खेल खिलाड़ी: क्रिकेटर चेतन चौहान से एक मुलाकात – योगेश मित्तल

खेल खिलाड़ी: क्रिकेटर चेतन चौहान से एक मुलाकात - योगेश मित्तल

चेतन चौहान और सुनील गावस्कर तब भारतीय क्रिकेट टीम के ओपनिंग प्लेयर के रूप में स्थापित हो चुके थे।

खेल-खिलाड़ी पत्रिका उन दिनों राजभारती जी के तीसरे नम्बर के भाई सरदार मनोहर सिंह सँभाल रहे थे।

जो मित्र राजभारती जी के पारिवारिक जीवन के बारे में जानने की उत्सुकता रखते हैं, उन्हें मै बताना चाहता हूँ कि राज भारती जी कुल चार भाई एक बहन थे।

सबसे बड़े राज भारती स्वयं अर्थात करतार सिंह, जो उन दिनों प्रोविडेंट आफिस में अपर डिवीज़न क्लर्क भी थे और उपन्यास लेखक तो थे ही। बाद में उन्होंने नौकरी छोड़ दी थी।

राज भारती जी से छोटे सरदार महेंद्र सिंह पुस्तक व्यवसाय में थे और होलसेल पुस्तक विक्रेता तथा न्यूज़ पेपर सप्लायर थे। सबसे बड़े भारती साहब और सबसे छोटे किशन ने अपने बाल कटवा लिए थे और मोने हो गए थे। जबकि महेंद्र सिंह और मनोहर सिंह तब सरदार थे। बाद में मनोहर सिंह (खेल-खिलाड़ी के स्वामी) ने भी एक बार पूरे बाल कटवा लिए, किंतु सम्भवतः घरेलू कोहराम के कारण कुछ समय बाद फिर बढ़ा लिए थे।

तब तीसरे नम्बर के सरदार मनोहर सिंह उन दिनों खेल खिलाड़ी सँभाल रहे थे। चौथे किशन सिंह इनकम टैक्स विभाग में कार्यरत थे। सबसे छोटी एक बहन थीं। माताजी-पिताजी थे।

सब मुझसे खूब अच्छे से हँसते-बोलते थे। उनके बच्चे भी मुझे देखते ही अंकल नमस्ते जरूर बोलते थे। परिवार के सभी लोगों में बहुत प्यार था। हमेशा सुख-दुःख में एक दूसरे का पूरा-पूरा साथ निभाते थे।

खुशमिज़ाज़ व मिलनसार लोगों का परिवार था, जिसमें मैं भी पारिवारिक सदस्य की तरह घुल-मिल गया था।

डॉक्टर मुकेश कौशिक उन दिनों ‘खेल-खिलाड़ी’ से नये-नये जुड़े थे। डॉक्टर साहब को लिखने का शौक था। उस दिन आये हुए थे तो सरदार मनोहर सिंह ने उनसे कहा, “यार, आजकल चेतन चौहान रणजी ट्रॉफी दिल्ली से ही खेल रहा है। यहीं अशोक विहार में रहता है। उसका इंटरव्यू ले आओ। अगले इशू में उसे छापते हैं।”

मुकेश कौशिक बोले, “पर मेरे पास कैमरा नहीं है।”

“योगेश!” सरदार मनोहर सिंह मुझसे बोले, “तेरे पास तो कैमरा है न?”

“हाँ, दो हैं…लूबिटेल और मिनोल्टा हॉट-शॉट! मिनोल्टा कलर है,” मैंने बताया।

लुबीटेल बारह स्नैप्स की रील वाला ब्लैक एंड वाइट था।

“तो ठीक है योगेश जी, आप भी चलियेगा न साथ में। हम इंटरव्यू लेंगे। आप फोटो खींच लेना,” मुकेश कौशिक ने कहा।

“नहीं-नहीं। यह कैसे जायेगा! इसके पास टाइम ही कहाँ है,” सरदार जी ने कहा, “आप कैमरा ले जाना।”

“पर हम अपनी फोटो अपने आप कैसे खींचेंगे,” मुकेश कौशिक बोले। “फिर हमने पहले कभी फोटोग्राफी नहीं की। योगेश जी के पास कैमरा है तो ये तो फोटो खींचते ही रहते होंगे। और कौन सा पूरा दिन लगना है! दो-चार घंटों की तो बात है।”

“बोल योगेश, तू जायेगा…? खेल-खिलाड़ी के प्रूफ भी आये हुए हैं। आज ही सारे पढ़ने होंगे। कल मैंने सारी करेक्शन लगवाकर परसों तक छपने देनी है।”

“प्रूफ मैं रात को पढ़ कर सुबह-सुबह दे दूँगा। अगर चेतन चौहान का इंटरव्यू छापना है तो बिना फोटो के थोड़े ही छपेगा,” मैंने कहा।

“हाँ, फोटो तो जरूरी है,” सरदार जी ने कहा।

“ठीक है। फिर हो गया फैसला। योगेश जी हमारे साथ जाएँगे,” मुकेश कौशिक ने कहा।

“ठीक है। उसके लिए तो पहले योगेश के घर जाना होगा। कैमरा तो घर पर ही होगा,” सरदार मनोहर सिंह ने कहा। फिर मेरी तरफ देखकर बोले, “चलें योगेश!”

“चलिए…!” मैंने कहा।

सरदार जी उठ खड़े हुए।

“कहाँ…?” तभी मुकेश कौशिक ने पूछा। उसका ध्यान कहीं ओर था।

“योगेश के घर…!” सरदार जी ने कहा।

और फिर टॉप फ्लोर पर स्थित खेल खिलाड़ी के ऑफिस से हम नीचे आये।

सरदार जी ने अपनी बाइक निकाली। उनके पीछे मैं बैठा। फिर मुकेश कौशिक।

उन दिनों न तो तीन सवारी पर कोई प्रतिबंध था, ना ही हेलमेट ज़रूरी था।

मैं उन दिनों पश्चिमी दिल्ली के रमेश नगर में सपरिवार रह रहा था।

सरदार जी और मुकेश कौशिक के साथ मैं रमेश नगर गया। कैमरे उठाये। बाहर आया।

सरदार जी और मुकेश बाहर ही खड़े रहे थे। मुझे और मुकेश को सरदार जी ने बाहर मैन रोड पर उतार दिया, फिर बोले, “यहाँ से तुम लोग ऑटो कर लो। मुझे प्रेस जाना है। खेल-खिलाड़ी का टाइटल देखना है— छापना शुरू किया या नहीं।”

उसके बाद सरदार जी ने मुकेश कौशिक को चेतन चौहान का पता लिखवाया।

ऑटो द्वारा हम अशोक विहार पहुँचे।

वहाँ चेतन चौहान का घर ढूँढने में दिक्कत नहीं हुई।

चेतन चौहान उस समय अशोक विहार के उस फ्लैट में किराए पर रहते थे। फ्लैट पहली मंज़िल पर था। इस समय यह याद नहीं कि फ्लैट की घंटी बजाई थी या पहली मंज़िल पर पहुँच द्वार पर नॉक किया था।

बहरहाल दरवाज़ा खोलने पर एक गेहुएँ रंग की औसत कद की आम सी स्त्री सामने आई। हमने उसे चेतन चौहान के घर की नौकरानी समझा। वह घुटनों तक की एक कुछ-कुछ पिंकिश और महरून सी छींटदार मैली सी फ्रॉक टाइप ड्रेस पहने थीं और उसके ऊपर गहरे स्काई कलर का एप्रन सा कुछ था। जैसा किचन में काम करते हुए रॉयल फैमिली के लोग पहनते हैं। उनके पैर में हवाई चप्पल थी। हमने उससे बड़ी विनम्रता से चेतन चौहान के बारे में पूछा और यह बताया कि हम चेतन चौहान जी का इंटरव्यू लेना चाहते हैं।

वह दरवाज़े के सामने से हटीं और हमसे कहा, “भीतर आइये। वो अभी आते हैं।”

हम अनुमान लगा रहे थे कि वह चेतन चौहान के घर की नौकरानी है या पत्नी…? परिवार का कोई और सदस्य नज़र नहीं आ रहा था। लगता था चेतन अपने माता-पिता व परिजनों से अलग उस फ्लैट में रह रहे थे। जोकि बाद में पता चला कि सही भी था।

मुकेश कौशिक ने सहसा उस महिला से पूछ भी लिया, “आप..?” उसने सिर्फ एक शब्द कहा था, तभी…

“मैं उनका वाइफ हूँ!” वह कुछ फीकी सी हँसी हँसकर बोलीं!

“आप बिहार से हैं …?” मैंने यूँ ही पूछ लिया।

“नहीं, मैं इंडियन हूँ, पर ऑस्ट्रेलियाई सिटीजन हूँ। मेरा फैमिली सब ऑस्ट्रेलिया में हैं।”

“तब तो आपका लव मैरिज हुआ होगा?”

“हाँ…” वह एक बार फीकेपन से मुस्करायीं, “पर हमारे बीच अब सब कुछ ठीक नहीं चल रहा।”

कहकर वह अचानक मुड़ीं और बोलीं, “मैं पानी लाती हूँ। आप दूर से आये हैं। प्यास लगी होगी।”

और थोड़ी देर बाद ही वह एक ट्रे में काँच के दो गिलास में पानी ले आयीं।

हमने पानी के गिलास उठाये ही थे कि वह बोलीं, “चेतन आये तो उसको मत बोलियेगा कि आप लोगों ने मुझसे बात की है और मेरे बारे में कुछ मत छापिएगा, प्लीज़।”

“आप लोगों की शादी कब और कहाँ हुई?” पानी का गिलास खाली कर ट्रे में रख मुकेश कौशिक ने पूछा।

मैंने भी गिलास खाली कर ट्रे में रख दिया।

पर तभी वह दोनों होठों के बीच दाएँ हाथ की तर्जनी रखकर पलट गयीं।

तब हमने चारों तरफ नज़र दौड़ायी! दरवाज़े से एंट्री वाला कमरा ही ड्राइंग रूम था। वहाँ सोफा तथा सोफा चेयर थीं। सोफे के ठीक पीछे दीवार में शीशे की अलमारी थी, जिसमें चेतन चौहान की कुछ ट्रॉफी, मैडल रखे थे।

चेतन चौहान की ऑस्ट्रेलियन पत्नी किचन की ओर जाकर ओझल हुई ही थीं कि चेतन चौहान ने मुख्य द्वार से प्रवेश किया। उनके हाथ में एक झोला था, जिसमें कुछ सामान था, जाहिर था उन दिनों चेतन चौहान के यहाँ कोई घरेलू नौकर या मेड नहीं थी।

हम एकदम खड़े हो गये।

इससे पहले कि चेतन चौहान हमसे कुछ पूछते, मुकेश कौशिक ने उनसे कहा, “हम खेल खिलाड़ी से आये हैं। आपका इंटरव्यू लेना चाहते हैं।”

“बैठिये…।” चेतन चौहान ने कहा।

क्रिकेट खिलाड़ी चेतन चौहान योगेश मित्तल के साथ
तस्वीर में: मैं चेतन चौहान के साथ, उनके अशोक विहार स्थित फ्लैट में…!

उन दिनों खेल-खिलाड़ी हिंदी की मशहूर खेल पत्रिका थी और खेल-खिलाड़ी के अलावा हिंदी तो क्या, इंग्लिश में भी कोई पत्रिका या तो आती नहीं थी या चर्चित नहीं थीं।

स्पोर्ट्सवीक, स्पोर्ट्सवर्ल्ड, स्पोर्ट्सस्टार सब बाद में छपने वाली पत्रिकाएँ हैं। क्रिकेटस्टार, क्रिकेटवर्ल्ड, क्रिकेटसम्राट सब बहुत बाद में छपनी आरम्भ हुईं।

चेतन चौहान का इंटरव्यू मुकेश कौशिक ने ही लिया। क्या-क्या पूछना है? यह मुझसे डिसकस करके उसने पहले ही एक डायरी में नोट कर लिया था। जब भी मुकेश कौशिक बीच में कहीं अटका, तब ही मैंने ज़ुबान खोली थी।

हमारे पास टेप रिकॉर्डर नहीं था।

इंटरव्यू की बातें मुकेश कौशिक डायरी में नोट करता गया।

बाद में वह इंटरव्यू – इंटरव्यूकर्ता मुकेश कौशिक के ही नाम के साथ, खेल-खिलाड़ी में प्रकाशित हुआ था। तब वह चेतन चौहान का पहला बड़ा इंटरव्यू था। तब इंटरव्यू में हमने चेतन चौहान की ऑस्ट्रेलियन पत्नी से हुई बातों को नहीं डाला था।


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Author

  • योगेश मित्तल

    25 मार्च 1957 को दिल्ली के चांदनी चौक के पत्थरवालान में जन्में योगेश मित्तल के बचपन के कुछ वर्ष सिविल लाइन्स, शाहदरा में व्यतीत हुए। शाहदरा के बाद उन्होंने कुछ वर्ष चुरू, राजस्थान में गुज़ारे। उसके बाद 1963 से 1968 तक वे अपने परिवार के साथ कलकत्ता में रहे और फिर 1969 में दिल्ली आकर दिल्ली में ही बस गए। तब से लेकर अब तक वह दिल्ली में ही रहते आये हैं।

    कलकत्ता में रहते हुए ही योगेश मित्तल की पहली कविता व कहानी 1964 में कलकत्ता के दैनिक समाचार पत्र 'सन्मार्ग' के 'बालजगत' स्तम्भ में छपी।

    1969 में दिल्ली आने के पश्चात उनकी रचना जब गर्ग एंड कम्पनी की पत्रिका 'गोलगप्पा' में छपी तो वो प्रकाशक ज्ञानेंद्र प्रताप गर्ग की नज़र में आये। इसके पश्चात शुरू हुआ लेखन का सिलसिला आज पाँच दशक से भी ऊपर का समय गुजरने के बाद भी अनवरत ज़ारी है।

    लेखन की पहली पारी में योगेश मित्तल का अधिकतर लेखन ट्रेड नाम के लिए किया गया है। उपन्यास लेखन के अतिरिक्त उन्होंने खेल पत्रकारिता, कॉमिक बुक लेखन और सम्पादन के क्षेत्र में भी कार्य किया।

    अपने लेखन की दूसरी पारी में अब अपने नाम से उनकी पुस्तकें प्रकाशित हो रही हैं।  प्रेतलेखन, वेद प्रकाश शर्मा: यादें बातें और अनकहे किस्से, शैतान: जुर्म के खिलाड़ी नीलम जासूस कार्यालय से और  चांदी की चोंच, लड्डू मास्टर की भैंस, लोमड़ी का दूल्हा, काठ की अम्मा लायंस पब्लिकेशंस से प्रकाशित हुई हैं।

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