पुस्तक टिप्पणी: समाज की विसंगतियों पर प्रहार करती कहानियाँ

कथा-सप्तक - क्षमा शर्मा | सम्पादक - आकाश माथुर | टिप्पणी: सुमन बाजपेयी | प्रकाशक: शिवना प्रकाशन

चार दशक से भी अधिक समय से लेखन में सक्रिय लेखिका व पत्रकार क्षमा शर्मा की कहानियों को जहाँ एक तरफ स्त्रियों की पल-पल बदलती स्थितियों के दस्तावेज के रूप में देखा जा सकता है, वहीं वे समाज की विडंबनाओं, चाल-चलन और विसंगतियों पर करारा प्रहार करने से भी नहीं चूकतीं। उनके लेखन की विशेषता यह है कि वे अपने विचारों को थोपने की कोशिश नहीं करतीं, जिससे हर कहानी सहज प्रवाह के साथ आगे बढ़ती है और कथानक व पात्र स्वयं ही अपनी बात कहते जाते हैं।

संग्रह की पहली कहानी ‘मम्मी आ रही है’ में नौकरी की वजह से घर से दूसरे शहर आयी एक लड़की की कहानी है, जो आत्मनिर्भर बनना चाहती है और बंधी-बंधाई ज़िंदगी के उस दायरे से निकलना चाहती है, जो उसकी माँ ने बचपन से ही उसके इर्द-गिर्द बना रखा है।

‘बात अभी खत्म नहीं हुई’ कॉरपोरेट संस्कृति की बनावट, इंसानी रिश्तों की जटिलता और भावनात्मक उधेड़बुन का प्रकटीकरण है।

‘बया’ दो साल बाद मायके आयी लड़की की कशमकश का आईना है। भाई-भाभी की स्वार्थपरता से आहत होकर वह पिता और भाई से मिले बिना ही वापस लौट जाती है। माँ का न होना उसके मन को रिक्त कर जाता है। उसे लगता है कि पिता, भाई और भाभी—सबकी स्निग्धता माँ अपने साथ समेट ले गयी है। पीछे देखने के लिए अब कुछ नहीं बचा। कहानी का अंत होते-होते यह पंक्ति जीवन के मर्म का भी उद्घोष करती है।

‘कमीज़ पहन रहा है जैक द रिपर’ ऐतिहासिक संदर्भ और यथार्थ को जोड़ती कहानी है। हिंसा और बर्बरता के प्रतीक जैक द रिपर के बहाने समाज में छिपी हुई क्रूरता को दर्शाया गया है। पितृसत्तात्मक सोच तथा महिलाओं की सुरक्षा और उनके संघर्ष को बड़ी बारीकी से उभारा गया है। यह पंक्ति ही बहुत कुछ कह देती है—“आजकल जब से औरतों ने अपनी देह को पाया है, वह निर्लज्ज होती है। इसलिए ऐसे क्लोन चाहिए जो कि स्त्री की देह से ही नहीं, उसकी आत्मा से भी बलात्कार कर सके।” कुख्यात ऐतिहासिक सीरियल किलर जैक द रिपर के प्रतीक का उपयोग करके आधुनिक समाज, पुरुष मानसिकता और स्त्री उत्पीड़न पर गहरा मनोवैज्ञानिक तथा फैंटेसी-आधारित व्यंग्य इस कहानी में किया गया है।

‘दादी माँ का बटुआ’ अपने तीखे व्यंग्य के माध्यम से आधुनिक मीडिया और समाज की उस मानसिकता को सामने लाती है, जहाँ गम्भीर सामाजिक त्रासदियाँ भी मनोरंजन और टीआरपी का हिस्सा बन जाती हैं। ‘दादी माँ’ जैसे आत्मीय सम्बोधन को एक ऐसे कार्यक्रम के शीर्षक में बदल देना, जिसमें कन्या भ्रूण हत्या जैसी भयावह सामाजिक समस्या को तमाशे की तरह प्रस्तुत किया जाता है, कहानी के व्यंग्य को और धार देता है। हास्य और विडम्बना के सहारे लेखिका ने समाज, बाज़ार और मीडिया के उस गठजोड़ पर चोट की है, जो संवेदनशील मुद्दों को भी सनसनी में बदल देता है। कहानी का अंत—जहाँ वी जे ‘टाटा’ करती है और स्क्रीन से गायब हो जाती है—कहानी के पूरे व्यंग्य को एक झटके में समेट लेता है। पाठक हँसते हुए शुरू करता है, लेकिन अंत तक पहुँचते-पहुँचते उस हँसी के पीछे छिपी सामाजिक क्रूरता उसे असहज कर देती है।

संग्रह की अन्य कहानियाँ ‘लव स्टोरी 1994’ और ‘जय श्री राम’ भी बेबाकी से कई सच सामने लाती हैं। समसामयिक धरातल पर रची गयी ये कहानियाँ मध्यवर्गीय जीवन को चित्रित करने के साथ-साथ नौकरीपेशा स्त्री के संघर्ष और समाज की विसंगतियों का भी दस्तावेज हैं। लेखिका की किस्सागोई हर कहानी के साथ पाठक को बाँधे रखती है। वे कितनी सूक्ष्मता से समाज में घट रही घटनाओं को परखती हैं, यह इन कहानियों को पढ़कर ही समझा जा सकता है।


पुस्तक: कथा सप्तक: क्षमा शर्मा | सम्पादक: आकाश माथुर | प्रकाशक: शिवना प्रकाशन | पुस्तक लिंक: कथा सप्तक


FTC Disclosure: इस पोस्ट में एफिलिएट लिंक्स मौजूद हैं। अगर आप इन लिंक्स के माध्यम से खरीददारी करते हैं तो एक बुक जर्नल को उसके एवज में छोटा सा कमीशन मिलता है। आपको इसके लिए कोई अतिरिक्त शुल्क नहीं देना पड़ेगा। ये पैसा साइट के रखरखाव में काम आता है। This post may contain affiliate links. If you buy from these links Ek Book Journal receives a small percentage of your purchase as a commission. You are not charged extra for your purchase. This money is used in maintainence of the website.

Author

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *