- विनोद कुमार शुक्ल ने लेखन और जीवन का अन्तर मिटा दिया था : अशोक वाजपेयी
- विनोद जी के साथ बैठना ही एक समृद्धि थी, उनकी मौन उपस्थिति भी सिखाती थी : विभूति नारायण राय
- विनोद कुमार शुक्ल का साहित्य सचेत या अचेत रूप से प्रतिरोध का साहित्य है : संजीव कुमार
- विनोद कुमार शुक्ल विद्वत्ता से अधिक प्रज्ञा के लेखक थे : पुरुषोत्तम अग्रवाल
1 जनवरी, 2026 (गुरुवार)
नई दिल्ली। भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार और साहित्य अकादेमी पुरस्कार से सम्मानित कवि-कथाकार विनोद कुमार शुक्ल की स्मृति में गुरुवार शाम सभा का आयोजन किया गया। राजकमल प्रकाशन और रज़ा फ़ाउंडेशन के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित यह सभा इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में हुई। सभा का आरम्भ वरिष्ठ साहित्यकार अशोक वाजपेयी के वक्तव्य से हुआ। इसके बाद ‘रसचक्र’ और ‘चेमेगोइयाँ’ समूहों की ओर से विनोद कुमार शुक्ल की कविताओं की पाठ-प्रस्तुति दी गयी और वंदना राग ने उनके उपन्यास से अंशपाठ किया।
इसके बाद अपूर्वानंद, पुरुषोत्तम अग्रवाल, संजीव कुमार, भालचंद्र जोशी, प्रत्यक्षा, विभूति नारायण राय, शिराज़ हुसैन और आशुतोष भारद्वाज ने विनोद कुमार शुक्ल के लेखन, उनके साहित्यिक अवदान और उनकी भाषा की विरल सादगी पर अपने विचार साझा किए। वक्ताओं ने कहा कि विनोद कुमार शुक्ल का लेखन हिंदी साहित्य में एक ऐसी उपस्थिति है, जो बिना शोर किए जीवन, समाज और समय के जटिल प्रश्नों को अत्यंत सहज और संवेदनशील भाषा में व्यक्त करता है। उनकी भाषा देखने में सहज और साधारण लगती है लेकिन उसके भीतर गहरी अर्थवत्ता, संवेदनशीलता और प्रतिरोध की सूक्ष्म चेतना मौजूद है।
विनोद जी ने एक लगभग अप्रत्याशित समरस जीवन जिया
अपने वक्तव्य में अशोक वाजपेयी ने कहा, विनोद कुमार शुक्ल ने लगभग सत्तर वर्षों का साहित्यिक जीवन जिया जिसमें से अधिकांश समय रायपुर में बीता। वे कृषि महाविद्यालय में अध्यापन करते थे। उनका साहित्य उनके घर, परिवार और पड़ोस से ही उपजा था। जहाँ अक्सर लेखकों के जीवन और उनके साहित्य के बीच दूरी दिखाई देती है, वहीं विनोद कुमार शुक्ल के जीवन और लेखन में यह अंतर लगभग मिट गया था। साहित्य ही उनका जीवन बन गया था।
उन्होंने आगे कहा कि विनोद कुमार शुक्ल ने जीवन में कभी आरोप-प्रत्यारोपों का सहारा नहीं लिया। उन्होंने जिस राह को चुना उस पर जीवन भर स्थिर रहे। उनकी भाषा और दृष्टि देखने में सहज लगती थी, लेकिन उसके भीतर गहरी संवेदनशीलता और अर्थवत्ता थी। साहित्य उनके लिए एक प्रकार का आश्रम था जिसमें वे रहते थे और बाहरी हलचलों से लगभग अप्रभावित रहते हुए रचना करते थे। वे किसी बड़े दार्शनिक सत्य की खोज में नहीं थे बल्कि जीवन से भरे हुए, शांत और सहज लेखक थे।
मासूमियत उनके जीवन और लेखन दोनों की पहचान थी
आशुतोष भारद्वाज ने कहा, विनोद कुमार शुक्ल का साहित्य उनकी निर्मिति नहीं, वह उनके जिए हुए जीवन की प्रतिलिपि है। उम्र तक के आखिरी पड़ाव तक भी उनकी मासूमियत उतनी ही प्रामाणिक बनी रही। आधुनिक इतिहास में शायद ही किसी एक लेखक ने अपने गृहराज्य को उतना दिया हो जितना छत्तीसगढ़ को विनोद कुमार शुक्ल ने दिया है।
भालचन्द्र जोशी ने विनोद कुमार शुक्ल के साथ बिताए पलों को याद करते हुए कहा, रायपुर में विनोद जी का जन्मदिन भव्य रूप से मनाया जाता था, लेकिन वे स्वयं हमेशा उसी विस्मय और सादगी से बैठे रहते थे। जब पहली बार उनकी कविताएँ मंच पर गायी गयीं तो उन्होंने सहज भाव से पूछा—‘अच्छा, मेरी कविताएँ गायी भी जा सकती हैं?’ यही मासूमियत उनके जीवन और लेखन दोनों की पहचान थी। उनके यहाँ आकस्मिकता—चाहे प्रेम हो या मृत्यु—कभी शोर नहीं करती, रचना के शिल्प में घुली रहती है। जो जीवन में नहीं था, उसे वे कविता में जगह दे देते थे। इतनी गहरी संवेदना के साथ जिया गया यह जीवन बिना किसी प्रदर्शन के पूरा हुआ और उसी सहजता से विदा भी हो गया।
उनकी पंक्तियाँ रोशनी से भरी है
प्रत्यक्षा ने कहा, मेरा विनोद कुमार शुक्ल से मिलना किसी निजी अनुभव से नहीं, उनके शब्दों से है—एक लेखक और पाठक के बीच का वह निर्मल रिश्ता, जिसमें कोई अतिरिक्त भार नहीं होता। उन्होंने साधारण जीवन को असाधारण बना दिया और छोटी-छोटी पंक्तियों में ऐसी रोशनी भरी कि कठोरतम संसार में भी मनुष्य की गरिमा, जिजीविषा और सपने बचे रहें। आज हम किसी एक लेखक को नहीं, बल्कि उस मूल्यबोध को याद कर रहे हैं, जिसकी स्मृति उनके शब्दों से भी अधिक देर तक हमारे भीतर ठहरी रहेगी।
विस्मित करता है उनका लेखन
विभूति नारायण राय ने कहा, विनोद कुमार शुक्ल को पढ़ते हुए मुझे हमेशा यह विस्मय रहा कि कितनी साधारण, रोज़मर्रा की भाषा में वे कितना कठिन और गहन गद्य रच देते थे। उनके शब्द इतने परिचित होते थे कि हम उन्हें हल्का समझ लेते थे, लेकिन वही भाषा बड़े से बड़े सजग पाठक को भी थका देती थी। वे कम बोलते थे, लेकिन उनके साथ बैठना ही एक समृद्धि थी, जैसे उनकी मौन उपस्थिति भी कुछ सिखा रही हो। उनसे मेरी मुलाकातें कम रहीं, लेकिन पचास वर्षों का पाठक होना यही बताता है कि उनकी सादगी के भीतर ही उनकी सबसे बड़ी साहित्यिक जटिलता थी।
ममताभरी गोद की तरह हैं उनकी रचनाएँ
शिराज़ हुसैन ने कहा, जब शब्दों में कुछ कहना मुमकिन नहीं होता तब भी विनोद कुमार शुक्ल उसे अपने शब्दों में कह देते हैं, यही उनके लेखन की पहचान है। उनकी रचनाएँ उस गोद की तरह हैं, जहाँ डाँट खाकर रोता हुआ बच्चा सुकून पाता है। वे अधूरी तस्वीरों की तरह हैं—ज़िंदा, खुली हुई, लगातार अर्थ रचती हुई। आज विनोद जी हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी पंक्तियों की लहरों में वे हमारे साथ हैं, समुद्र में उतर चुके दरिया की तरह।
उन्होंने प्रतिरोध का साहित्य रचा
संजीव कुमार ने कहा, मैं विनोद कुमार शुक्ल को व्यक्तिगत रूप से नहीं जानता, लेकिन यह निश्चित रूप से जानता हूँ कि उनका साहित्य सचेत या अचेत रूप से प्रतिरोध का साहित्य है। वे किसी नारे या प्रत्यक्ष वक्तव्य के लेखक नहीं थे; उनकी ताक़त उस दृष्टि में थी, जो यथास्थिति की विचारधारा में धीरे-धीरे सेंध लगाती है। दृश्य में मौजूद अनगिनत चीज़ों में से वे वही दिखाते हैं जो हमें असहज करती है, क्योंकि हम उसे देखने के आदी नहीं हैं। यही विचित्रता, यही अनपेक्षित दृष्टि उनके लेखन को राजनीतिक बनाती है और उन्हें हमारे समय का एक अनिवार्य लेखक।
विद्वत्ता से अधिक प्रज्ञा के लेखक
पुरुषोत्तम अग्रवाल ने कहा, विनोद कुमार शुक्ल विद्वत्ता से अधिक प्रज्ञा के लेखक थे। उनकी सबसे बड़ी क्षमता यह थी कि वे जटिल को सहज और बोधगम्य बना देते थे। उनका लेखन किसी पाठक को चुनौती नहीं देता, बल्कि आमंत्रित करता है। उनके यहाँ विस्मय पात्रों में नहीं, पाठकों में पैदा होता है, क्योंकि वे भाषा के ज़रिये उस अर्थ की खिड़की खोलते हैं जिसे हम रोज़ देखते हैं पर पहचानते नहीं। छोटे-छोटे वाक्यों में गूँजता यह लेखन देर तक मन में बना रहता है और यही किसी बड़े लेखक की असली पहचान है।
