युनिस्ट हों वे कृपया अपने हाथ उठा दें।”
एक भी हाथ नहीं उठा।
अपनेराम ने कहा, “एक भी कॉमरेड की पत्नी कम्युनिस्ट नहीं है। यह बड़ी बेजा बात है, क्योंकि इस प्रकार आप लोगों का आधा अंग ही कम्युनिस्ट है।”
“खैर!”
“खैर वैर कुछ नहीं। मैं तभी सभापति हो सकता हूँ जब कम्युनिस्टों का सम्पूर्ण अंग कम्युनिस्ट हो।”
“खैर, यह तो अभी फिलहाल हो नहीं सकता।”
“तो अपने राम भी ऐसे अधूरे कम्युनिस्टों की सभा का सभापतित्व नहीं कर सकते।”
यह कह कर अपने राम वहाँ से नौ-दो-ग्यारह हुए।
समाप्त
