कहानी: आवारागर्द – आचार्य चतुरसेन शास्त्री

कहानी: आवारागर्द - आचार्य चतुरसेन शास्त्री

1

जो आवारागर्द नहीं, उन्हें आवारागर्दी के मज़े कैसे समझाए जाएँ। लोग सभ्य हैं, इज्जत-आबरू वाले हैं, उनकी समाज में पद मर्यादा है, बहुत लोग उन्हें जानते हैं, वे यदि आवारागर्दी के चक्कर में पड़े, तो बस, सब खत्म। उनका रुआब उठ जाय, प्रतिष्ठा धूल मे मिल जाय, और देखनेवालों की नज़र से वे गिर जाय।

परंतु मेरी बात ही निराली है। वह निरालापन आवारागर्दी में ही आ जाता है। बात यह है, न मेरी समाज में कोई इज्जत है न कोई मेरा मुलाकाती दोस्त है, न कहीं मेरा घरबार, ज़मीन-जायदाद है, न नौकरी, न लीडरी। न मैं कवि, न सम्पादक। मैं महज़ आवारागर्द हूँ जिधर मुँह उठा, चल दिया, जहाँ भूख लगी, खा लिया, जहाँ थक गया, सो गया, जो चीज़ चाही, माँगली, मौका मिला, चुराली, गरज जैसे बने, जीवन की गाड़ी चलाए जाना, दुःख शोक, चिंता और निराशा को पास न फटकने देना मेरी आवारागर्दी का खास रूप है, औरों की और जाने।

मन में जो सनक समाई, तो काश्मीर जा पहुँचा। कैसे? यह आप सभ्य पुरुष न समझ पाएँगे। फिर भी संक्षेप मे सुनिए रेल मे पूरा सफर किया बिना टिकिट। अक्सर टिकिट चेकर को चकमे दिए कभी पखाने में घुसकर और कभी दूसरी ओर आँख बचाकर, कूदकर। कभी पकड़े भी गए, तो हँस दिये, जेबे उलटकर दिखा दी। किसी ने गालियाँ देकर छोड़ दिया, किसी ने गर्दनिया देकर उतार दिया, किसी ने पुलिस के हवाले किया। मैं जानता हूँ, दुनिया में पद-पद पर विघ्न आते हैं, पर धुन के पक्के लोगों के सामने वे ठहर नहीं पाते। मेरे सामने भी ये विघ्न न ठहर सके। सिर्फ इतना हुआ, दो-चार दिन देर करके पीड़ी जा उतरा। आधी मंज़िल फतह हो गयी। वहाँ से चला पैदल। रास्तेभर चट्टियों पर दूध, दही, पूरी और चाय-पानी का सामान बिक रहा था, पर अपने पास तो पैसा नहीं था। जब किसी भारी-भरकम को खाते देखता, सामने जाकर मुस्करा देता, और वह मुझे प्रायः खिलापिला देता। कभी गाकर, कभी हाथ देखकर पैसे बनाए। एक-दो बार बोझा भी ढोया, और सिर्फ एक बार चोरी की। आधा रास्ता पार हो गया।

एक दुकान पर बैठा गर्मागर्म पूरी-तरकारी उड़ा रहा था। सात पैसे जेब में थे, उनमें से छह पैसे की पूरी और सातवे का पान खा डालने का इरादा था। एक आदमी घबरा कर आया, और दुकानदार से पूछने लगा, “क्या पास में कोई दवा-दारू की दुकान है? हमारे सेठ खड्ड मे गिर गए हैं, हड्डी-पसली चूर-चूर हो गयी है। पास में कोई डॉक्टर हो, तो फीस चाहे जो देनी पड़े, उसे बुलवा दीजिए।”

आदमी नवयुवक था। टूटी-फूटी हिंदी बोल रहा था। मैंने धीरे से दुकानदार से कहा, “कहीं इस गधे से यह मत बता देना कि हम डॉक्टर हैं, नाहक हमें अटकना पड़ेगा। आये हैं तफरीह को, और बला सिर पड़ेगी। अरे भाई, नाक में दम है इन मरीज़ों के मारे, कमबख्त यहाँ भी दम नहीं लेने देते।”

दुकानदार ने क्षण-भर गौर से देखा, और यथा सम्भव आदर प्रदर्शन करके कहा, “डॉक्टर साहब, अब इस मुसीबत में तो इस बेचारे की मदद कर ही दीजिए।” फिर उसने ज़ोर से युवक से कहा, “भाग्य की बात समझो कि डॉक्टर सामने बैठे हैं।”

युवक एकदम पास आकर मिन्नतें करने लगा। मैंने कहा, “तो बुखार की तरह सिर पर क्यों चढ़े आते हो? बाबा, खा तो लेने दो, घबराओ मत; जाओ, कह दो, ‘डॉक्टर साहब आते हैं।’ चुटकी बजाते सब ठीक हो जायेगा।”

तसल्ली पाकर युवक दौड़ गया। मैं सोचने लगा अब डॉक्टरी धज बनायी जाय तो कैसे? मैला, फटा कोट, धूल-भरे पैर, दवा न दारू, और डॉक्टरी तो सात पीड़ी ने न की थी। कॉलेज मे जब पढ़ते थे, स्काउटिंग मे नाम लिखा लिया था, पास में काम की चीज़ सिर्फ एक वेसलीन की शीशी थी, मैंने उसी से तमाम मतलब, हल करने की ठान ली। जाकर देखा, कुछ चोट-ओट नहीं आयी थी—न घाव हुआ न हड्डी टूटी, यों ही जरा खाल छिल गयी थी, जितनी गम्भीरता धारण की जा सकती थी, धारण करके मरीज़ देखा-कपड़ा माँगकर पट्टियाँ बनाई, और जरा-सी वेसलीन चुपड़कर लपेट दी, बाद में डॉक्टरी धज से साबुन से हाथ धोकर चल देने की ठानी, इतमीनान हुआ कि ५ रुपए अभी जेब में खनखना उठेंगे, श्रीनगर तक का चाय-पानी हो जायगा।

परंतु सेठ कोई गुजराती गावदी था। हाथ जोड़कर बोला, “बैठ जाइए, डाक्टर साहब, अब आप जा नहीं पावेगे। आपको साथ चलना होगा। आपके आराम की पूरी व्यवस्था हो जायगी।”

जै गंगा। थोड़ा नखरा करके मैं राज़ी हो गया। सवारी, कपड़े, चाय, टोस्ट, मक्खन, खाना, सब जुट गये। काशमीर में मज़े की कटने लगी।


2

एक दिन संध्या-समय एक सँकरी गली के सामने झूमता हुआ जा रहा था। क्यों? यह आप समझ जाइए। बदनाम मुहल्ला था, कभी-कभी उधर से यों ही घूम आया करता था। थोड़ी तबियत में गुदगुदी ही पैदा हो जाती थी। यहाँ और तो सब मौज-बहार थी, पर नकद नारायण जेब में न था, सेठ से कभी माँगा नहीं। और तिकड़म सब छोड़ दी थी। इसी से सिर्फ उधर घूमना मात्र ही हो जाता था, और कुछ नहीं।

हाँ, तो मैं एक सँकरी गली के सामने झूमता हुआ जा रहा था। संध्या के धुँधले प्रकाश मे देखा—एक पुराने, छोटे-से मकान की दहलीज़ पर एक श्वेत-वसना स्त्री खड़ी एक बाबू से बाते कर रही है। अँधेरे में ठीक-ठीक उसकी आयु और सुंदरता नहीं भाँपी जा सकी। परंतु ज्यों ही मेरी दृष्टि उस पर पड़ी, बाबू ने उससे कहा, “नमस्ते” और उसने भी हाथ जोड़ कर नमस्ते कहा। बाबू चल दिए। मगर उस स्त्री ने जो नमस्ते शब्द कहा, उसकी झंकार ने मेरे शरीर में रोमांच पैदा कर दिया, कुछ विचित्र मधुर स्वर था, फिर मैंने सोचा इस बदनाम, गंदी गली मे ‘यह शुद्ध नमस्ते’ कैसा?

मैंने मुँह उठा कर देखा वह घर के भीतर लौट रही थी, मैंने साहस किया—एक कदम आगे बढ़कर कहा—“नमस्ते” वह लौटी, और आश्चर्य-चकित मेरी ओर उस अँधेरे में देखने लगी। मैंने और निकट जाकर कहा, “आपने पहचाना नहीं—मैं डाक्टर हूँ।” मैंने ढेला फेंका।

उसने भुनभुनाकर होंठों ही मे कहा, “डाक्टर।” फिर उसने सिर का पल्ला ठीक किया, हाथ जोड़कर उसी मधुर स्वर से नमस्ते किया, और उससे भी अधिक मीठे स्वर मे कहा, “आइए, भीतर आइए डाक्टर साहब!”

और, फिर हम एकदम मकान के भीतर। दरवाजे की कुंडी बंद कर दी गयी। घर छोटा और साधारण था, पर साफ और सुरुचि-पूर्ण। कमरे में एक शतरंजी बिछी थी—कोने में पलँग था। दीवार से लगा एक लैम्प टिमटिमा रहा था। शतरंजी पर बैठूँ या पलँग पर, यह निर्णय नहीं कर सका। उस पीली, धुँधली रोशनी मे मैंने फिर उसकी ओर देखा-एक दुबली-पतली, सुंदर, छरहरी युवती थी। उम्र बीस से ऊपर होगी। बरबादी और वेदना की छाप उसकी आँखों और होठों पर थी।

उसने आगे बढ़कर, पलंग की ओर इशारा करके कहा, “बैठिए।” सिर से टोपी उतारकर खूटी पर टाँग दी, बेत हाथ से लेकर एक कोने में रख दिया। फिर कहा, “कोट उतारकर इतमीनान से बैठिए। इस वक्त कुछ गर्मी है, और आप बाहर से आए हैं। ठहरिए, खिड़की खोले देती हूँ। आप इतमीनान से बैठिए।”

मैं कोट उतारकर इतमीनान से बैठ गया। उसने खिड़कियाँ खोली, लैम्प ज़रा तेज़ किया, दो अगर-बत्तियाँ जलायीं, और चुपचाप पैरों के पास फर्श पर बैठ गयी।

अभी दो मिनट भी न बीते थे कि ऐसा मालूम हुआ कि आवारागदी खत्म हो गयी। मानो चिरकाल बाद शरीर और मन थकाकर अब घर लौटा हूँ, हालाँकि पृथ्वी के इस छोर से उस छोर तक मेरा कहीं घर था ही नहीं।

मेरा मुँह बद था। सोच रहा था, कौन है यह दुखिया, सुशीला स्त्री। इतनी मधुर, इतनी स्त्री-गुणों से विभूषित। परंतु क्या उससे पूछूँ कि तुम कौन हो? इतनी आत्मीयता से परिपूर्ण स्वागत पाने पर भी। मैं चुप ही रहा। कभी उसे, कभी घर को घूर-घूरकर देखता रहा। उसने कहा, “चश्मा क्या हर वक्त लगाते हो! क्या रात मे बुरा नहीं मालूम होता?” उसने हाथ बढ़ाकर चश्मा आँखों से उतार लिया। गौर से आँखों को देखा—हथेली से आँखे दबाई। ओह! कितनी कोमल थीं वह हथेली।

मैंने दोनों हाथों से उसका हाथ थामकर कहा, “खूब मिलीं दोस्त।”

“तो क्या आप मुझे ढूँढ रहे थे?”

“अजी तीन दिन से।” मैंने अटकल-पच्चू कहा।

“आपको यह मालूम कैसे हुआ कि मैं आ गयी हूँ।”

मैंने शान से कहा, “वाह, यह भी कोई बात है, आप यहाँ आवे, और मुझे न मालूम हो।”

वह गौर से देखने लगी। शायद यह भाँपने के लिये कि यह इतनी आत्मीयता से बाते करने वाला है कौन, और मैं उसके मनोभाव समझकर मुस्कराने लगा।

एकाएक मैंने कहा, “वहाँ फर्श पर क्यों बैठी हो, यहाँ बैठो।”

मैंने हाथ पकड़कर खींचा। उसने मेरे घुटनों पर सिर रखकर वेदना से टूटे स्वर मे कहा, “तुमने सुना तो होगा, साहब अब नहीं रहे। एक महीना हुआ, हार्ट फेल हो गया। मरने से दो-चार दिन पहले तो चिट्ठी आयी थी—पढ़ो तो, देखो, क्या लिखा है।”

वह लपक कर उठी, एक पुलिंदा बहुत-सी चिट्ठियों का रुमाल मे बँधा था, उठाकर खोला—एक खत निकालकर पढ़ा—“मेरी परम प्यारी, प्राणों की दुलारी,” फिर कहा—“आप खुद पढ़िये”

मैंने आगे पढ़ना शुरू किया, “तुम राज़ी-खुशी काश्मीर..” उसने बाधा देकर पत्र को दोनों हाथों से ढाँप लिया, और ऊपर की पंक्ति पर मेरी उँगली रखकर कहा, “यहाँ से पढ़िये।”

मैंने पढ़ा, “मेरी परम प्यारी, प्राणों की दुलारी।” उसने मेरे साथ प्रत्येक अक्षर को दुहराया, उसकी आँखों से आँसुओं की धार वह चली, और वह फिर मेरे घुटनों पर सिर रख कर सिसकने लगी।

मैं घपले मे पड़ गया, सच कहूँ, मैं इतना द्रवीभूत हो गया कि उसकी पीठ और सिर पर हाथ फेरने लगा, कुछ देर बाद मैंने कहा, “लाओ, चिट्ठी पढ़ूँ तो।” उसने चिट्ठी मोड़कर कहा, “मत पढ़ो मत पढ़ो—मैं सुन नहीं सकती, जिन्होंने लिखी थी, वह अब नहीं हैं, उन्होंने इतने खत लिखे हैं, गिनकर देखो, कितने हैं, पर अब नहीं लिखेंगे।” उसने ऊपर मुँह उठाया-टपाटप आँसू गिर रहे थे, होंठ काँप रहे थे, उसने घुटनों के बल उकसकर अपने को मेरी गोद मे डाल दिया।

उस सुखद अनुभूति का कैसे वर्णन करूँ, उसके केश-गुच्छ मे खोंसे हुए फूल की सुगंध से, उसके प्रेमी हृदय के हाहाकार से, उसके कोमल गात्र के आलिंगन से जैसे मैं अपने ही में मूर्छित हो गया। मैंने सोचा, ‘क्या यह मुझे अपना कोई पूर्वपरिचित समझती है, या इसे होश-हवास ही नहीं,’ मैंने भी तो अपनी बातों से उसे खूब मुगालते में डाला, खत में मैंने उसका नाम पढ़ लिया था—रुक्मिणी।

मैंने आर्द्र स्वर से कहा, “रुक्मिणी, इतना रंज न करो, जो चला गया, उस पर सब्र करो, और जो मिल गया, उसके लिये ईश्वर को धन्यवाद दो।”

मैंने एक वासना से ललचाई दृष्टि उसके शोक-कातर मुख पर डाली। उसने आँसू पोंछ डाले। चुपचाप चिट्ठियाँ इकठ्ठी करके गाँठ बाँधी, और फिर उठकर दूसरे कमरे में चली गयी। क्षण भर बाद आकर फिर बोली, “कुछ पियोगे?”

मैंने वास्तविक अर्थ न समझ कर कहा, “नहीं, प्यास नहीं है।”

उसने क्षण-भर ठहर कर कहा, “कुछ पीते हो या नहीं?”

मैं अब समझा, और कहा, “नही कभी नहीं पीता।”

उसने और निकट आकर कहा, “खर्च नहीं करना होगा, घर में है। लाऊँ-थोड़ी पियो।”

इतनी देर बाद मुझे स्मरण आया कि यहाँ जो मैं बेफिक्री से पलंग पर बैठा शाही ठाठ से बाते कर रहा हूँ, सो गाँठ में तो फूटा पैसा भी नहीं। अब यहाँ से बिना कुछ दिए जाना कितना ज़लील काम होगा। यह सोचते ही मैं एकदम उठ खड़ा हुआ, और कहा, “अच्छा, अब चला, फिर कभी आऊँगा।”

उसने मृदुल स्वर मे कहा, “यही हाल उनका था। कभी नहीं पीते थे, पीने को कहती थी, तो उठ कर चल देते थे। अच्छा, मत पियो, मगर जाओ मत। नाराज़ मत हो।” और वह एकदम आगे बढ़ कर मेरे ऊपर गिर पड़ी, जैसे बहुत-सी फूल-मालाएँ किसी ने ऊपर फेंक दी हों। और, मैंने आत्मविस्मृत होकर उसे कसकर छाती से लगा लिया। मैंने तन-मन से द्रवित होकर कहा, “इतना दर्द, इतना दुःख, इतना प्रेम लिए तुम इस गंदे घर मे बैठी हो सजनी।” और फिर मैंने उसके अनगिनत चुम्बन ले डाले। शिथिल-गात होकर मैं पलंग पर पड़ा रहा। उसने धीरे से मेरे बाहु-पाश से पृथक् होकर कहा, “नाराज़ मत होना— तुम इजाज़त दो, तो मैं ज़रा-सी पीलूँ। न पिऊँगी, तो तुम से बात भी न कर सकूँगी।”

मैंने कहा, “पियो मैं नाराज़ नहीं हूँ।”

पीकर जब वह आयी, तो मुस्करा रही थी, आवाज़ करारी थी, शरीर में फुर्ती थी। उसने कहा, “बीड़ियाँ तो हैं, क्या सिगरेट मँगाऊँ?”

“कैसे कहूँ कि मँगाओ।” मेरे पास तो पैसे न थे। मैंने कहा, “मगर मैं तो पीता-खाता नहीं।”

“इसका मतलब यह कि एकदम सत हो गए हो।” उसने लड़के को आवाज़ देकर बुलाया। एक रुपया उसे देकर कहा, “कैची की सिगरेट एक पैकेट, माचिस और पान ले आ।” मैं चुपचाप देखता रहा।

धीरे-धीरे जैसे मैं जगत् को भूल गया, अपने को भूल गया। रात को भूल गया, दिन को भूल गया। अपने को मैंने चुपचाप पलंग पर डाल दिया—शिथिल-गात और मूर्छित मन।

उसने सिगरेट निकाल कर मेरे होंठों में लगा दी, और फिर जला दी। धीरे से सिर ऊँचा करके एक छोटा-सा तकिया नीचे रख दिया। दो पान के बीड़े मुँह मे रख दिए। उसने फिर अगरबत्तियाँ कमरे मे जलायी। चारो तरफ देखा, मेरे आराम के लिये जो कुछ किया जा सकता है, वह उसने सब कर दिया या नहीं। फिर वह कमरे के बाहर गयी। मैं समझ गया, वह पीने गयी है, अपना दर्द दूर करने के लिये। क्षण-भर बाद वह आयी, और मेरे पैरों को गोद मे लेकर बैठ गयी। उसकी कोमल हथेलियों का सुखद स्पर्श प्राणों को हरा करने लगा। मैं चुप था—वह भी चुप थी—लैप धीरे-धीरे टिमटिमा रहा था। रात का सन्नाटा बढ़ रहा था। ऐसा प्रतीत होता था, अंधकार से व्याप्त इस भूमंडल पर केवल वह छोटा-सा घर ही आलोक की रेखा बिखेर रहा है। और, नक्षत्र-लोक में केवल दो प्राणी ही जीवित हैं, मैं और वह। और, हम दोनों अटूट सुख-सागर मे डूब गये है।

मैं तो पहले ही अपनी आवारागर्दी की बात कह चुका हूँ। कहने को एक ही बात रह गयी थी, वह यह कि स्त्री से यथार्थ परिचय जीवन में नहीं हुआ था। और, अब मैं सोच भी न सकता था कि स्त्री क्या है, उसका मूल्य क्या हैं।

एकाएक मैं जैसे चौंक उठा। मैंने कहा, “अब जाऊँगा मैं।”

उसने जैसे भयभीत होकर नेत्रों मे कहा, “कहाँ? क्यों?”

मैंने कहा, “मैंने अभी खाना भी नहीं खाया है, माहराज बाट तकता होगा।”

“आह! तब तुमने कहा क्यों नहीं। खाना मैं मँगवाती हूँ।” और, लाख मना करने भी उसने खाना मँगवाया। मेरे सामने थाल रखकर वह पंखा ले बैठी। मैंने कहा, “यह नहीं, तुम्हें खाना होगा मेरे साथ।”

उसने कहा, “तो पियो फिर तुम भी।” उसके नेत्रों में एक गहरी वेदना थी। मैंने सहमति दी, और जीवन का दूसरा अध्याय शुरू हुआ। कौन उसे सोच सकता है। एक आवारागर्द के जीवन का दूसरा अध्याय—लोग जिसे सुहागरात कहते है। सचमुच वही।

और प्रातःकाल—जब आँखों मे शराब और नींद की खुमारी बढ़ रही थी, पैर लड़खड़ा रहे थे, शरीर झूम रहा था। अभी अँधेरा था, उसने मुझे चूमा, कोट मेरे कंधो पर डाला। दोनों हाथों मे हाथ लेकर हँसी, और फिर कहा, “नमस्ते।”

इतना तो मुझे होश था कि मैं खाली, बिना कुछ दिए, जा रहा हूँ। मैं लाज से मरा जा रहा था, पर मैंने कुछ कहा नहीं। दो कदम आगे बढ़ाए। वह हाथ मे हाथ दिए साथ थी। उसने कान में होंठ लगाकर कहा, “कल जल्द आना।”

और, फिर उसने द्वार पर आकर एक बार नमस्ते किया। वह हँसी, उसका पीला और सूखा चेहरा, वेदना पूर्ण, गहन आँखें, उस हँसी की आभा से जैसे दिप गयीं।

मैं बोला नहीं, बोल सका नहीं, उसी भाँति लड़खड़ाता हुआ— ऊषा से अलोकित एकांत सड़क पर लुढ़कता चला—जैसे स्वप्न मे चल रहा होऊँ। ओह, कैसी अभूतपूर्व, सुखद रात रही वह।


3

दो मास ऐसे बीत गए, जैसे खेल हो गया हो। हाँ, मैंने एक पैसा भी नहीं दिया। उस नारी के हृदय का मैंने सम्पूर्ण अध्ययन कर डाला। उसके प्रियतम के सम्पूर्ण खत पढ़ डाले। वह भी डॉक्टर था, मेरे जैसा अवारागर्द नहीं, प्रतिष्ठित सिविल सर्जन। उसके बीवी थी, बच्चे थे, उसने इस प्रेम लतिका को पत्नी की ही भाँति घर में रक्खा था। वह उसकी पत्नी के साथ खाती, सोती, रहती और पत्नी ही समझी जाती थी। उसने मुझसे एकएक दिन की बातें कहीं। अपने छह वर्ष के स्वप्न-सुख के मधुर संस्मरण कहती हुई वह हँसी, रोयी और नाची, उन्माद में आवेशित होकर।

मैं दिन-भर अपने सेठ के यहाँ रहता—कहना चाहिए सोता, और संध्या होते ही झूमता हुआ वहाँ आता, जहाँ सुखद सेज़, गर्म खाना, उन्मादक मद्य, मृदुल नारी एक साथ ही उपस्थित थी—सब झंझटों और खटपटों से रहित। एक यंत्र की भाँति मैं उस सुख-सागर में डूब जाता। खाता-पीता, सिगरेट पीता, और कहने न कहने योग्य क्या-क्या करता न करता।

दिन बीतते गये, और एक बोझ मेरे हृदय पर लदता गया। मैंने उसे कभी कुछ नहीं दिया। अभागिनी, असहाय नारी मुझे कहाँ से खिलाती-पिलाती है? कुछ देना तो होगा ही। परंतु कहाँ से? मैं जानता था, मेरा साथी सेठ कहाँ रुपए-पैसे रखता है। मैं सेठानी के जेवरों के रखने की जगह भी जानता था। सब मेरा विश्वास करते थे। मेरी रात की गैरहाजरी भी सबको सह गयी थी। कोई मेरे राज़ को जानता न था। अंत में मैंने संकल्प किया—किसी तरह यह सब रुपया चुराकर उसे दे आऊँ। संकल्प दृढ़ होता गया, और मैं अवसर की ताक में लगा। अंततः एक दिन मुझे सफलता मिली। सब जेवर और रुपया लेकर मैं उसी भाँति झूमता-झामता चिर-परिचित मार्ग पर संध्या के धूमिल प्रकाश में आगे बढ़ रहा था। वह सब मैंने एक तरफ छिपा दिया, उसे मालूम नहीं हुआ। मैंने भी सोचा—बस, यही अंतिम रात है। फिर अब और नहीं। उस दिन मैंने उसे जी भरकर प्यार किया, बहुत किया। अपना हृदय और आत्मा मैंने उसे दे दिया। पिछली रातों की भाँति यह रात भी बीत चली, और ऊषा के अलोक मे जब उसने हँसकर ‘नमस्ते’ कही, तब मैंने चुपचाप, नीरव भाव से चिर-विदा कहा।

मैंने लोटकर नही देखा, और चला। सेठ के डेरे की ओर नहीं, लम्बी, बलखाती, पेचीली पहाड़ी सड़क पर, जो नीचे की दुनिया की ओर जा रही थी। उसी आवारागर्दी के आलम में, जिसमें नया आनंद और मस्ती का झरना झर रहा था। दिन बीता, और संध्या-समय एक चट्टी पर, बाहर पड़ी बेंच पर, पड़ा, हुआ मैं बीती रातों को सोच रहा था। सब कुछ सपना-सा दीख रहा था। आँखे झरते ही वह आती, देखती, प्यार करती, सिगरेट पिलाती, माथा सहलाती, परंतु आँख खुलने पर सुदूर आकाश के टिमटिमाते तारे, टूटी बेंच और अपना एकाकी अवारागर्दी जीवन!

रास्ते में खाता, पीता, सोता, बैठता, अपनी चिर-अभ्यस्त आवारागर्दी से चला आ रहा था। एक दिन पुलिस ने मुझे पकड़ लिया। सेठजी साथ मे थे—उनके क्रोध का ठिकाना न था—बक रहे थे, और मुट्ठीयाँ बाँध रहे थे। मैं हँस रहा था। एक अंगूठी मेरी उँगली में थी। उसी से पकड़ा गया। उतारना भूल गया था। सोचा था, चलती बार उसे पहनाऊँगा। मैंने चोरी स्वीकार की, पर माल कहाँ है, नहीं बताया। मुझे पीटा गया, और भी यातनाएँ दी गयी, परंतु उन यातनाओं में, मार मे कितना सुख था, कितना मज़ा था। वे यातनाएँ उस प्रिय नारी के सुखद स्पर्श, कोमल प्रमालिंगन से कहीं अधिक अच्छी लग रही थीं। और, जब जेल की कोठरी मुझे मिली, तो उस एकांत में मैं था, और उस सजनी की जागृत स्मृति। ओह, इसके बाद तो फिर हमारा न कभी विछोह हुआ, न मिलन। मैं प्रतिक्षण एक ही बात सोचा करता हूँ—काश्मीर की उन मनोरम घाटियों में वह मेरी प्रतीक्षा कर रही होगी, जीवन के अंत तक प्रतीक्षा करेगी।

समाप्त


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