‘रिंगा रिंगा रोज़ेज़’ में नील डी’ सिलवा (Neil D’ Silva) की अंग्रेजी में लिखी तीन लम्बी कहानियों या यूँ कहें उपन्यासिकाओं को संकलित किया गया है। इन कथाओं को ऊपरी तौर पर देखने पर तीन समानताएँ नज़र आती हैं। पहला ये कि हर कथा के केंद्र में एक बच्चा है। दूसरी समानता ये है कि इन तीनों कथाओं के ही मुख्य किरदारों का नाम ‘नि’ से शुरू होता है। और तीसरी समानता ये है कि तीनों ही बच्चे अपने जीवन में एकाकीपन का अनुभव कर रहे होते हैं। संग्रह की तीनों कथाएँ पठनीय हैं और लेखक ने भय पैदा करने के लिए ऐसे विषयों को चुना है जिनसे बच्चे कभी न कभी गुज़रते है।
संग्रह की पहली कहानी ‘चिल्ड्रन ऑफ द वॉल्स (Children of the Walls)’ है। कहानी के केंद्र में नित्या है। वह एक सात साल की लड़की है जो अपने माता‑पिता के साथ रहती है। नित्या के घर में उसके माता पिता और उसके सिवा कोई नहीं है। वो नये घर में पाँच साल पहले आये थे और उन्हें अपने हिसाब से घर को ढालने का मौका नहीं लगा था। पर अब उसकी माँ घर का पुनर्निर्माण कराने की सोचती हैं। इस दौरान कुछ ऐसा हो जाता है कि नित्या के कमरे में कोई आने लगता है। कोई बच्चा जो अपने साथ कुछ ऐसा ला रहा है जो नित्या के घर वालों के लिए सही नहीं है।
संग्रह की यह पहली कहानी मुझे पसंद आई। अगर आपके घर में बच्चे हैं तो उनको दिवारों पर चित्रकारी करना कितना पसंद है ये आपको भी मालूम होगा। लेखक ने बच्चों की इसी प्रवृत्ति को लेकर यहाँ पर कहानी बुनी हैं। साथ में इकलौते बच्चे को कई बार किस तरह एकाकीपन का सामना करना पड़ता है यह भी अच्छे से दिखलाया है। वहीं कई बार बच्चों के ऊपर माता पिता की अपेक्षाओं का क्या असर पड़ सकता है यह भी इधर दिखता है। लेखक ने इन सब को मिलाकर एक रोचक कथा लिखी है जो पठनीय है। कहानी आपको बाँधकर रखती है और आप ये देखने के लिए पढ़ते चले जाते हैं कि नित्या और उसका परिवार उस मुसीबत से कैसे पार पाएगा जिसमें उन्होंने खुद को डाल दिया है। कहानी आपको डराने में सफल भी होती है।
कहानी के कमजोर पक्ष की बात करूँ तो बस एक ही चीज़ थी जो मुझे खटकी। कहानी का एक प्लॉट पॉइंट ये है कि दीवार पर बने चित्र सच साबित होते हैं। हालाँकि जितने बार ऐसा होता दिखता है उतने बार चित्र बनने और सच होने में थोड़ा समय होता है। यह वकफ़ा दस से बारह घंटे का होता है। यानी शाम को चित्र बनता है तो अगले दिन घटना घटती है। बस कहानी के अंत के हिस्से में चित्र तुरंत ही सच्चाई में तब्दील हो जाता है। यह चीज क्यों ऐसी हुई इसके बारे में अगर लेखक किरदारों के माध्यम से बता देते तो पढ़ते हुए खटकता नहीं। बस यही चीज कहानी में मुझे खटकी थी। ऐसा लगा कहानी को एक निर्धारित अंत तक पहुँचाने के लिए लेखक ने अंतराल में ये बदलाव किया।
दूसरी कहानी द क्ले मदर (The Clay Mother) है। इस कहानी के केंद्र में निखिल है। वह गोवर्धन परिवार का सबसे छोटा बेटा है। उसके पिता के दो बड़े भाई हैं और उनके बच्चे भी इसी घर में रहते हैं। संयुक्त परिवारों में कई तरह के लोग होते हैं। ऐसे में बच्चों को, विशेषकर जो कि अंतर्मुखी होते हैं, कई बार दूसरे बच्चे अत्यधिक रूप से चिढ़ाकर या धौंस दिखाकर परेशान कर देते हैं। शर्मीले और उम्र में छोटे बच्चों के साथ ऐसा होता है। ऐसा ही निखिल के साथ होता है। पर उसको अपनी माँ सरस्वती का ही सहारा है। कहानी माँ बेटे के इस रिश्ते पर ही बनी है। कैसे उसका सहारा छिनता है और वो उस सहारे को एक मूर्ति में पाता है। फिर आगे जो होता है उससे कैसे उसके और उसकी परिवार की ज़िंदगी बदलती है वही कहानी बनती है। कहानी रोचक है और अंत सच में मुझे भयावह लगा। कहानी में पारलौकिक तत्व तो हैं लेकिन लेखक ने यह इशारा किया है मुख्य किरदार शायद किसी मानसिक विकार से पीड़ित था। इस बात को वो साफ-साफ नहीं दर्शाते हैं लेकिन इशारा रहता है जो कहानी को और भयावह बनाता है। वह इसलिए भी यहाँ जो आखिर में जो खौफनाक घटना होती है उसके पीछे पारलौकिक ताकत नहीं बल्कि एक इंसान का ही हाथ होता है।
कहानी एक अच्छी बात ये है कि वो कहानी पढ़ते हुए मन में उठे सभी सवालों के उत्तर दे देता है। कहानी घरेलू हिंसा और पितृसत्तात्मक परिवारों में स्त्री की स्थिति पर भी टिप्पणी करती है।
संग्रह की आखिरी कहानी ‘टू टेल (Two-Tail)’ एक घर लिटल पैराडाइज़ के आसपास घटित होती है। यह एक ऐसा घर है जिसकी मालकिन कैथरीन अनाथ बच्चों का ख्याल रखती है। यहाँ अक्सर ऐसे बच्चे आते हैं जो अनाथ हैं और उनका शोषण हो रहा है। ऐसा ही एक बच्चा निहार इधर आता है। वो अपने चाचा-चाची के साथ रह रहा होता है लेकिन जब उसके चाचा की मृत्यु हो जाती है तो अपनी चाची के अत्याचारों से त्रस्त होकर लिटल पैराडाइज आ जाता है। उसे लगता है यहाँ आकर उसके दुख और उसका एकाकीपन खत्म हो जाएगा। यहाँ उसे शुरुआत में सब कुछ अच्छा‑अच्छा तो लगता है पर धीरे‑धीरे पता लगता है कि इस अच्छाई के पीछे कुछ ऐसा भयावह भी छिपा है जिससे न केवल घर में रहने वाले बच्चे डरे हैं बल्कि घर के बड़े भी डरे हुए हैं। एक जीव टू टेल है जिससे लिटल पैराडाइज़ के सभी लोग डरते हैं। कुछ का मानना है कि वह मिथकीय जीव है जिसकी रचना बच्चों के मन में भय बैठाने के लिए की गई है लेकिन कुछ मानते हैं कि यह जीव असल में बच्चों की हत्या करता है। कहानी जैसे जैसे आगे बढ़ती है वैसे वैसे पाठक को यह पता चलता जाता है कि टू टेल के असलियत क्या है।
कहानी के आगे बढ़ने पर निहार और उससे जुड़ी ऐसी बातें भी पाठक को पता चलती हैं जिनके बारे में अधिक जानने की उत्सुकता उससे कहानी पढ़ा ले जाती है।
कहानी में लिटल पैराडाइज़ और वहाँ के मालिको द्वारा जो कमाई का साधन अपनाया गया है वो भी रहस्य का एक पहलू जोड़ता है।
कहानी में पारलौकिक शक्ति तो है लेकिन ये भी दर्शाया गया है कि बुराई मनुष्य में ही अधिक होती है। हाँ, कहानी खत्म होने पर कुछ सवाल रह जाते हैं।
कहानी में एक किरदर नुपुर है। अंत में आकर उसका लिटल पैराडाइज़ से रिश्ता जोड़ा जाता है और ये रिश्ता टू टेल की कहानी से भी जोड़ा जाता है। कहानी का यह हिस्सा मुझे अटपटा लगा। इधर इतना ही कहूँगा कि अगर दो अनाथ भाई बहन हैं और एक को पहले अनाथालय में भेजा गया है तो वो तो अपने साथ वालों या अनाथालय वालों को अपने भाई बहन के विषय में बताएँगे। पर इधर ऐसा नहीं हुआ। लेखक ने शायद ट्विस्ट देने के लिए ये कार्य किया था पर यह उतने अच्छे तरह से आ नहीं पाया। मुझे लगता है लेखक जो चीज हासिल करना चाहते थे वो आसानी से उन दो किरदारों को दोस्त बनाकर हासिल कर सकते थे।
इसके अलावा आखिर में किरदारों का मुख्य पारलौकिक शक्ति से टकराव थोड़ा अधिक फिल्मी हो जाता है। अगर उसे थोड़ा और भयावह बना सकते तो मुझे लगता है बेहतर होता।
अंत में यही कहूँगा कि मुझे रिंगा रिंगा रोज़ेज़ एक पठनीय संग्रह लगा। तीनों कहानियाँ रोचक हैं और आपको बाँध कर रखती हैं। एक दो छोटी‑छोटी बातें थीं जिन पर और काम करते तो दूर हो सकती थी पर उससे कहानी का लुत्फ उतना कम नहीं होता है।
हाँ, मैं ये ज़रूर जानना चाहूँगा कि लेखक का तीनों किरदारों के नाम ‘नि’ से शुरू करना केवल संयोग था या इसका कुछ विशेष कारण था। अगर लेखकीय में वह यह बात साफ कर देते तो बेहतर होता।
अगर रोचक पारलौकिक कथाएँ पसंद हैं तो ये भी आपको पसंद आएँगी। मुझे संग्रह पसंद आया।
पुस्तक लिंक: अमेज़न | भाषा: अंग्रेजी
