‘विराट पर्व’ लेखक देवेंद्र पांडेय का नवीनतम उपन्यास है। यह एक रोमांचकथा है जिसके केंद्र में विराजपुर नामक शहर में होती वीभत्स हत्याएँ हैं। यह हत्याएँ क्यों हो रही हैं ये तो आप पुस्तक पढ़ने के पश्चात ही जान पाएँगे। फिलहाल, एक बुक जर्नल पर पढ़ें पुस्तक का यह शुरुआती अंश:
3 दिसंबर, रात के ढाई बज रहे थे। तेज म्यूजिक से वातावरण गूँज रहा था। खुली छत की शानदार जिप्सी खड़ी थी। दोनों हेडलाइट्स की चकाचौंध रोशनी, अँधेरे के सीने को फाड़ती सी प्रतीत हो रही थी।
जिप्सी के बोनट पर महंगी शराब की बोतल साथ लिए हुए एक तगड़ा व्यक्ति कर्कश और अश्लील भोजपुरी गाने पर झूम रहा था। उम्र लगभग तीस साल, नुकीली मूँछें, हल्की ट्रिम की हुई दाढ़ी। कंधों तक फैले हल्के घुँघराले बाल, देह यष्टि मजबूत। बाँहों की मांसपेशियाँ कसी हुई और उस पर बने हुए अजीब से टैटू।
जिप्सी के सामने तीन युवक और थे जो शराब पीते हुए अजीबो-गरीब डांस कर रहे थे।
“बंटू भैया! आज तो आप अकेले-अकेले मजे ले लिए, हमारा इंतजाम कब होगा?” एक युवक ने कहा।
“अबे मोहसिन! मोना, बंटू भैया का माल है। उस पर कहाँ लार टपका रहा है? भैया तुम्हें ही टपका देंगे।”
“रहने दे अजय! मोना को पाने के लिए मोहसिन जान देने के लिए भी तैयार है।” हिम्मत ने कहा। वे सभी बंटू के ख़ास दोस्त थे।
बंटू प्रताप अपनी दबंगई और उत्पाती स्वभाव के कारण आस-पास के अनेक कस्बों में कुख्यात था। बड़े भाई वीर प्रताप विराजपुर के पूर्व बाहुबली रह चुके थे। जब से विपक्षी जीते थे तब से उनके हाल भी कुछ ठीक नहीं थे, लेकिन बंटू ने कभी किसी की परवाह नहीं की थी। उसकी शराब और लड़कियों के प्रति दीवानगी से हर कोई वाकिफ था।
आजकल भोजपुरी एक्ट्रेस मोना मुखर्जी के साथ उसका चक्कर चल रहा था। थोड़ी देर पहले, वह मोना की फिल्म की सक्सेस पार्टी से ही लौट रहा था। इंडस्ट्री में यह चर्चा भी थी कि लगातार फ्लॉप रहने के बावजूद मोना को काम मिलने में कहीं ना कहीं बंटू की पहुँच का ही हाथ था। आखिरकार उसकी पिछली फिल्म औसत सफल हुई, मोना भी उसकी अहसानमंद थी।
“बंटू भैया, आप बड़े लोगों की पार्टी में जाकर महंगी शराब पी रहे हैं, मेम लोगों की कमर में बाहें डालकर चिपक-चिपक कर नाच रहे हैं। हिरोइन मोना के हाथों से जाम पी रहे हैं, और हमें बाहर ही निपटा रहें है। यह तो गलत बात है।” मोहसिन ने कहा।
“अबे! स्टैंडर्ड का फर्क है, वह पार्टी क्लास के लिए होती है। क्लास समझते हो? जो साला तुममें नहीं है। इन फिल्मी पार्टियों में ऐसे ही हर किसी को नहीं ले जा सकते।” बंटू ने हँसकर कहा।
“वाह! बंटू, अब हम साले क्लास लेस हो गये? कब से?” अजय ने कहा, उसे बंटू की यह बात थोड़ी बुरी लगी थी, लेकिन वह यह भी जानता था कि बंटू ने कभी किसी के बुरा लगने या ना लगने की परवाह नहीं की थी।
“अबे! तुम लोगो के लिए अलग से बंदोबस्त किया तो था? इतना टेंशन मत लिया करो सालों।” कहते हुए बंटू बोनट से नीचे कूद गया और शराब की बोतल खाली करके सड़क पर ही फोड़ कर अँधेरे कोने की तरफ बढ़ गया।
“कहाँ जा रहे हो बंटू?”
“इतना पिए जा रहे हैं, निकालना भी तो पड़ेगा।” बंटू ने कहा।
“तो इसमें इतनी दूर जाने की क्या जरूरत है? यहीं निपट लो। हमसे भला क्या छिपा हुआ है?” मोहसिन हँसा।
“तुम साले नजर लगा दोगे, वैसे भी भीतर ही भीतर भरे हुए हो काफी। मोना को देख कर वैसे ही छाती पर साँप लोटता है तुम लोगो के।” बंटू ने हँसकर कहा और सड़क के किनारे की तरफ मौजूद आम के बगीचे की तरफ चला गया।
“देखना कोई सियार हथियार ना दबोच कर ना ले जाए।” अजय ने हँसकर कहा।
“इसके लिए सियार का नहीं, शेर का जिगरा चाहिए।” कहते हुए बंटू पेड़ों के पीछे जाकर गायब हो गया। उसके जाने के बाद म्यूजिक और तेज हो गया और उसके साथी अश्लील लिरिक्स गाते हुए अपनी तरफ कुछ और भद्दी जुगलबंदी भी जोड़ रहे थे।
बंटू उनसे कुछ ही दूरी पर जाकर खड़ा हो गया, कनखियों से अपने साथियों की तरफ देखा और हँसते हुए उनके लिए एक भद्दी सी गाली निकाली। वह फारिग होने में जुट गया, इसी समय किसी लड़की की आवाज सुनकर उसके कान खड़े हो गए।
“नहीं, यहाँ नहीं। कोई देख लेगा। कहीं और चलते हैं ना।”
“अरे इस समय यहाँ भला कौन आयेगा?”
“नहीं तुम समझ नहीं रहे हो, मैं ऐसे खुले में यह सब करने के लिए कम्फर्टेबल नहीं हूँ। रात भी काफी हो चुकी है, मुझे घर भी जाना है।”
लड़की ने इठलाते हुए कहा। यह सुनकर बंटू के होंठों पर मुस्कुराहट दौड़ गयी। वह दबे पाँव झाड़ियों की तरफ बढ़ा।
“तुम्हारी यही आदत खराब है, तुम मानते ही नहीं हो। कभी भी जगह नहीं देखते।” लड़की ने शिकायती लहजे में कहा।
“आउटडोर का अपना ही अलग एडवेंचर है सोनी। एक बार कर के देखो फिर ये मोमेंट जिंदगी भर याद रहेगा।” लड़का उसे अपने झाँसे में लेने की पूरी कोशिश कर रहा था। उनकी बातें सुनकर बंटू रोमांचित हो रहा था। वह बिना आहट के झाड़ियों के भीतर पहुँचा, लेकिन उम्मीद के विपरीत उसे वहाँ कोई नजर नहीं आया।
“यहाँ तो कोई भी नहीं है। फिर आवाज कहाँ से आ रही है?” बंटू बुदबुदाया और चारों तरफ उम्मीद में नजरें दौड़ाने लगा। बाईं तरफ किसी साए की मौजूदगी से वह चिहुँक गया। जब तक कुछ समझ पाता तब तक एक जबरदस्त प्रहार उसकी कनपटी पर हुआ और वह एक झटके से जमीन पर मुँह के बल गिर पड़ा। उसका सारा नशा हवा हो गया।
अचानक हुए इस तगड़े प्रहार से उसकी आँखों के आगे अँधेरा छा गया। उसके सामने एक तगड़ा व्यक्ति खड़ा था, जिसने काले रंग की हूडी पहनी हुई थी, बंटू ने उसकी तरफ देखा। उसके मस्तिष्क में खतरे की घंटी बज चुकी थी।
“कौन है बे तू? जानता भी है किससे पंगा ले रहा है?” बंटू ने अपनी ताकत बटोरते हुए कहा, उस व्यक्ति ने कोई जल्दबाजी नहीं दिखाई। वह शांति से उसे खड़े होते देख रहा था। उसके हाथ में हथौड़ा था।
बंटू ने अचानक ही अपनी कमर में खोंसी हुई पिस्तौल बाहर निकाली, लेकिन प्रतिद्वंद्वी उससे अधिक फुर्तीला निकला। उसका हथौड़ा जबरदस्त गति से चला और बंटू के कंधे से टकराया। हड्डी टूटने की आवाज सन्नाटे में साफ़ सुनाई दी। बंटू की पिस्तौल गिर गयी, वह कंधा पकड़कर चीखा लेकिन उस व्यक्ति का हाथ उसके खुले मुंह पर ढक्कन की तरह कस गया। चीख भीतर ही घुटी रह गयी। बंटू की आँखें दहशत से फ़ैल गयी, वह रहस्यमय शख्स उसके चेहरे के एकदम करीब था।
उसकी हुडी हल्की सी सरक चुकी थी, उसका चेहरा देखकर बंटू का हार्ट फेल होते-होते रह गया। वह किसी राक्षस की तरह दिख रहा था, बड़ी गोल घुमावदार मूँछे, विचित्र ढंग से मुस्कुराते बड़े होंठ और बाहर निकली हुई लाल जीभ। आँखे बड़ी और उसपर उससे भी बड़ी और घनी घुमावदार भवें। माथे पर लहराते हुए घुँघराले बाल। वह छवि देखकर बंटू बुरी तरह घबराया लेकिन फिर उसे अहसास हुआ कि यह उसका असली चेहरा नहीं है। असली चेहरा इस मुखौटे के पीछे है, हाँ वह मुखौटा ही तो था।
“अपनी मृत्यु का मुख निहारने वाला तू पहला व्यक्ति होगा।” मुखौटे के पीछे एक सर्द और खरखराती आवाज सुनाई दी। इस समय बंटू ने एकमात्र कार्यरत हाथ से मुँह पर से उसका पंजा हटाया और अपने सिर से ही उस मुखौटे धारी पर प्रहार कर दिया। हमलावर अचानक हुए इस प्रहार से पीछे जा गिरा। बंटू चीखा, लेकिन उसके साथी तेज म्यूजिक पर झूम रहे थे। उसकी चीख बेकार गयी। उसने हमलावर की तरफ नफरत से देखा और तेजी से आगे बढकर एक शक्तिशाली ठोकर उसकी छाती में जड़ दिया। हमलावर उसके इस वार से लड़खड़ाया। बंटू ने बिना देर किये एक शक्तिशाली घूँसा उसके पेट में जड़ दिया।
“गलत पंगा ले लिया बेटे! बंटू अखाड़े में तुझ जैसे चार-पाँच पहलवानों को हर हफ्ते अपने पैरों तले रौंदता है।” बंटू गुर्राया।
वह अतिशयोक्ति नहीं कर रहा था, उसके शक्तिशाली प्रहार उसके कथन की पुष्टि कर रहे थे, हमलावर भी यह बात समझ चुका था।
हमलावर ज़मीन पर फिरकी की तरह घूमा और उसकी लम्बी टाँगों में फँस कर बंटू धरती पर जा गिरा, उसके गिरते ही हमलावर ने एक ज़बरदस्त ठोकर उसके चेहरे पर जड़ दिया। बंटू दर्द और गुस्से से बिफर उठा और हमलावर को हैरान करते हुए उठ खड़ा हुआ। हमलावर का हथौड़ा फिर से प्रहार के लिए घूमा लेकिन आश्चर्यजनक रूप से बंटू ने हथौड़े को एक झटके से पकड़ लिया, हमलावर कुछ समझ पाता इससे पहले उसने एक ठोकर उसके सीने में जड़ दी, लेकिन हथौड़े पर से हमलावर की पकड़ बिलकुल भी ढीली नहीं हुई, वह वार से झुक जरूर गया, उसके झुकते ही बंटू का घुटना उसके चेहरे से टकराने के लिए उपर उठा लेकिन हमलावर ने उसकी जाँघ पर पूरी शक्ति से घूँसा जड़ दिया, इस प्रहार से बंटू लड़खड़ाकर पीछे हटा।
इसी के साथ हमलावर ने पूरी बेरहमी के साथ हथौड़े का एक भयंकर प्रहार उसके घुटने पर किया। बंटू हलक फाड़कर चीखा और घुटना पकड़ जमीन पर गिर पड़ा। मुखौटा उसके सामने मौत बनकर लहरा रहा था। अब बंटू के चेहरे पर मौत का खौफ नजर आने लगा था। हमलावर आगे बढ़ा और उसने निर्दयता के साथ पूरी शक्ति से हथौड़ा उसके दूसरे घुटने पर पटक दिया। हड्डियां टूटने की आवाज बंटू की चीखों के बीच गुम हो गयी। उसने एक बार फिर हमलावर की तरफ देखा और घिसटते हुए पीछे हटने का प्रयास करने लगा। हमलावर ने कोई जल्दबाजी नहीं दिखाई।
“कौन है तू? आखिर मुझसे क्या दुश्मनी है तेरी?” बंटू ने भद्दी से गाली बकते हुए पूछा।
उत्तर में उसके सीने पर भारी भरकम हथौड़ा टकराया। उसके मुँह से चीख के स्थान पर खून की धार निकली। हमलावर रुका नहीं उसने ताबड़तोड़ उसके शरीर के हर स्थान पर हथौड़े से प्रहार करने शुरू कर दिए। अनगिनत प्रहार, हड्डियाँ टूटने की आवाजें इस सन्नाटे को भंग कर रही थी। बंटू का चीखना बंद हो चुका था। लेकिन मुखौटा पहने शख्स की दरिंदगी में कोई कमी नहीं आयी, उसके प्रहार जारी थे। मुखौटा बंटू के खून के छींटों से लाल हो चुका था।
बंटू को मारने वाला मुखौटाधारी कौन था? बंटू से उसकी क्या दुश्मनी थी? विराजपुर में हुए इस क़त्ल का क्या परिणाम हुआ?
पुस्तक विवरण

पूर्व बाहुबली के भाई की वीभत्स हत्या से विराजपुर दहल उठा। हत्यारे की तलाश के लिए बाहुबली ने पुलिस प्रशासन को तेरह दिनों का अल्टीमेटम दिया है। उसके बाद विराजपुर की सड़कों पर खून बहना तय है, शहर खूनी गैंगवार की आहट महसूस कर रहा है। इंस्पेक्टर श्रीवास्तव पर हत्यारे तक पहुँचने का दबाव है।
लेकिन यह पहली लाश नहीं थी, हर दिन वीभत्स और विकृत लाशें बरामद होने लगीं। रहस्य गहराता जा रहा है।
एक अधूरी कहानी अब खुद अपना अंत लिख रही थी।
वह कहानी जिसने वर्षों पहले अनगिनत मनुष्यों के शवों से भूमि को पाटकर रख दिया था, वही कहानी अब विराजपुर की धरती पर दोहराई जा रही है।
प्रकाशक: बुकेमिस्ट | पुस्तक लिंक: अमेज़न
(नोट: देवेंद्र पांडेय द्वारा लिखी विराट पर्व का यह अंश प्रकाशक की अनुमति से यहाँ लगाया जा रहा है।)
