सबुज हालदार हिंदी, अंग्रेजी और बांग्ला भाषाओं में समान अधिकार रखते हैं। हिंदी और बांग्ला में वह लेखन और अनुवाद करते हैं। ‘मुरांग: नरक का शैतान‘, ‘999 थाँगी ‘उनकी लिखी पुस्तकें हैं। गैस्टन लरू की ‘द मिस्ट्री ऑफ द येलो रूम’ का ‘पीले कमरे का रहस्य‘ के नाम से और आर्थर कॉनन डॉयल की पुस्तक ‘द लॉस्ट वर्ल्ड’ का ‘खोई हुई दुनिया’ के नाम से वो अनुवाद कर चुके हैं।
एक बुक जर्नल पर हमने उनसे उनके लेखन और उनके द्वारा किए गये अनुवादों के ऊपर यह बातचीत की है। आप भी पढ़ें:
प्रश्न: नमस्कार सबुज जी, एक बुक जर्नल में आपका स्वागत है। सर्वप्रथम तो पाठकों को अपने विषय में कुछ बताएँ?
उत्तर: बहुत-बहुत धन्यवाद विकास जी। मेरे जैसे एक नौसिखिए का साक्षात्कार लेने के लिए मैं बहुत आभारी हूँ।
सबसे पहले मैं सभी पाठकों/पाठिकाओं, मेरी किताब के प्रकाशक ‘सूरज पॉकेट बुक्स’ और लेखक ‘श्री अनादि शुभानंद’ महाशय को दिल से धन्यवाद देना चाहता हूँ। अगर ये लोग न होते, तो शायद मुझे हिंदी साहित्य जगत में कहानीकार के रूप में प्रवेश ही न मिलता। और यहीं पर मैं स्पष्ट कर दूँ कि मैं हिंदी भाषा के साथ-साथ बांगला भाषा में भी लिखता हूँ, इसलिए एक कहानीकार के रूप में मेरी कहानियाँ दो अलग-अलग भाषाओं और दो अलग-अलग क्षेत्रों की संस्कृतियों का सुंदर मेल-जोल कराती हैं।
अब आते हैं आपके सवालों के जवाब पर। मैं कोशिश करूँगा कि जितना सम्भव हो, सब कुछ विस्तार से समझाऊँ। इसलिए साक्षात्कार थोड़ा लम्बा हो सकता है, उम्मीद है आप मुझे इसके लिए माफ कर देंगे।
मैं मूल रूप से पश्चिम बंगाल का निवासी हूँ। मेरे पिताजी रेलवे कर्मचारी थे और उनकी ट्रांसफर वाली नौकरी के कारण बचपन में मैंने पश्चिम बंगाल के साथ-साथ उत्तर प्रदेश के मोगलसराय, लखनऊ आदि जगहों पर रहकर गुजारा है। नतीजतन मुझे विभिन्न स्थानों की संस्कृति और भाषा देखने-समझने का मौका मिला।
मैंने कोलकाता विश्वविद्यालय से एकाउंटेंसी में ऑनर्स के साथ बी. कॉम. पास किया और उसके बाद वेस्ट बंगाल यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्नोलॉजी से फाइनेंस में एम.बी.ए. किया।
शुरुआत में कुछ समय बैंकिंग सेक्टर में काम करने के बाद वर्तमान में मैं एक राज्य सरकारी कर्मचारी हूँ और कोलकाता के पास बैद्यबाटी नामक एक छोटे शहर में रहता हूँ।
प्रश्न: साहित्य से आपका जुड़ाव कैसे हुआ? क्या घर में पठन पाठन का माहौल था?
उत्तर: साहित्य से मेरा जुड़ाव कॉमिक्स के माध्यम से हुआ। हालाँकि हमारे देश के बुद्धिजीवी कॉमिक्स को साहित्य का हिस्सा नहीं मानते, लेकिन मैं फिर भी कहूँगा कि किताबों के प्रति मेरी रुचि कॉमिक्स से ही विकसित हुई। चाचा चौधरी, नागराज, सुपर कमांडो ध्रुव आदि।
खैर, कॉमिक्स पढ़ते-पढ़ते बाद में चंदामामा मैगजीन पढ़ना शुरू किया और फिर धीरे-धीरे कहानियाँ और उपन्यास पढ़ने लगा।
मेरे घर में भी बहुत पहले से साहित्य और संस्कृति की चर्चा का माहौल था। मैंने पिताजी को विभिन्न विषयों की किताबें पढ़ते और विभिन्न लिटिल मैगजीन में बांगला भाषा में कविताएँ लिखते देखा है। साथ ही मेरी माँ सामाजिक और ऐतिहासिक उपन्यास पढ़ना बहुत पसंद करती हैं।
प्रश्न: वह कौन से लेखक और रचनाएँ हैं जिन्होंने बचपन में साहित्य के प्रति आपके में रुचि जागृत की थी?
उत्तर: जैसा कि मैंने पहले ही कहा है, मेरे माता-पिता दोनों को साहित्य के प्रति पर्याप्त रुचि थी। मैं भी धीरे-धीरे उनके हाथ थामकर साहित्य की दुनिया में घुस गया और बांगला में सत्यजीत राय, बिभूतिभूषण बंद्योपाध्याय से लेकर शरतचंद्र चट्टोपाध्याय, हेमेंद्रकुमार राय आदि लेखकों की रचनाएँ पढ़ने लगा। साथ ही हिंदी में मुंशी प्रेमचंद, सुरेंद्र मोहन पाठक, परशुराम शर्मा, राजन-इकबाल सीरीज और चंदर की किताबें पढ़ता रहा।
हिंदी और बांग्ला किताबें पढ़ते समय मुझे लगा कि साहित्य की दुनिया में भाषा कोई दीवार नहीं होनी चाहिए। हिंदी किताबों का बांगला में अनुवाद होना चाहिए, तो बांगला किताबों का भी हिंदी में होना चाहिए।
खैर, इसी तरह शुरू हुआ और बाद में विश्व साहित्य, खासकर डिटेक्टिव स्टोरी और हॉरर स्टोरी के प्रति मेरा आकर्षण बढ़ता गया। सर आर्थर कोनन डॉयल, एगाथा क्रिस्टी, एडगर एलन पो, ब्रैम स्टोकर, एच. पी. लवक्राफ्ट, जी. के. चेस्टरटन आदि लेखकों की रचनाएँ पढ़कर मैं मंत्रमुग्ध हो गया।
यही मेरे पाठक जीवन की शुरुआत थी।
प्रश्न: लेखन का खयाल आपके मन में कब आया? क्या कोई विशेष क्षण था जब आपने सोचा कि आपको भी लिखना चाहिए? आपको आपकी प्रथम रचना याद है?
उत्तर: बचपन में, जब मैं आठवीं कक्षा में पढ़ता था, तब पहली बार स्कूल मैगजीन में एक भूत की कहानी (नाम याद नहीं) लिखी, जो स्कूल के शिक्षकों और साथियों को बहुत पसंद आयी। बस वहीं से शुरुआत हुई। बाद में एक नाट्य संस्था के लिए कुछ नाटक लिखे और स्कूल-कॉलेज मैगजीन के लिए लगातार बांगला में लिखता रहा।
प्रश्न: आपकी पहली रचना कौन सी थी जो कि प्रकाशित हुई थी? क्या आपको वह रचना याद है? उस रचना के विषय में कुछ बताना चाहेंगी जैसे उसे लिखने का विचार कैसे आया? प्रकाशन का अनुभव कैसा रहा?
उत्तर: चूँकि मैं वर्तमान में हिंदी और बांग्ला दोनों भाषाओं में लिख रहा हूँ, इसलिए इस सवाल का जवाब थोड़ा लम्बा होगा।
कॉलेज के समय पश्चिम बंगाल की बहुत लोकप्रिय बांग्ला किशोर साहित्य पत्रिका ‘शुकतारा’ में मेरी लिखी एक भूतिया कहानी छपी। यही पहली बार था जब मेरी कोई रचना किसी प्रसिद्ध प्रकाशन के अधीन प्रकाशित हुई। कहानी का नाम था ‘नोबिनेर बोंधु (नवीन का दोस्त)’। यह बच्चों के लिए भूत की एक सुंदर कहानी थी, जिसमें एक भूत एक छोटे बच्चे का दोस्त बनकर उसे विभिन्न कामों में मदद करता है।
पहली बार अपनी रचना किसी प्रतिष्ठित पत्रिका में देखकर बहुत खुशी हुई, लेकिन तब इतना आत्मविश्वास नहीं था कि मैं अपना एकल ग्रंथ प्रकाशित कर सकूँ।
लेकिन बाद में विभिन्न कहानियों और उपन्यासों का अंग्रेजी से बांग्ला में अनुवाद करते-करते मेरा आत्मविश्वास बढ़ा और ‘समृद्ध प्रकाशनी’ से मेरी अनूदित बांगला किताब ‘कारमिल्ला (Carmilla)’ प्रकाशित हुई।
इस बीच मैं नियमित रूप से हिंदी साहित्य के थ्रिलर उपन्यास और किताबें पढ़ता रहा। अमित खान, ओमप्रकाश शर्मा, एस. सी. बेदी जी। मैंने देखा कि बेदी जी के बाद शुभानंद सर ने राजन इकबाल सीरीज फिर से लिखना शुरू किया, बहुत अच्छा लगा। हमारे देश में पैस्टिश बहुत लोकप्रिय नहीं है, लेकिन मुझे यह बहुत पसंद आया। लगा कि अगर मैं भी शर्लाक होम्स, हर्क्यूल पोयरो, फेलुदा, ब्योमकेश बक्शी, तारानाथ तांत्रिक आदि पर पैस्टिश लिखूँ और वह हिंदी में हो, तो कैसा होगा? और अगर अंग्रेजी के साथ बांग्ला की प्रसिद्ध रचनाओं का हिंदी अनुवाद कर सकूँ तो? बांगला में तो बहुत लिख लिया, अब हिंदी में भी लिखकर देखूँ।
सपना बहुत बड़ा था, लेकिन मेरे त्राता बने खुद ‘शुभानंद सर’। मैंने हिम्मत करके गेस्टन लरू की प्रसिद्ध लॉकड रूम मिस्ट्री ‘द मिस्ट्री ऑफ येलो रूम’ का हिंदी अनुवाद करके सर को भेज दिया। और उसके बाद जो हुआ, वह मेरे लिए सपने जैसा था!

एक शाम सर ने खुद मुझे फोन किया, पहले तो मैंने पहचाना नहीं, पहचानते ही घबराहट से गला सूख गया। लेकिन सर इतने विनम्र थे कि धीरे-धीरे मेरा संकोच दूर हो गया।
बस फिर क्या, ‘सूरज पॉकेट बुक्स’ से मेरी हिंदी में पहली अनूदित किताब ‘पीले कमरे का रहस्य’ प्रकाशित हुई। आत्मविश्वास बढ़ गया। अब फैसला किया कि एक मौलिक किताब छपवाने का प्रस्ताव दूँ। मुरांग की कहानियाँ पहले से लिखी हुई थीं। भगवान का नाम लेकर पांडुलिपि मेल कर दी। बस, सर को यह भी पसंद आयी।
‘मुरांग’ प्रकाशित हुई और पाठकों से भरपूर प्यार मिला।
इसलिए ‘नवीन का दोस्त’ मेरी बांगला में पहली कहानी, ‘कारमिल्ला’ बांगला में पहली अनूदित किताब, ‘पीले कमरे का रहस्य’ हिंदी में पहली अनूदित किताब और ‘मुरांग – नरक का शैतान’ हिंदी में मेरी पहली मौलिक किताब।
प्रश्न: आपका पहला संग्रह ‘मुरांग: नरक का शैतान’ एक पारलौकिक कथाओं का संग्रह है। पारलौकिक साहित्य में आपकी रुचि कब जागृत हुई?
उत्तर: पारलौकिक साहित्य के प्रति मेरा आकर्षण बहुत छोटी उम्र से ही जग गया, जब मैंने हेमेंद्रकुमार राय की बांगला में लिखी कहानियाँ और उपन्यास पढ़े। फिर जैसे-जैसे बड़ा हुआ, सत्यजीत राय, ब्रैम स्टोकर, लवक्राफ्ट, स्टीफन किंग की रचनाएँ पढ़कर मंत्रमुग्ध हो गया।
प्रश्न: वह कौन से लेखक थे जिन्होंने इस विधा के प्रति आपकी रुचि को जागृत किया?
उत्तर: मैं सबसे ज्यादा प्रभावित हुआ बिभूतिभूषण बंद्योपाध्याय की ‘तारानाथ तांत्रिक’ पढ़कर। तभी मैंने ठान लिया कि मैं भी ऐसा ही एक चरित्र बनाऊँगा। मुझे महसूस हुआ कि भारतीय माइथोलॉजी में उत्कृष्ट साहित्य रचने के लिए पर्याप्त सामग्री है। तभी से मैंने तंत्र शास्त्र, खासकर काली तंत्र, अघोर तंत्र और वज्रयान तंत्र पर पढ़ाई शुरू की। साथ ही मैं तंत्र को लेकर लोगों की गलत धारणाओं को भी तोड़ना चाहता था। इसलिए मैंने ‘रुद्रनाथ तांत्रिक’ चरित्र की सृष्टि की। यद्यपि तारानाथ और रुद्रनाथ में बहुत अंतर है।
प्रश्न: पारलौकिक घटनाओं को आप किस तरह देखते हैं? क्या आपका इनमें विश्वास है? कोई अनुभव जो आप साझा करना चाहें?
उत्तर: इस मामले में खुद मेरे मन में बहुत द्वंद्व है। सामान्यतः किताबों में जो पढ़ते हैं, उनमें मेरा कोई विश्वास नहीं है, लेकिन विभिन्न जगहों पर घूमते हुए कुछ ऐसी अनुभूतियाँ हुई हैं, जिनकी व्याख्या आज तक मुझे नहीं मिली। जिसकी व्याख्या मैं खुद नहीं कर पाया, उसके बारे में मैं दूसरों को क्या कहूँ?
फिर भी मैं कहूँगा कि पृथ्वी पर बहुत कुछ ऐसा है जिसकी व्याख्या आज तक विज्ञान भी नहीं ढूँढ पाया। मैं बस इतना ही कह सकता हूँ—
There are more things in heaven and earth, Horatio, than are dreamt of in your philosophy.
प्रश्न: अच्छा, आप यह कैसे निर्धारित करते हैं कि आपको अमुख कहानी लिखनी चाहिए? वह क्या चीज़ें हैं जो आपको लेखन के लिए प्रेरित करती हैं? कुछ रचनाओं के उदाहरण देकर आप बताना चाहेंगे?
उत्तर: ‘एंटरटेनमेंट, एंटरटेनमेंट एंड एंटरटेनमेंट…’, जो भी कहानी मैं लिखता हूँ, मेरी फर्स्ट प्रायोरिटी हमेशा यही रहती है कि लोग उसे पढ़कर एंटरटेन हो जाएँ।
और मैं हमेशा कोशिश करता हूँ कि अपनी लेखनी में नये-नये तरह के प्रयोग करता रहूँ। क्योंकि जो अलग दिखता है, मार्केट में वही बिकता है।
लेकिन मेन फैक्टर वही एंटरटेनमेंट ही होता है। इसके साथ ही मैं मनोरंजन के माध्यम से पाठकों के सामने हमारे देश की संस्कृति और सामाजिक चित्र प्रस्तुत करने की कोशिश करता हूँ। साथ ही कहानी में हमेशा गति बनाए रखने की कोशिश करता हूँ, अनावश्यक संवाद या वर्णन से कहानी को लम्बा नहीं करता। जैसे इच्छाधारी या मुरांग की कहानियाँ— मैं चाहता तो इन्हें खींचकर उपन्यास बना सकता था, लेकिन नहीं किया। मेरा मुख्य लक्ष्य हमेशा थोड़ा अलग तरह की कहानी लिखना रहता है और इसमें हमेशा हैप्पी एंडिंग भी नहीं होती। डार्क स्टोरी लिखना मुझे बहुत पसंद है और मैं वही कोशिश करता हूँ। मैं चाहता हूँ कि मेरी रचना पढ़ते-पढ़ते पाठक खुद अपनी कल्पना से कहानी बनाएँ। और पाठकों का प्यार ही मेरे लिए सबसे बड़ी प्रेरणा है।
प्रश्न: मुरांग की कहानियाँ अलग अलग परिवेश की कहानियाँ हैं? इनके किरदार भी अलग अलग परिवेश से आते हैं? कुछ इन कहानियों के विषय में बताएँ कि इन्हें लिखने की प्रेरणा कहाँ से मिली?
उत्तर: हाँ, बिल्कुल सही कहा आपने – मुरांग की हर कहानी अलग-अलग परिवेश में घटित होती है और इनके किरदार भी अलग अलग परिवेश से आते हैं, यही मेरी लेखन शैली की विविधता है। मैं चाहता हूँ कि मेरी रचनाएँ एक-दूसरे से थोड़ी अलग हों।
मुरांग की कहानी मैंने पूरी तरह तंत्र और हिंदू माइथोलॉजी पर आधारित लिखी है, साथ ही समाज में चल रही भ्रष्टाचार और अन्याय के खिलाफ थोड़ा विरोध भी दर्ज किया है। मेरी इच्छा थी कि विदेशी साहित्य के पैरानॉर्मल एक्सपर्ट ‘कॉन्स्टेंटाइन’ की तरह एक देशी ‘पैरानॉर्मल एक्सपर्ट’ चरित्र बनाऊँ। इसलिए ‘रुद्रनाथ तांत्रिक’ बनाया, जो बाइबल के वर्स नहीं बल्कि हमारे शास्त्रों के श्लोक और मंत्रों से शैतान का सामना करेगा। उसके हाथ में पवित्र क्रॉस नहीं, रुद्राक्ष की माला होगी।

फिर ‘परी’ में मैंने पूरे समय रहस्य, भय और मनोवैज्ञानिक आतंक पैदा करने की कोशिश की। मुझे हमेशा लगता है कि मानसिक रोगी थोड़े रहस्यमयी होते हैं, और इंसान के मस्तिष्क से ज्यादा रहस्यमयी कोई चीज दुनिया में नहीं। इसलिए इस कहानी का पृष्ठभूमि एक मानसिक अस्पताल है। यह कोई साधारण साइकोलॉजिकल थ्रिलर नहीं, बल्कि ‘पैरासाइकोलॉजिकल थ्रिलर’ कहला सकता है।
फिर ‘इच्छाधारी’ पूरी तरह अलग तरह की हॉरर कहानी है, जहाँ एक साधारण परिवार कैसे एक अपशक्ति के हाथों नष्ट हो जाता है, यही उसकी कहानी है।
‘हरित’ हमें याद दिलाता है कि इंसान और विभिन्न जंतु-जानवर, कीड़े-मकोड़े के अलावा प्राण का एक और रूप भी है। सुंदरवन के जंगल में ऐसे ही एक सत्ता से कुछ शहरी लोग टकराते हैं। अत्यधिक जिज्ञासा कैसे हमारे जीवन को बर्बाद कर सकती है, यह इस कहानी में बहुत अच्छे से समझ आता है।
‘शाकिनी’ एक पूरी तरह हॉरर स्टोरी है। इसमें एक हिचहाइकर कैसे खुद शिकार बन जाता है, यही उसकी कहानी है।
‘चोर’ कहानी को ‘साइकोलॉजिकल हॉरर थ्रिलर’ कहा जा सकता है। इसमें इंसान का मस्तिष्क ही असली भय पैदा करता है। इसमें कोई अलौकिक तत्व नहीं है। और यह कहानी एक सच्ची घटना पर आधारित है, वह घटना कई साल पहले बिहार के किसी एक इलाके में हुई थी।
‘भय’ की बहुत सारी व्याख्याएँ हैं। हर व्यक्ति अलग-अलग चीज से डरता है, इसलिए मैंने यहाँ छह अलग-अलग तरह के भय की कहानियाँ लिखी हैं।
प्रश्न: अच्छा, अपनी रचनाओं के शीर्षक के विषय में आप क्या सोचते हैं? शीर्षक रचना क्रम में कब आता है? पहले या बाद में? और एक शीर्षक रचना के लिए कितना महत्वपूर्ण होता है?
उत्तर: मेरे विचार में किसी कहानी या किताब का शीर्षक बहुत महत्वपूर्ण होता है, क्योंकि यही वह चीज है जिससे पाठक सबसे पहले आपकी रचना या किताब की ओर आकर्षित होता है।
मेरे अनुसार शीर्षक बाद में तय करना चाहिए, कहानी के अनुसार शीर्षक होना चाहिए, शीर्षक के अनुसार कहानी नहीं।
एक अच्छा शीर्षक बहुत आसानी से पाठकों का मन अपनी ओर खींच सकता है।
प्रश्न: क्या आप पारलौकिक विषयों से अलग विषयों पर भी लेखन करना चाहेंगे? वह कौन से विषय हैं जो आपको आकर्षित करते हैं? क्या भविष्य में पाठक आपकी कलम से नये विषयों में लिखा कुछ देख सकते हैं?
उत्तर: बिलकुल, मुझे रहस्य साहित्य और डिटेक्टिव कहानियाँ लिखना भी बहुत पसंद है। मैं पहले ही कुछ बांग्ला यूट्यूब ऑडियो स्टोरी चैनलों के लिए रहस्य और डिटेक्टिव कहानियाँ लिख चुका हूँ, उम्मीद है भविष्य में हिंदी में भी लिखूँगा। साथ ही बच्चों के लिए भी भविष्य में लिखना चाहता हूँ। इसके अलावा ‘साइकोलॉजिकल थ्रिलर’ मेरा बहुत पसंदीदा विषय है। और अगर कोई प्रकाशक रुचि दिखाए तो ‘स्वर्गीय हेमेंद्रकुमार राय’ और अन्य लेखकों की रचनाओं का हिंदी अनुवाद करना चाहता हूँ।
प्रश्न: अच्छा, लेखन का आपका रूटीन क्या रहता है? क्या पाठकों के साथ साझा करना चाहेंगे?
उत्तर: ऐसा कोई रूटीन नहीं है, ऑफिस के काम के बीच-बीच में लिखता हूँ, रात को जब घर वाले सो जाते हैं तब लिखता हूँ। कभी-कभी ऑफिस से लौटकर शाम को भी लिख लेता हूँ। लेकिन जब भी कोई प्लॉट दिमाग में आता है, तो तुरंत मोबाइल के नोटपैड में नोट कर लेता हूँ।
प्रश्न: आपकी हाल ही में एक पुस्तक सूरज पॉकेट बुक्स से आई है? जरा उसके विषय में पाठकों को बताना चाहेंगे?
उत्तर: हाँ, आपने बिल्कुल सही कहा। कुछ दिनों पहले सुरज पॉकेट बुक्स (बुकेमिस्ट) की ओर से मेरी एक किताब पेपरबैक और किंडल फॉर्मेट में प्रकाशित हुई है। इस किताब में दो हॉरर लघु उपन्यास हैं— ‘999’ और ‘थांगी’।
पहली कहानी ‘999’ एक आध्यात्मिक हॉरर थ्रिलर है, जिसे मैंने ‘श्रीमद भगवत गीता’ में प्रदर्शित दर्शन पर आधारित करके लिखा है। यह एक अनोखा कॉन्सेप्ट है, जिसमें आध्यात्मिकता भी है, हॉरर एलिमेंट भी है और थ्रिलर भी। मेरे अपने निजी मत के अनुसार, यह कहानी अब तक का मेरा सबसे बेहतरीन काम है।

दूसरी कहानी है ‘थांगी’। यह एक पूरी तरह से हॉरर कहानी है। अरुणाचल प्रदेश की पृष्ठभूमि पर आधारित एक गोर हॉरर कहानी है। पढ़ते-पढ़ते आपके शरीर में सिहरन दौड़ जाएगी।
लगभग 220 पृष्ठों की ये दोनों कहानियाँ आपको निराश नहीं करेंगी।
प्रश्न: आप चूँकि अनुवाद भी करते हैं तो अनुवाद करने की क्या प्रक्रिया रहती है? क्या कोई विशेष बातें हैं जिनका आप अनुवाद करते समय खास ख्याल रखते हैं?
उत्तर: अनुवाद की प्रक्रिया वैसी कुछ खास नहीं है। अगर कोई किताब मुझे अच्छी लगे और लगे कि ये पाठकों को भी पसंद आएगी, तो मैं उसे अनुवाद कर लेता हूँ। अनुवाद करते समय कॉपीराइट का मामला भी ध्यान से देख लेता हूँ।
अनुवाद करते समय मैं मूल कहानी या तथ्यों में बहुत ज्यादा बदलाव करना पसंद नहीं करता। मैं चाहता हूँ कि जिस शैली में अंग्रेजी में लिखा गया है, लगभग उसी शैली में हिंदी में भी लिखा जाए, ताकि पाठक को ओरिजिनल फ्लेवर मिल सके। हाँ, भावानुवाद करना ज़रूरी है, लेकिन मूल कहानी या वाक्य रचना की शैली में ज्यादा बदलाव किए बिना ही उसे करने की कोशिश करता हूँ।
हम जो लोग अंग्रेजी साहित्य पढ़ते हैं, हम जानते हैं कि अंग्रेजी साहित्य या फ्रेंच साहित्य में कंपाउंड सेंटेंस (जटिल वाक्यों) का इस्तेमाल बहुत ज्यादा होता है, जबकि हिंदी में यह बहुत कम होता है। अनुवाद करते समय मैं कई मामलों में अनुवादित वाक्यों को कंपाउंड सेंटेंस के रूप में ही रख देता हूँ। हो सकता है कई लोग इसे पसंद न करें, मैं उनकी राय का सम्मान करता हूँ, लेकिन व्यक्तिगत रूप से मैं कहानी या वाक्य शैली में बहुत ज्यादा बदलाव नहीं करना चाहता। बाकी सब जनता जनार्दन पर निर्भर करता है।
प्रश्न: आपका हाल ही में एक अनुवाद भी किंडल पर प्रकाशित हुआ है। क्या उसके विषय में पाठकों को बताना चाहेंगे?
उत्तर: हाँ, हाल ही में मैंने ‘शरलॉक होम्स’ के रचयिता ‘सर आर्थर कोनान डॉयल’ द्वारा लिखित प्रसिद्ध एडवेंचर उपन्यास ‘द लॉस्ट वर्ल्ड’ का हिंदी भाषा में पूर्ण अनुवाद ‘खोई हुई दुनिया‘ नाम से किया है।
इस किताब में मैंने कई दुर्लभ तस्वीरें और बहुत सारे टिप्पणियाँ (Notes) का इस्तेमाल किया है। ये सभी टिप्पणियाँ पूरी तरह से मेरे द्वारा खुद तैयार की गई और दी गई हैं। इनके लिए मुझे और भी कई किताबें पढ़नी पड़ीं और बहुत सारी जानकारी इकट्ठा करनी पड़ी।

मुझे उम्मीद है कि इन छवियों और टिप्पणियों ने इस किताब की गुणवत्ता को और भी बढ़ा दिया है। साथ ही मैंने इस किताब की भाषा को जितना सम्भव हो सके, सरल और सहज रखने की कोशिश की है, ताकि बच्चे से लेकर बुजुर्ग, किसी को पढ़ने या समझने में कोई दिक्कत न हो।
यह किताब वर्तमान में अमेज़न किंडल पर उपलब्ध है।
प्रश्न: आप इन दिनों क्या लिख रहे हैं? क्या पाठकों से अपनी आने वाली रचनाओं के विषय में कुछ साझा करना चाहेंगे?
उत्तर: इन दिनों मैं एक हॉरर उपन्यास और कुछ साइकोलॉजिकल थ्रिलर कहानियाँ लिख रहा हूँ।
प्रश्न: इन दिनों आप क्या पढ़ रहे हैं? क्या आप कुछ पुस्तकों के नाम पाठकों से साझा करना चाहेंगे जो कि हाल फिलहाल में आपको पसंद आयी हों और आप चाहते हों हमारे पाठकों को उन्हें पढ़ना चाहिए?
उत्तर: इन दिनों मैं कुछ सीरियल किलरों के बारे में पढ़ रहा हूँ, मेरे अगले प्रोजेक्ट के लिए। इसके अलावा फ्रेडा वारिंगटन (Freda Warrington) का ‘ड्रेकूला द अनडेड’ उपन्यास पढ़ रहा हूँ। बहुत शानदार उपन्यास है। इसे ब्रैम स्टोकर के ‘ड्रेकुला’ का सीक्वल कहा जा सकता है। आप पढ़कर देख सकते हैं।
इसके अलावा हिंदी साहित्य में वर्तमान समय के अक्षत गुप्ता, सुमन बाजपेयी, अमित खान जी, शुभानंद सर, चंद्रप्रकाश पांडे जी, और बिलकुल मेरी किताबें पढ़कर देख सकते हैं, उम्मीद है निराश नहीं होंगे। और जिनका नाम मैं ले नहीं पाया, वे मुझे माफ कर दें। आप भी बहुत अच्छा लिखते हैं। नाम न लेने के कारण मुझे मारने मत आना।
प्रश्न: आखिर में सबुज जी आप अगर पाठकों को कोई संदेश देना चाहें तो वह क्या होगा?
उत्तर: ‘एक बुक जर्नल’ के माध्यम से मैं पाठकों तक यह संदेश देना चाहता हूँ कि कृपया हिंदी साहित्य के साथ खड़े रहें। मेरी किताबें पढ़ें या न पढ़ें, लेकिन बहुत से अच्छे लेखक-लेखिकाएँ हैं जो लगातार हिंदी में अद्भुत साहित्य रच रहे हैं, कृपया उनकी किताबें पढ़ें। मोबाइल फोन, लैपटॉप, टैब सब दूर रखकर किताब हाथ में लें। विश्वास कीजिये, इससे बेहतर दोस्त दुनिया में कोई नहीं। बच्चों के हाथ में भी कहानी की किताबें दें और एक स्वस्थ, सामान्य तथा संस्कृतिमनस्क समाज बनाने में आगे आएँ। हाँ, मोबाइल या टैब पर किंडल के माध्यम से किताब पढ़ना हो तो अलग बात है।
नमस्कार।
तो यह थी लेखक सबुज हालदार के साथ हमारी बातचीत। आपको यह बातचीत कैसी लगी? अपने विचार आप हमें टिप्पणियों के माध्यम से बता सकते हैं।
