योगेश मित्तल अपने समय में ट्रेड नामों के लिए खूब लेखन किया है। अपने इस पेशे के चलते उनका उस समय के प्रकाशकों और लेखकों से गहरा सम्बन्ध रहा है। अपराध कथा लेखक सुरेन्द्र मोहन पाठक के साथ की भी उनकी कई यादें हैं। अपने इस लेख में वह सुरेन्द्र मोहन पाठक की एक खूबी के विषय में पाठकों को बता रहे हैं। आप भी पढ़िए:
अगर आप चुटकुले-जोक्स पसंद करते हैं और आपने सुरेन्द्र मोहन पाठक का नाम नहीं सुना तो आप चुटकुला प्रेमी हो ही नहीं सकते।
चुटकुलों के मामले में बड़े-बड़े चुटकुलेबाज़ भी हमेशा सुरेन्द्र मोहन पाठक से पीछे रहे। यूँ तो उपन्यासकार सुरेन्द्र मोहन पाठक को सुनील सीरीज़, विमल सीरीज़ और सुधीर कोहली सीरीज़ के जासूसी उपन्यासों और थ्रिलर के लिए जाना जाता है, पर उन्होंने बहुत सारी जोक बुकें भी लिखी हैं।

जोक्स बुक लिखना कोई बड़ी बात नहीं है। हिंदी अंग्रेजी जोक्सबुक से टीपकर या ट्राँसलेट कर आप अपनी दस जोक्स बुक तैयार कर सकते हैं। पर आप सुरेन्द्र मोहन पाठक नहीं बन सकते। सुरेन्द्र मोहन पाठक का मुकाबला ही नहीं कर सकते।
सुरेन्द्र मोहन पाठक को आप जोक्स या चुटकुलों का चलता-फिरता इनसाइक्लोपीडिया कह सकते हैं।
चुटकुले सुनाने वाले आपके जीवन में बहुत आये होंगे। पर सुरेन्द्र मोहन पाठक जैसा हर किसी के जीवन में नहीं आता। आप कोई भी….कैसी भी बात कहिये….उस बात पर फबता…मैच करता चुटकुला तत्काल सुनाना सुरेन्द्र मोहन पाठक के अलावा किसी और के बस की बात नहीं।
कई बार मैं सोच में पड़ जाता था कि एक दिन में सौ से ज्यादा चुटकुले-जोक सुनाकर भी इस तरह कौन तैयार रह सकता है कि मौक़ा पड़ने पर और नए जोक सुना दे कि एक भी जोक रिपीट न हो। गनीमत है पाठक साहब ने किसी लाफ्टर चैलेंज में हिस्सा नहीं लिया, वरना आपलोग कपिल शर्मा और सुनील ग्रोवर, राजू श्रीवास्तव को नहीं — सिर्फ और सिर्फ सुरेन्द्र मोहन पाठक को याद करते।
आखिर में एक बात बता दूँ—

मैं हमेशा सुरेन्द्र मोहन पाठक के BEST श्रोताओं में से एक रहा हूँ। पाठक साहब के हर चुटकुले पर उसकी श्रेष्ठता के हिसाब से कहकहा लगाकर मैंने सदैव पाठक साहब के चुटकुलों का भरपूर मज़ा लिया है।
किसी भी शादी के फंक्शन या अन्य पार्टी में मुझ पर नज़र पड़ते ही पाठक साहब मुझे एक तरफ से लपेटकर दूसरे कंधे पर हाथ ले जाते और फिर हम भीड़ से अलग एक तरफ हो जाते, ऐसे में पाठक साहब पहला चुटकुला बड़े आराम से धीरे-धीरे सुनाते, फिर एक से दूसरा, तीसरा और फिर मैं ठहाके लगाते-लगाते गिनती ही भूल जाता।
कनाट प्लेस के किदवई भवन में जब टेलीफोन एक्सचेंज का कोई काम चल रहा था, तब सुरेन्द्र मोहन पाठक ही वहाँ सुपरवाइज़र थे और तब मैं बंगला साहिब गुरुद्वारे के ठीक सामने टॉप फ्लोर के एक फ्लैट में रहता था, तब पाठक साहब रोज मुझे नीचे से ही आवाज़ लगाते। उनकी आवाज़ बहुत तेज़ नहीं होती थी तो शुरू के दिनों में कभी सुन नहीं पाया तो वह सीढ़ियों की राह टॉप फ्लोर पर भी आये और नाराज़ होकर बोले, “भले आदमी, कोई आवाज़ दे रहा हो तो सुन भी लिया करो, तुम्हें पता है — मैं हाइपरटेंशन का मरीज़ हूँ! इतनी सारी सीढ़ियाँ चढ़ना मेरे बस की बात नहीं है!”
बाद में मैं पाठक साहब के आने के समय पर चौकन्ना रहने लगा!
पाठक साहब मुझे अपने साथ अपने ऑफिस ले जाते और उनके रूम या केबिन में जब तक उनके उठने या चलने का मूड नहीं होता, मैं साथ ही रहता।
हमारे बीच काफी या चाय या कुछ और खाने-पीने का दौर भी चलता था।
कभी-कभी हमारे बीच कहानियों पर चर्चा होती तो कभी-कभी पाठक साहब बिना रुके ढेर सारे चुटकुले सुनाते। उनका चुटकुले सुनाने का अंदाज भी निराला था। दूसरों को हँसाने के साथ-साथ वह खुद भी हँसना कभी नहीं भूलते थे।
पर उनके ठहाके अक्सर मेरे ठहाकों की आवाज से दब जाया करते थे।
यदि आप पाठक साहब से कभी न कभी मिले हैं और आपने उनके श्रीमुख से चुटकुलों का आनंद नहीं उठाया तो निःसंदेह आप उनसे मिलकर भी उनकी एक बहुत बड़ी खूबी का लुत्फ़ उठाने से वंचित रह गए।

रसीली दुनिया लेखक सुरेन्द्र मोहन पाठक की नवीनतम जोकबुक है जो साहित्य विमर्श प्रकाशन द्वारा हाल ही में प्रकाशित की गयी है। यह उनकी दूसरी जोक बुक है जिसका प्रकाशन साहित्य विमर्श प्रकाशन द्वारा किया गया है। इससे पूर्व उनकी जोक बुक मतवाली दुनिया का प्रकाशन भी साहित्य विमर्श प्रकाशन द्वारा किया जा चुका है।
रसीली दुनिया का लिंक: साहित्य विमर्श प्रकाशन
मतवाली दुनिया का लिंक: अमेज़न | साहित्य विमर्श प्रकाशन
सुरेन्द्र मोहन पाठक के कुछ अन्य जोक बुक्स अमेज़न पर निम्न लिंक पर खरीदे जा सकते हैं:
