पुस्तक अंश: बाज़ बसेरा: बिना हत्थे की खुकरी – संजय अग्निहोत्री

पुस्तक अंश: बाज़ बसेरा: बिना हत्थे की खुकरी - संजय अग्निहोत्री

‘बाज़ बसेरा: बिना हत्थे की खुकरी’ लेखक संजय अग्निहोत्री द्वारा लिखित जतिन जागीरदार शृंखला का दूसरा उपन्यास है। उपन्यास साहित्य विमर्श प्रकाशन द्वारा प्रकाशित किया गया है। एक बुक जर्नल पर पढ़ें इस उपन्यास का एक अध्याय ‘बिना हत्थे की खुकरी’


बिना हत्थे की खुकरी

पुलिस को ‘बाज़ बसेरा’ में हुए हर हादसे में शयन कक्ष के पलंग के साइड टेबल पर रखे गिलास में एक अनजाना गंधहीन स्वादहीन तरल रासायनिक योगिक पदार्थ (कैमिकल कम्पाउंड) मिला था। इस पदार्थ में मानव मस्तिष्क में घबराहट घुटन और पैनिक के लक्षण पैदा करने वाले रसायन मौजूद थे। लेकिन आश्चर्यजनक रूप से पोस्टमार्टम में मृतक के शरीर में इस रासायनिक पदार्थ के अवशेष नहीं मिले। इसीलिए फोरेंसिक और पोस्टमार्टम टीम ने इसे अतिरिक्त जानकारी से अधिक तवज्जो नहीं दी थी। यानी कि इसे मृत्यु के कारण में शामिल नहीं किया था। एस पी धीरज शर्मा को चौंकाने के लिए ये जानकारी काफी थी। क्योंकि हर मृतक के पानी के गिलास में इसके पाए जाने का कोई न कोई तो कारण होना चाहिए था। उन्होंने इंटेलिजेंस ब्यूरो से अनुरोध कर डिटेक्टिव विवेक त्रिवेदी और हेलन को तलब किया और स्वयं उनसे मिलने जा पहुँचे थे। दरअसल पिछले केस के दौरान हेलन की कार्य कुशलता से प्रभावित एस पी धीरज शर्मा ने उसके प्रति विवेक के बढ़ते लगाव को न सिर्फ़ महसूस किया था बल्कि उसे अनुकूल वातावरण प्रदान कर प्रेम के रास्ते विवाह तक पहुँचाया भी था। इस तिकड़म के लिए हेलन को भारत की नागरिकता तथा इंटेलिजेंस ब्यूरो में उसके पद को स्थायी करवाना विशेष रूप से उल्लेखनीय है। उनके इस अहसान के लिए बेहद शुक्रगुजार विवेक और हेलन के सम्बन्ध एस पी धीरज शर्मा से इतने प्रगाढ़ हो गए थे कि वो कभी भी एक दूसरे के घर आने जाने लगे थे। चाय नाश्ते के बाद धीरज ने ‘बाज़ बसेरा’ में घट रही वारदातों का ज़िक्र छेड़ते हुए अपने आने का प्रयोजन बताया।

“पुलिस ने भारतीय व विदेशी विश्वविद्यालयों से इस केमिकल कम्पाउंड (रासायनिक यौगिक) के सम्बन्ध में पूछताछ की थी परन्तु प्रत्येक विश्वविद्यालय ने ऐसे किसी कम्पाउंड के अस्तित्व से इनकार कर दिया था।” धीरज ने चिन्ता व्यक्त की।

“यानी कि ये कम्पाउंड पुलिस का ध्यान भटकाने के लिहाज से रखा गया था।” हेलन ने कहा।

“सम्भावना तो यही लगती है।” धीरज ने सहमति जतायी।

“यानी ये सब हत्याएँ हैं?” विवेक चौंका।

“हो भी सकती हैं। इस सम्भावना से इनकार नहीं किया जा सकता।” धीरज ने पुनः सहमति व्यक्त की।

“इस हिसाब से अगर पहली तीन वारदातों का विश्लेषण करें तो पहली, दूसरी व चौथी वारदात में तो आपका अनुमान बिलकुल सही बैठता दिखता है। सुमेर दत्त वाली वारदात में मेरी दृश्य परिकल्पना के अनुसार हत्यारा शयन कक्ष में घुसा। पुलिस का ध्यान भटकाने के लिए सुमेर के पानी के गिलास में अपना विचित्र केमिकल कम्पाउंड मिलाया। फिर दारू के गिलास में नीन्द की गोलियाँ मिलायीं लेकिन गोलियों की मात्रा के सम्बन्ध में उसका अंदाजा सही न हो पाने के कारण उसे तीन बार में सफ़लता मिली। दूसरी वारदात में भी लगभग ऐसी ही कहानी बनती है।

करन सिंह वाली वारदात भी आपकी सोच से मेल खाती है। फ़र्क बस इतना है कि वो नीन्द की गोली नहीं खाता इसलिए हत्यारे ने उसके पानी के गिलास में अपना विचित्र रासायनिक यौगिक मिलाने के बाद उसे जबरदस्ती फाँसी पर लटका दिया।

अब आते हैं तीसरी वारदात पर। साध्या तो शयन कक्ष में थी ही नहीं बल्कि वो तो छत पर थी और मुंडेर पर बाहर पाँव लटका के बैठी थी। ऊपर से उसके साथ में दो मित्र भी थे? फिर हत्यारे को कैसे सफलता मिली?” विवेक ने अपना संशय बताया।

“रात के अँधेरे में ‘बाज़ बसेरा’ की छत पर बने मंडप के नीचे और भी घुप्प अँधेरा रहता होगा। ऐसे में यदि कोई मंडप के किसी खम्भे के पीछे खड़ा हो तो किसी को क्या पता चलेगा। साथ ही जब नौकरानी ने नीचे से आवाज़ दी होगी तो सबका ध्यान उस आवाज़ की तरफ़ होगा। उस समय खम्भे के पीछे से निकल कर खिड़की पर लापरवाही से बैठी साध्या को धक्का देकर वापस खम्भे के पीछे जाने में कितना वक़्त लगता है? फिर जब सब लोग हड़बड़ा के साध्या की हालत जानने के लिए नीचे भागे होंगे तो मैदान साफ़ देख वो आराम से चला गया होगा।”

“चला गया होगा ये तो समझ में आता है लेकिन इन सारी वारदातों में वो इमारत में घुसता कैसे है ये समझ में नहीं आया?” विवेक ने फिर टोका।

“सही कह रहे हो। बग़ैर इस जानकारी के न सिर्फ़ हमारी ये सारी परिकल्पनाएँ सारी अटकलें अधूरी हैं, बल्कि भविष्य की सम्भावित वारदातों की रोकथाम भी सम्भव नहीं। यानी कि तहकीकात अधूरी है और गहन जाँच पड़ताल की जरूरत है। मुझे पूरा विश्वास है कि इसे सिर्फ़ आप दोनों ही अंजाम तक पहुँचा सकते हो। उसके लिए ये सही मौका भी है क्योंकि ‘बाज़ बसेरा’ एक बार फिर बिकाऊ है। इस रविवार को उसका ओपन हाउस यानी नुमाइश का दिन है। मकान को बिना पुलिस की दिलचस्पी उजागर किये विस्तार से देखने का इससे अच्छा मौका नहीं मिलने वाला। इसीलिए मैंने आपके विभाग से अग्रिम अनुमति भी ले ली है। सो गुड लक!” कहकर धीरज शर्मा जाने के लिए उठ खड़े हुए।

दोनों से हाथ मिलाया और वहाँ से रवाना हो गए।

“मेरी समझ में नहीं आया कि मैं आई. बी. के लिए काम करता हूँ या एस. पी. साहब के लिए।” धीरज के जाने के बाद हेलन की तरफ़ बेबसी से देखते हुए विवेक ने एक लम्बी साँस ली। जवाब में हेलन ने ज़ोर का ठहाका लगाया था।


‘बाज़ बसेरा’ एक बार फिर बिकाऊ था। इस के तमाम ओपन हाउस यानी मकान की नुमाइश के दिन किए जा चुके थे। इतने कि अब रियल एस्टेट एजेंसी सिर्फ़ मृतक सम्पत्ति ट्रस्ट (डीसीज़्ड एस्टेट) की तसल्ली के लिए यानी बड़े बेमन से परम्परा निभाने के अन्दाज में इसका ओपन हाउस करने लगा था। आज फिर वैसा ही ओपन हाउस था। एजेंसी का नुमाइंदा (एजेंट) बुरा सा मुँह बनाए बैठा ऊँघ रहा था।

सम्भावित ख़रीदार के रूप में श्री व श्रीमती डॉ. पराग त्रिपाठी यानी डिटेक्टिव विवेक त्रिवेदी और हेलन, नज़र आ रहे थे। हेलन ने बड़े करीने से साड़ी पहन रखी थी। माथे पर बिन्दी और माँग में सिन्दूर भी नज़र आ रहा था। छुट्टी का दिन यानी रविवार होने के बावजूद इक्का-दुक्का लोग ही दिख रहे थे। विवेक और हेलन ने पहले बाहर से ही जायजा लिया। यह बंगले और मेनशन की खूबसूरती अपने में समेटे पुरानी आलीशान हवेली जैसे अन्दाज़ में बनी इमारत थी जिसके आगे और पीछे दोनों ओर बेहद साफ़ सुथरी सड़कें थीं। विवेक जानता था कि ये दोनों सड़कें बाजार, हस्पताल, बस स्टैंड, रेलवे व पुलिस स्टेशन के साथ‑साथ हवाई अड्डे से भी सीधी सड़कों से जुड़ी है। आसपास के अधिकांश मकान नए और खबसूरत थे।

विवेक और हेलन के अलावा बस इक्का-दुक्का जिज्ञासु ही वहाँ नज़र आ रहे थे। रियल एस्टेट एजेंसी के नुमाइंदे को ऊँघता छोड़ विवेक और हेलन मकान के मुख्य द्वार से अन्दर घुसे। पुराने जमाने के मकानों जैसी खूबसूरत राहदारी से होते हुए वो आगे बढ़े। दिखने में लापरवाह नवदम्पति नज़र आ रहे विवेक और हेलन असलियत में बेहद चौकन्ने थे और इस मकान में हुई मौतों से सम्बन्धित किसी सूत्र की तलाश में हर गलियारे हर कमरे और दालानों का बड़ी बारीकी से निरीक्षण करते हुए आगे बढ़ रहे थे।

इमारत पुरानी जरूर थी लेकिन अन्दर आधुनिक उपकरणों और रख रखाव में कोई कमी नहीं थी। बिजली की आधुनिक ढंग की वायरिंग, सीसीटीवी कैमरे, एयर कंडीशनिंग, रसोई में गैस, आधुनिक फ़र्नीचर, रसोई सहित हर कमरे की दीवार पर टीवी पैनल वगैरह सभी कुछ था। बहाने‑बहाने से हर दीवार हर कोने को ठोकते बजाते पूरी इमारत छानते जब विवेक प्रधान शयन कक्ष में पहुँचा तो लगभग पस्त और निराश हो चला था क्योंकि अब तक उसे या हेलन को कहीं कोई सूत्र हाथ नहीं लगा था। वो तो ये भी सोचने लगा था कि शायद इस मकान में होने वाली मौतें प्राकृतिक हों और उनका जल्दी‑जल्दी होना महज एक इत्तिफ़ाक़ हो। अब तक जो इक्का‑दुक्का लोग मकान देखने आए थे वो भी अब दिखने बन्द हो गए थे।

‘शायद ऊब के चले गए होंगे। वैसे भी वो ख़रीदार कम और तमाशबीन ज़ियादा लग रहे थे।’ विवेक ने सोचा। हेलन को वो रसोई का मुआयना करते छोड़ आया था। उसने एक सरसरी तौर पर कमरे में नज़र दौड़ाई। ये कमरा बाकी कमरों से अधिक भव्य था। कमरे में पूर्व की दीवार से सटा शानदार नक्काशीदार पलंग था जिसके दोनों ओर साइड टेबल थीं। सामने की दीवार पर भव्य टीवी पैनल लगा था। तभी पलंग की भव्यता में खोये विवेक की नज़र बायीं साइड टेबल के बाद दीवार में बनी विशाल कपड़ों की अलमारी पर पड़ी। दरअसल उस अलमारी के नक्काशीदार दरवाजे को देख उसे अजीब सी बेचैनी का अहसास हुआ था। दिमाग पर जोर डालने पर उसे बेचैनी का कारण जो समझ आया वो ये कि दरवाज़ा जाना पहचाना सा था और शायद किसी ऐसी याद से जुड़ा था जो बेचैन कर देने वाली थी। लेकिन न तो उसे वो जगह याद आ रही थी न ही वो घटना। वो अलमारी के नज़दीक गया और बड़ी बारीकी से उस दरवाज़े की नक्काशी का निरीक्षण करने लगा। दरवाजे पर उकेरी हुई नक्काशी की एक-एक लाइन, अब बेहद जानी पहचानी लग रही थी लेकिन उसे याद नहीं आ रहा था कि उसने वो कहाँ देखी थीं। यहाँ तक की दरवाजे के हैंडल और उन पर की हुई नक्काशी भी उसके लिए बेहद जानी पहचानी थी। विवेक दरवाजे के हैंडलों पर हाथ फेरने लगा। स्पर्श भी बड़ा जाना पहचान लगा। पर अफ़सोस उसे कुछ भी याद नहीं आया। विवेक की बेचैनी बढ़ती जा रही थी। अपनी याद्दाश्त पर छाये इस कोहरे से परेशान और उतावले विवेक ने दोनों हाथों से हैंडलों को थामा और अपनी तरफ़ खींच कर दरवाजा खोल दिया। अन्दर से ये अलमारी आधुनिक जमाने की वॉक इन रोब जितनी बड़ी थी। विवेक ने पीछे घूम के देखा। रसोई का मुआयना कर हेलन अभी-अभी इस कमरे के दरवाज़े पर पहुँची थी। दोनों की नजरें मिलीं। विवेक ने कुछ इशारा किया। उसका आशय समझ हेलन ने कमरे से बाहर देखा। आस-पास किसी को न पाकर उसने विवेक को मैदान साफ़ होने का इशारा किया। विवेक अलमारी में घुस गया और सारी दीवारें ठोक बजा कर देखने लगा। सारी दीवारें ठोस निकलीं। कहीं कोई झिरी कोई दरवाज़ा होने का आभास नहीं मिला। कपड़े टाँगने वाली रॉड भी हिला के देखी वो भी टस से मस नहीं हुई। बैठकर फ़र्श ठोक कर देखा वो भी ठोस निकला। फ़र्श से उठते समय उसकी नज़र तह किये कपड़े रखने के मोटे तख़्ते (शेल्फ़) की निचली सतह पर पड़ी। उस पर नक्काशी से अजीब सी खुकरी का चित्र उकेरा गया था। अजीब इसलिए क्योंकि इस खुकरी की बेंट नहीं थी। उसके बजाय खुकरी का पिछला हिस्सा यानी हत्था अलीगढ़ी ताले की कलात्मक चाभी जैसी शक्ल का था। इसे देखते ही विवेक ऐसे चौंका जैसे उसने भूत देख लिया हो। अब वहाँ एक पल भी रुकना उसके लिए मुश्किल था। अतः वो जल्दी से बाहर निकला। हेलन अभी भी दरवाज़े पर मुस्तैदी से तैनात थी। विवेक को अलमारी से बाहर आते देख उसने राहत की साँस ली। परन्तु उसके चेहरे की हड़बड़ाहट देख इशारे से उसे आश्वस्त किया कि इस बीच इस ओर कोई नहीं आया।

विवेक ने जेब से नापने का फीता निकाला और खुकरी के चित्र सहित विधिवत अलमारी का नाप लिया। फिर दोनों खूबसूरत पल्ले बंद कर बाहर से भी नाप लिया। विवेक के चेहरे की गम्भीरता के पीछे छिपी हवाइयाँ हेलन से छिपी न थीं। वो समझ रही थी कि विवेक को कुछ न कुछ तो नया पता चला है। इसलिए जब उसने हेलन से वापस चलने को कहा तो वो तुरन्त तैयार हो गयी। बाहर आते समय उनकी मुलाकात एजेंट से हो गयी जो कि ओपन हाउस का समय समाप्त हो जाने के कारण मकान बंद करने से पहले ये देखने अन्दर आ रहा था कि कहीं अभी भी कोई सम्भावित ख़रीदार मकान में तो नहीं है। विवेक ने आगे बढ़कर हाथ मिलाते हुए डॉ. पराग त्रिपाठी के रूप में स्वयं का तथा पत्नी के रूप में हेलन का न केवल परिचय दिया बल्कि बाकायदे ओपन हाउस रजिस्टर में एंट्री भी करा कर वहाँ से विदा ली। अब हेलन को पूरा भरोसा हो गया कि विवेक को कुछ न कुछ सूत्र तो जरूर मिला है और वो दोबारा इस व्यक्ति से मिलने के लिए जान पहचान बढ़ा रहा है।

(नोट: पुस्तक का यह अंश यहाँ प्रकाशन की अनुमति के साथ प्रकाशित किया जा रहा है।)


पुस्तक विवरण:

पुस्तक अंश: बाज़ बसेरा: बिना हत्थे की खुकरी - संजय अग्निहोत्री

बाज़ बसेरा अपने इतिहास के चलते बदनाम हो चला था। वहाँ अब तक जो भी रहा था त्रासदी उसके जीवन का हिस्सा बनी थी। वह खुद या अपने किसी नज़दीकी को गँवा बैठा था।
क्या सच में ये त्रासदियाँ दुर्भाग्यवश हुई थीं या इनके पीछे कोई गहरा राज़ था?

पाठकों द्वारा ‘अँधेरों का संगतराश’ की शृंखला को आगे बढ़ाने के अनुरोध पर जतिन जागीरदार शृंखला में अगला उपन्यास है ये ‘बाज़ बसेरा’

पुस्तक लिंक: अमेज़न | साहित्य विमर्श प्रकाशन


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