सुधा आदेश लगभग तीन दशकों से अधिक समय से लेखन के क्षेत्र में सक्रिय हैं। उन्होंने कहानियाँ, आलेख, उपन्यास और बाल साहित्य लिखा है। ‘छूने दो आकाश’ (कहानी संग्रह), ‘मोबाइल में गाँव’ (बाल उपन्यास), ‘सलीब में टँगा प्रश्न’ (कहानी संग्रह), ‘अंततः‘ (उपन्यास) इत्यादि उनकी कुछ प्रकाशित पुस्तकें हैं। राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में उनके आलेख और रचनाएँ निरंतर प्रकाशित होते रहे हैं।
एक बुक जर्नल के लिए हमने उनसे उनके लेखन पर ईमेल के माध्यम से यह बातचीत की है। उम्मीद है यह बातचीत आपको पसंद आएगी।
प्रश्न: नमस्कार मैम, एक बुक जर्नल में आपका स्वागत है। सर्वप्रथम तो पाठकों को अपने विषय में कुछ बताएँ।
उत्तर: मैं मूलतः उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ जिले से हूँ किंतु अलीगढ़ मैं वर्ष में एक या दो बार ही जा पाया करती थी क्योंकि मेरे पिताजी उत्तरप्रदेश संवर्ग के प्रशासनिक अधिकारी थे। मेरा जन्म बरेली में हुआ। पिताजी के हर दो तीन वर्ष में स्थानांतरण के कारण मेरी शिक्षा उत्तर प्रदेश के विभिन्न जिलों में हुई। विज्ञान विषय से ग्रेजुएशन करने पश्चात राजनीति विज्ञान में पोस्टग्रेजुएशन मैंने गोरखपुर यूनिवर्सिटी से किया। विवाह के पश्चात पत्राचार द्वारा मैंने होमियोपैथी का कोर्स भी किया। आदेशजी के साथ मध्यप्रदेश (अब छत्तीसगढ़), महाराष्ट्र, झारखंड में रहने का अवसर मिला। आदेशजी की सेवानिवृति के पश्चात लखनऊ अपनी कर्मभूमि बनाने का निश्चय किया किंतु अपने दोनों पुत्रों के बेंगलुरु सेटल होने के कारण, उनके आग्रह पर अंततः हमने भी बेंगलुरु रहने का मन बना लिया है पर मन अभी भी लखनऊ में ही बसता है।
प्रश्न: साहित्य से आपका जुड़ाव कैसे हुआ? क्या घर में पठन पाठन का माहौल था?
उत्तर: घर में पठन-पाठन का माहौल था। बच्चों में पढ़ने की रुचि जाग्रत करने के लिए माँ-पिताजी बच्चों की पत्रिकाएँ जैसे चम्पक, नंदन, पराग, चंदामामा नियमित मँगाते थे। उनके प्रोत्साहन के कारण बचपन से ही पढ़ाई के अतिरिक्त कहानी की पुस्तकें पढ़ने का शौक भी बढ़ता गया।
प्रश्न: वह कौन से लेखक और रचनाएँ हैं जिन्होंने बचपन में साहित्य के प्रति आपके मन में रुचि जागृत की थी?
उत्तर: यह तो मैं ठीक से नहीं बता सकती कि किसकी रचनाओं ने मेरे मन में साहित्य के प्रति रुचि जाग्रत की लेकिन इतना याद है कि लगभग 8-9 वर्ष की उम्र में घर की लाइब्रेरी में रखा मुंशी प्रेमचंद जी का उपन्यास ‘गोदान’ मेरे हाथ लग गया। उस समय मुझे कितना समझ में आया, कह नहीं सकती लेकिन रोज 8-10 पेज पढ़कर मैंने उसे समाप्त कर ही दिया। बढ़ती उम्र के साथ हिंदुस्तान, धर्मयुग, सरिता, मनोरमा, सारिका जैसी पत्रिकाएँ मेरी नियमित दिनचर्या में सम्मिलित होती गयीं। कुछ और बड़ी होने पर पढ़ने की क्षुधा की शांति के लिये मैं हिंद पाकेट लाइब्रेरी की सदस्य बन गयी। इस योजना के द्वारा हर महीने सात पुस्तकें मँगवायी जा सकती थीं। उन दिनों मैंने गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर, बंकिमचंद्र चटर्जी, आचार्य चतुरसेन, मुंशी प्रेमचंद के साथ यशपाल, जैनेंद्र, कृश्न चंदर, अमृता प्रीतम, शिवानी, कृष्णा सोबती, धर्मवीर भारती, रॉबिन शॉ पुष्प इत्यादि को खूब पढ़ा। शिवानी उस समय मेरी प्रिय लेखिका थीं। सुरेंद्र मोहन पाठक, गुलशन नंदा के साथ कर्नल रंजीत के जासूसी उपन्यास भी पढ़े। धर्मयुग में धारावाहिक के रूप में प्रकाशित मन्नू भंडारी का ‘आपका बंटी’ तथा सूर्यबाला का ‘मेरे संधिपत्र’ का बेसब्री से इंतजार करना मुझे आज भी याद है।
प्रश्न: लेखन का खयाल आपके मन में कब आया? क्या कोई विशेष क्षण था जब आपने सोचा कि आपको भी लिखना चाहिए? आपको आपकी प्रथम रचना याद है?
उत्तर: जैसे ऊपर बताया मैं पढ़ती बहुत थी। तो कुछ इन पुस्तकों की संगत का असर तो कुछ मेरे संवेदनशील मन में बाहरी संसार में व्याप्त भेद-भाव, जाति-पाति, अनाचार, दुराचार, भ्रष्टाचार देखकर मन में कुछ कुलबुलाने लगता और कलम चल पड़ती। उस समय कुछ कहानी, कविताएँ तो लिखीं किंतु वह मेरी डायरी के पृष्ठों में ही सिमट कर रह गईं क्योंकि पढ़ाई के दबाव के कारण उन्हें सुधारना, फिर हाथ से लिखकर भेजना सम्भव नहीं हो पाता था।
अगर लिखना शुरु करने के विशेष क्षण की बात करूँ तो ऐसा कुछ नहीं था। लेखन स्वतःस्फूर्त होता है, उसके लिए सोचना नहीं पड़ता। मन में उमड़ती-घुमड़ती भावनाएँ स्वयं हाथ में कलम पकड़ाकर लिखवा ही लेती हैं। यही मेरे साथ हुआ… मेरी पहली रचना कविता थी। ज़ब मैं 12-13 वर्ष की थी, मेरे घर के बगीचे में कई अन्य फूलों के साथ सुंदर गुलाब के फूल खिले हुए थे जिन्हें नित्य देखना मेरी आदत बन गयी थी। एक दिन मैंने देखा कि एक फूल की कुछ पंखुड़ियाँ नीचे गिरी हुई हैं। सुंदर फूल की यह दशा देखकर मन बहुत दुःखी हुआ। उस समय मुझे नये-नये शब्द सीखने की धुन सवार थी। उसी समय मैंने कहीं यवनिका शब्द पढ़ा था। उस शब्द को प्रयोग में लाते हुए मेरी कलम ने लिखा…
यवनिका की ओट में
एक फूल मुस्करा रहा
तभी झोंका आया वायु का
फूल की पंखुड़ियाँ हो गयी विलग
लगा सोचने
हे ईश्वर!
न दे किसी को
ऐसा सौंदर्य, घमंड
जो हो क्षणभंगुर।
प्रश्न: आपकी पहली रचना कौन सी थी जो कि प्रकाशित हुई थी? क्या आपको वह रचना याद है? उस रचना के विषय में कुछ बताना चाहेंगी जैसे उसे लिखने का विचार कैसे आया? प्रकाशन का अनुभव कैसा रहा?
उत्तर: जैसाकि मैंने पहले बताया मेरी पहली रचना कविता थी जिसे दैनिक पत्र में तो स्थान मिला ही, बाल कवियों के लिए आयोजित प्रतियोगिता में उसे सांत्वना पुरस्कार भी मिला। माता-पिता से सराहना मिलने के साथ मुझे भी लगा कि मैं भी कुछ अच्छा लिख सकती हूँ। फिर तो जब भी मन में भाव उठते, कलम चल पड़ती, वह मेरी डायरी का हिस्सा बनने लगे। यद्यपि कॉलेज मैगजीन में मेरी कुछ कविताएँ प्रकाशित हुई थीं किंतु जैसा मैंने पहले भी कहा है कि पढ़ाई के दबाव तथा अपनी अन्य रुचियों में ध्यान केंद्रित करने के कारण मैं अपनी रचनाओं को अन्यत्र कहीं भेज नहीं पाती थी। एक बार मेरे चाचाजी आये जो अलीगढ़ में रहते थे, उन्हें पता चला कि मैं कहानी लिखती हूँ। उन्होंने मुझसे कहानी माँगी तथा अलीगढ़ से प्रकाशित ‘अग्रवाल संदेश’ पत्रिका में भेज दी। इस तरह मेरी पहली कहानी ‘अपना-पराया’ अग्रवाल संदेश में प्रकाशित हुई। यह सन 1976 की बात है। इससे उत्साहित होकर मैंने अपनी एक अन्य कहानी ‘आकांक्षाओं का आकाश’ एक प्रतियोगिता के लिए भेजी जिसे सांत्वना पुरस्कार मिला। 1977 में विवाह के पश्चात लगभग 15 वर्षों तक मेरी लेखनी अवरुद्ध रही। 1992 से मैं अनवरत लिख रही हूँ।
प्रश्न: आप काफ़ी समय से लेखन कर रही हैं। इतना वक्त आपने लेखन क्षेत्र में गुजारा है। रचना प्रकाशित करने की प्रक्रिया में आप इतने समय में क्या फर्क होता देखती हैं? आज के समय में प्रकाशित होना और आप जब लेखन की शुरुआत कर रहीं तब प्रकाशित होने में कितना फर्क था?
उत्तर: लेखन प्रक्रिया में इतने दिनों में बहुत अंतर आया है। पहले हम हाथ से लिखकर, उसे टाइप करवाकर भेजते थे क्योंकि कुछ पत्रिकाएँ हस्तलिखित कहानियाँ स्वीकार नहीं करती थीं। उस समय स्वीकृति का पत्र भी आता था। प्रकाशित होने पर मानदेय के साथ कहानी की कटिंग तथा पत्रिका की प्रति भी आती थी। कभी-कभी अपने किसी विशेषांक के लिए आलेख या कहानी लिखने के लिए पत्रिका का आग्रह पत्र भी आता था। वह पत्र धरोहर बन जाते थे। आजकल तो इस तरह का आग्रह मेल के द्वारा आता है। उसमें वह गर्माहट नहीं रहती जो पत्र को पढ़ने और सहेजने में रहा करती थी। उस समय अगर अखबार में रचना प्रकाशित होती थी तो पाठकों के पत्र भी आते थे जो लेखन के लिए उत्प्रेरक का कार्य करते थे। कोरोना के पश्चात अब सभी पत्रिकाएँ ऑनलाइन कहानी लेने लगी हैं जिससे अब लेखकों को सुविधा होने लगी है। कुछ पत्रिकाओं द्वारा मानदेय तो मिलता है किंतु उसमें विशेष बढ़ोतरी नहीं हुई है। इसके अतिरिक्त अब न कटिंग आती है और न ही पत्रिका। जैसा मैंने महसूस किया है कि हर पत्रिका का अपना मानदंड होता है उसी के अनुसार वह रचना स्वीकृत करती है। इसमें आज भी कोई बदलाव नहीं हुआ है।
प्रश्न: अच्छा मैम, लेखन का आपका रूटीन क्या होता है?
उत्तर: मेरा लिखने का कोई रूटीन नहीं बन पाया है। मेरे लिए परिवार मुख्य रहा है। पहले आदेश जी के ऑफिस तथा बच्चों के स्कूल जाने के कारण दोपहर का समय मेरा अपना होता था किंतु आदेश जी की सेवानिवृति के पश्चात मुझे समय निकालना पड़ता है। जब भी समय निकाल पाती हूँ, लिखने की कोशिश करती हूँ।
प्रश्न: आप यह कैसे निर्धारित करती हैं कि आपको अमुक कहानी लिखनी चाहिए? वह क्या चीजें हैं जो आपको लेखन के लिए प्रेरित करती हैं? कुछ रचनाओं के उदाहरण देकर आप बताना चाहेंगी?
उत्तर: कहते हैं साहित्य समाज का दर्पण है। समाज से किसी बिंदु को पकड़ने के लिए पैनी नजर तथा कल्पना की उड़ान चाहिए। उदाहरणार्थ…एक बार मैं अपने एक परिचित के बेटे के विवाह गयी थी।
मेरे साथ ही गयी मेरी एक मित्र ने उनको बधाई देते हुए कहा, “बधाई भाभी जी, आज आप सास बन रही हैं।”
“क्या कह रही हो, सास तो मैं पहले ही बन चुकी हूँ।”
“भाभी, दामाद की सास बनने और बहू की सास बनने में बहुत अंतर होता है।”
इस छोटी सी बातचीत से मेरी कहानी ‘रिश्तों के दायरे’ का उदय हुआ जिसे सन् 2002 में ‘मेरी सहेली’ पत्रिका में तो स्थान मिला ही, पाठकों के पत्र स्तम्भ में भी पाठकों से सराहना मिली। प्रतिलिपि वेब पत्रिका में भी इस कहानी को अब तक 1 लाख से अधिक पाठकों ने पढ़ा है।
एक अन्य घटना है। मेरी एक मित्र को कोई बच्चा नहीं हुआ। उसने एक बच्चा गोद ले लिया। एक बार वह मेरे घर आयी। उसी समय मेरे घर मेरी कुछ अन्य सहेलियाँ भी आ गयीं। उन्हें पता नहीं था कि मेरी उस मित्र ने बच्चा गोद लिया है। मेरी दूसरी मित्र उस बच्चे को गोद में लेकर बोली कि यह बच्चा तो बिलकुल तुम पर गया है। उस मित्र की बात सुनकर मुझे महसूस हुआ कि कुछ लोग अनजाने में बच्चे में माता-पिता की छवि ढूँढने लगते हैं। इसको आधार बनाकर रचना हुई मेरी कहानी ‘किसी से न कहना’ जिसे ‘सरिता’ में स्थान मिला था। इस कहानी को भी प्रतिलिपि में 33 हजार से अधिक पाठकों का प्यार मिल चुका है। ऐसी ही बहुत सी घटनाएँ हैं जो मेरी कहानियों का आधार बनी।
प्रश्न: अच्छा, अपनी रचनाओं के शीर्षक के विषय में आप क्या सोचती हैं? शीर्षक रचना क्रम में कब आता है? पहले या बाद में? और एक शीर्षक रचना के लिए कितना महत्वपूर्ण होता है?
उत्तर: रचनाओं में शीर्षक बहुत महत्वपूर्ण होता है। शीर्षक ऐसा होना चाहिए जिसको देखकर पाठक के मन में उस रचना को पढ़ने की जिज्ञासा जाग्रत हो उठे। मेरे विचार से शीर्षक कहानी का निचोड़ होता है। वह कहानी में हो भी सकता है या नहीं भी। मेरी कहानियों में अधिकतर शीर्षक कहानी के अंत में ही होता है।
प्रश्न: अच्छा मैम, आप इतने समय से लेखन कर रही हैं। आपने असंख्य कहानियाँ लिखी हैं। क्या आपकी लेखन प्रक्रिया में इतने समय में कोई फर्क आया है?
उत्तर: लेखन प्रक्रिया में अंतर तो आया है। पहले कोई विचार मन में आता था तो उसे कहीं नोट कर लेती थी फिर जब समय मिलता था उसे पूरा कर लेती थी। उस समय हाथ से लिखना पड़ता था अतः कोशिश रहती थी कि एक बार में ही रचना पूरी हो जाए। सन् 1997 से जब मैंने कम्प्यूटर पर लिखना प्रारम्भ किया तब भी कोशिश यही रहती थी कि पहले अपने भावों को कहीं लिख लूँ फिर टाइप करूँ किंतु पिछले लगभग 20-22 वर्षों से कम्प्यूटर पर ही सीधे लिख रही हूँ। इसमें यह सुविधा है कि कहीं भी कुछ जोड़ लो या कहीं भी कुछ हटा दो किंतु इस प्रक्रिया में कभी-कभी रचना पूर्णता प्राप्त नहीं कर पाती। सदा यही लगता है कि कुछ कमी है। इसके अतिरिक्त आजकल कभी-कभी राइटर्स ब्लॉक का भी शिकार होने लगी हूँ। भाव आते हैं लेकिन कलम चल नहीं पाती।
प्रश्न: राइटर्स ब्लॉक का आपने ज़िक्र किया है। हर लेखक कभी न कभी इससे दो चार होता है। इससे उभरने के लिए आप क्या करती हैं?
उत्तर: ‘राइटर्स ब्लॉक’ की समस्या से उबरने के लिए मैं कुछ दिनों का विराम लेती हूँ। उस समय पुस्तकें पढ़ती हूँ, मूवी देखती हूँ या अपनी उन मित्रों से बात करती हूँ जिनसे समय की कमी के कारण बात नहीं कर पा रही थी। अगर सम्भव हुआ तो घूमने निकल जाती हूँ। कुछ दिनों का दिनचर्या में यह बदलाव मुझे पुनः अपने लेखन की ओर खींचने लगता है, और मैं सफल भी होती हूँ।
प्रश्न: आपने प्रौढ़ पाठकों के लिए लेखन तो किया ही है साथ ही बाल साहित्य भी प्रचुर मात्रा में लिखा है। दोनों तरह के लेखन में आप क्या फर्क देखती हैं? क्या आपकी लेखन प्रक्रिया दोनों तरह के लेखन में अलग अलग होती है। यदि हाँ तो यह फर्क क्या होता है?
उत्तर: प्रौढ़ लेखन और बाल लेखन में बहुत अंतर है। बड़ों के लिए हम कोई भी विषय चुन सकते हैं। भाषा भी सरल या क्लिष्ट हो सकती हैं किंतु बच्चों के लिए लिखने में लेखक को बच्चों के समान ही बच्चा बनकर सोचना, समझना तथा उनकी रुचि के अनुसार विषयों पर सहज, सरल भाषा में छोटे-छोटे वाक्यों में लिखना पड़ता है। आज कम्प्यूटर युग में पलते-बढ़ते बच्चे के लिए लिखना बड़ों के लिए लिखने से अधिक दुष्कर प्रतीत होता है क्योंकि वे पढ़ना कम तथा देखना ज्यादा चाहते हैं।

प्रश्न: बाल साहित्य की बात चली है तो ऐसा देखा जा रहा है कि आजकल बच्चों के ध्यानावधि (अटेंशन स्पैन) में काफी कमी आ रही है। ऐसे में बाल साहित्यकार विशेषकर हिंदी के बाल साहित्यकारों को किन बातों का ध्यान रखना चाहिए?
उत्तर: यह सच है कि आजकल बच्चों में ध्यानावधि में कमी आ रही है। इसका कारण है कि आजकल के कार्यव्यस्त माता-पिता बच्चे को शांत रखने के लिए बचपन से ही उसके हाथों में मोबाइल पकड़ा देते हैं। धीरे-धीरे यह आदत इतना विषम रूप ले लेती है कि वह अन्य चीजों में ध्यान नहीं लगा पाता। ऐसी स्थिति में अगर उसे पुस्तक दी जाए तो कुछ पलों पश्चात ही उसका ध्यान मोबाइल की तरफ चला जाएगा। बच्चों में आती इस कमी को दूर करने के लिए माता-पिता को मोबाइल की जगह उनको खिलौने से खेलने या पुस्तक पढ़ने की आदत डालनी चाहिए। बाल साहित्यकारों को बच्चे की उम्र के अनुरूप छोटी तथा रंगीन चित्रों वाली कहानी लिखनी चाहिए। कहानी का शीर्षक तथा चित्र ऐसे हों जिनको देखकर बच्चे में पुस्तक पढ़ने की जिज्ञासा जाग्रत हो। कविता लयबद्ध हो जो बच्चे खेल-खेल में आसानी से याद कर सकें।
प्रश्न: अच्छा, मनुष्य अपनी गलतियों से सीखता है। कोई ऐसी बातें हैं जो आप समझती हैं कि लेखन के शुरुआती वर्षों में आपने नहीं की होती तो और बेहतर होता?
उत्तर: लेखन के शुरुआती दौर में एक कमी तो यह थी कि मैंने लेखन को गम्भीरता से नहीं लिया, लिखा लेकिन वह डायरी में ही सिमट कर रह गया। प्रकाशनार्थ भेजने से बचती रही… शायद मैं अपने लेखन के प्रति आश्वस्त नहीं थी। विवाह के पश्चात् पारिवारिक दायित्वों में ऐसी फँसी कि भूल ही गयी कि कभी लेखन भी मेरा शौक था। धीरे-धीरे आदेशजी की अपने कार्यक्षेत्र में व्यस्तता बढ़ती गयी, बच्चे भी अपनी पढ़ाई में व्यस्त होते गये। स्वयं को व्यस्त रखने के लिए मैंने होमियोपैथी का कोर्स किया। कुछ दिन प्रेक्टिस भी की किंतु मन को कुछ और ही चाहिए था लेकिन क्या, समझ नहीं पा रही थी! मुझे अपनी स्थिति से असंतुष्ट देखकर एक दिन आदेश जी ने मुझसे कहा कि तुम तो लिखा करती थीं तुम फिर से वही शौक क्यों नहीं अपना लेतीं? अंधे को क्या चाहिए दो आँखें…बस राह मिल गयी। यद्यपि इतने वर्षो बाद लिखना आसान नहीं था। शुरुआती समय में मन के भावों को व्यक्त करने के लिए शब्द ही नहीं मिलते थे। गनीमत थी कि इतने वर्षों पश्चात भी मेरी अपूर्ण रचनाओं की डायरी सुरक्षित थी जिसे मैं विवाह के पश्चात अपने साथ ले आयी थी। अपनी पुरानी रचनाओं को निकालकर, उन्हें फिर पढ़ा तथा उन्हें सुधार कर भेजना प्रारम्भ किया। मेरी उन रचनाओं को पत्रों में तो स्थान मिला ही, धीरे-धीरे अन्य रचनाओं को भी पत्रिकाओं में स्वीकृति मिलनी प्रारम्भ हो गयी। यहाँ यह कहने में मुझे कोई संकोच नहीं है कि आज मैं जो कुछ हूँ, आदेश जी के कारण ही हूँ। रचनाओं को टाइप करवाकर भेजने की समस्या को दूर करने के लिए,उन्होंने न केवल मेरे लिए कम्पूटर खरीदा वरन् हिंदी में टाइप करना भी सिखाया। परिवार और समाज के बिना व्यक्ति अधूरा है। यहाँ मैं यह भी संदर्भित करना चाहूँगी कि मेरी इस लेखन यात्रा में मुझे मेरे परिवार के हर सदस्य के साथ मेरे इष्ट मित्रों, शुभचिंतकों का भी भरपूर साथ, सहयोग और सराहना मिली।
प्रश्न: लेखन के क्षेत्र में जो नयी पीढ़ी अभी आने की कोशिश कर रही है उन्हें आप कुछ सलाह देना चाहेंगी? कुछ ऐसी बातें जो उन्हें करनी चाहिए और कुछ ऐसी बातें जिनसे आपके खयाल से उन्हें बचना चाहिए?
उत्तर: नये लेखकों को मैं यही कहना चाहूँगी कि आप लिखें, खूब लिखें। अगर आपकी रचना लौट भी आती है तो आप निराश न हो। रचना के लौटने का अर्थ यह नहीं है कि आपकी रचना स्तरीय नहीं है। कभी-कभी सम्पादकों की नीतियों पर खरी न उतरने पर भी रचना लौट आती है। एक पत्रिका से लौटी रचना आप दूसरी पत्रिका में भेजकर देखिये। इसके अतिरिक्त आजकल कई वेब पोर्टल और वेबसाइट हैं, जहाँ अपनी रचनाएँ प्रकाशित कर आप अपनी बात पाठकों तक पहुँचा सकते हैं। वास्तव में पाठक ही लेखक की रचनाओं के समीक्षक होते हैं। अगर आप अच्छा लिख रहे हैं तो आपको आगे बढ़ने से कोईं नहीं रोक पायेगा।
इसके साथ ही एक बात और कहना चाहूँगी कि अगर आप अच्छा लिखना चाहते हैं तो आपको पुस्तकें पढ़ने की आदत डालनी होगी। मेरा मानना है पुस्तकों का कोई विकल्प नहीं हो सकता। उम्र का कोई पड़ाव हो, पुस्तकों से बढ़कर साथी कोई नहीं है। पुस्तकें हँसाती भी हैं और रुलाती भी हैं, अपनों से मिलवाती भी हैं। ई-मैगजीन या ई-बुक पढ़ने में वह संतुष्टि नहीं मिलती,जो पुस्तक पढ़ने में मिलती है। आजकल ऑडियो कहानियों का प्रचलन भी बढ़ा है। नयी पीढ़ी से मेरा आग्रह है कि वे इन्हें देखें, सुनें, किंतु पुस्तकें भी अवश्य पढ़ें क्योंकि इससे आपकी भाषा समृद्ध होगी। इसके साथ ही एक बात और कहना चाहूँगी कि आप पढ़ें, किंतु जब भी लिखें अपनी मौलिकता से समझौता न करें, किसी की नकल न करें।
प्रश्न: आप इन दिनों क्या लिख रही हैं? क्या पाठकों से अपनी आने वाली रचनाओं के विषय में कुछ साझा करना चाहेंगी?
उत्तर: आजकल मैं भारतीय ज्ञान परम्परा को समझने का प्रयास कर रही हूँ। भारतीय ज्ञानपरम्परा में स्त्री शिक्षा, भारतीय ज्ञान परम्परा में आयुर्वेद तथा होमियोपैथी विषय पर आलेख लिखे हैं जो स्वीकृत भी हो चुके हैं। कहानियाँ तो लिख ही रही हैं, प्रकाशित भी हो रही हैं। इसके अतिरिक्त एक उपन्यास पर भी काम कर रही हूँ।
प्रश्न: इन दिनों आप क्या पढ़ रही है? क्या आप कुछ पुस्तकों के नाम पाठकों से साझा करना चाहेंगे जो कि हाल फिलहाल में आपको पसंद आयी हों और आप चाहती हों हमारे पाठकों को उन्हें पढ़ना चाहिए?
उत्तर: मैंने कहानी उपन्यास खूब पढ़े हैं किंतु अब मैं भारतीय ज्ञान परम्परा के बारे में जानने के साथ रामायण और महाभारत जिनके पुरातात्विक प्रमाण मिलने के बावजूद जिन्हें काल्पनिक कहा जाता है, को पढ़ना और समझना चाहती हूँ। रामायण तो मैं पढ़ चुकी हूँ किंतु आज भी उसकी अंतरात्मा के मर्म तक नहीं पहुँच पायी हूँ। आजकल महाभारत पढ़ रही हूँ। इन ग्रन्थों के किसी पात्र पर अगर लिख पायी तो लिखना चाहूँगी। इसके पश्चात हो सका तो वेदों को भी पढ़ना चाहूँगी। वैसे अभी कुछ महीनों पूर्व मैंने गीतांजलि श्री द्वारा रचित अंतर्राष्ट्रीय बुकर पुरस्कार से पुरस्कृत पुस्तक ‘रेत समाधि’ पढ़ी थी। जहाँ तक पाठकों का प्रश्न है, उनसे यही कहना चाहूँगी कि आप अपनी रुचि के अनुसार पढ़ें क्योंकि यह कोई आवश्यक नहीं कि जो किसी एक को पसंद आए, वही दूसरे को भी पसंद आए।
प्रश्न: आखिर में मैम आप अगर आप पाठकों को कोई संदेश देना चाहें तो वह क्या होगा?
उत्तर: मैं पाठकों से यही कहना चाहूँगी कि अगर आप बच्चों को सुसंस्कृत और संस्कारी बनाना चाहते हैं तो उनके हाथों में मोबाइल की जगह पुस्तकें दें। उनमें पठन-पठन की रुचि विकसित करें जिससे उनमें सकारात्मक सोच के साथ नैतिक शिक्षा, देशभक्ति, ईमानदारी और कर्तव्य की भावना विकसित हो सके। आज के बच्चे हमारे कल का भविष्य हैं। जैसी उनकी सोच होगी वैसा ही हमारे देश का ताना-बाना होगा।
तो यह थी लेखिका सुधा आदेश से हमारी बातचीत। बातचीत के विषय में अपनी राय आप हमें टिप्पणी के माध्यम से दे सकते हैं।
