राजकमल के स्थापना दिवस पर 28 को होगा ‘भविष्य के स्वर’ कार्यक्रम

राजकमल के स्थापना दिवस पर 28 को होगा ‘भविष्य के स्वर’ कार्यक्रम
  • राजकमल मना रहा है अपनी स्थापना का 81वाँ सहयात्रा उत्सव
  • 28 फरवरी की शाम होगा छठे विचार-पर्व ‘भविष्य के स्वर’ का आयोजन
  • ‘भविष्य के स्वर’ के इस अध्याय में पाँच युवा प्रतिभाएँ देंगी व्याख्यान

26 फरवरी, 2026 (गुरुवार)
नई दिल्ली। राजकमल प्रकाशन अपनी स्थापना के 81वें वर्ष में प्रवेश के अवसर पर 28 फरवरी की शाम ‘सहयात्रा उत्सव’ का आयोजन कर रहा है। इस अवसर पर ‘भविष्य के स्वर’ विचार-पर्व का छठा अध्याय प्रस्तुत किया जाएगा, जिसमें पाँच युवा प्रतिभाएँ अपने व्याख्यान देंगी। विभिन्न सामाजिक-सांस्कृतिक पृष्ठभूमियों से आने वाले इन युवाओं ने हाल के वर्षों में अपने कार्यों से उल्लेखनीय सम्भावनाएँ जगाई हैं। राजकमल प्रकाशन अपने मंच के माध्यम से व्यापक पाठक-समुदाय के बीच उनकी प्रतिभा और दृष्टि को रेखांकित करेगा। यह आयोजन नई दिल्ली में मैक्समूलर मार्ग पर स्थित इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में होगा।

राजकमल प्रकाशन के प्रबंध निदेशक अशोक महेश्वरी ने बताया कि श्रेष्ठ पुस्तकों के प्रकाशन की यह यात्रा अब 81वें वर्ष में प्रवेश कर रही है। पाठकों और लेखकों के साथ राजकमल प्रकाशन की सहयात्रा का यह क्षण हम सबके लिए गौरवशाली है।

उन्होंने बताया कि इस अवसर पर होनेवाले विचार-पर्व ‘भविष्य के स्वर’ के माध्यम से हमारा उद्देश्य साहित्य सहित विभिन्न क्षेत्रों में नई लकीर खींच रहे युवाओं के अनुभवों, दृष्टियों और स्वप्नों को स्वर देना है। इस वर्ष के वक्ता हैं—उन्नति चौधरी, पंकज कुमार, पराग पावन, शहनाज़ रहमान और सोनल पटेरिया। इन पाँचों युवा प्रतिभाओं ने अपने-अपने क्षेत्रों में किए कार्यों से बड़ी सम्भावनाएँ जगाई हैं।

आगे उन्होंने कहा, राजकमल प्रकाशन ने 2019 में अपने स्थापना दिवस के अवसर पर ‘भविष्य के स्वर’ विचार-पर्व की शुरुआत की थी। इसका उद्देश्य नई पीढ़ी की दृष्टि से आने वाले समय की आहट को समझना और समकालीन समाज-साहित्य के प्रश्नों पर विचार करना रहा है। अब तक इसके पाँच अध्यायों में 28 युवा प्रतिभाएँ अपने विचार प्रस्तुत कर चुकी हैं। 2026 का आयोजन इस शृंखला का छठा अध्याय है।

पहले पाँच अध्यायों में इन 28 युवा प्रतिभाओं का हो चुका है व्याख्यान

‘भविष्य के स्वर’ शृंखला में अब तक आयोजित पाँच अध्यायों में साहित्य, पत्रकारिता, शोध, कला और सामाजिक हस्तक्षेप के क्षेत्र से जुड़े 28 युवा शामिल रहे हैं। इनमें से अनेक वक्ताओं को बाद में राष्ट्रीय स्तर पर व्यापक पहचान मिली। ‘भविष्य के स्वर’ का मंच इस अर्थ में नई पीढ़ी की रचनात्मक ऊर्जा और बौद्धिक हस्तक्षेप का एक महत्वपूर्ण पड़ाव बनता रहा है।

‘भविष्य के स्वर’ के पहले आयोजन में घुमन्तू पत्रकार-कथाकार अनिल यादव; कवि-शोधकर्ता अनुज लुगुन; कवि-कथाकार गौरव सोलंकी; कलाकार डिजाइनर अनिल आहूजा; मीडिया विश्लेषक विनीत कुमार; आरजे सायमा और पत्रकार अंकिता आनंद ने व्याख्यान दिया। 2020 में इसके दूसरे अध्याय के वक्ताओं में कवि सुधांशु फिरदौस; कवि जंसिता केरकेट्टा; किस्सागो हिमांशु वाजपेयी; सिने आलोचक मिहिर पंड्या; कथाकार चन्दन पांडेय; वंचित बच्चों में कलात्मक कौशल के विकास के लिए सक्रिय जिज्ञासा लाबरु और कवि-आलोचक मृत्युंजय शामिल थे। 2021 में कोरोना महामारी के चलते यह आयोजन सम्भव नहीं हो सका।

2022 में ‘भविष्य के स्वर’ के तीसरे अध्याय में यायावर लेखक अनुराधा बेनीवाल; अनुवादक-यायावर लेखक अभिषेक श्रीवास्तव; लोकनाट्य अध्येता एवं रंग आलोचक अमितेश कुमार; अध्येता-आलोचक चारु सिंह; लोक साहित्य अध्येता एवं कथाकार जोराम यालाम नाबाम; गीतकार-लेखक नीलोत्पल मृणाल; चित्रकार एवं फैशन डिजाइनर मालविका राज ने अपने व्याख्यान दिए। 2023 में नई दिल्ली विश्व पुस्तक मेला के दौरान होने के चलते यह आयोजन नहीं हो सका।

2024 में प्रस्तुत चौथे अध्याय में युवा इतिहासकार ईशान शर्मा; कथाकार कैफ़ी हाशमी; कवि विहाग वैभव और कवि पार्वती तिर्की ने व्याख्यान दिए। वहीं पिछले वर्ष रंगकर्मी-कथाकार फहीम अहमद; ज़ीन-मेकर एवं फाइबर-आर्ट कलाकार कोशी ब्रह्मात्मज और कथाकार-सम्पादक तसनीफ़ हैदर ने अपनी विशिष्ट रचनात्मक यात्राओं और वैचारिक अनुभवों से इस मंच को समृद्ध किया।

‘भविष्य के स्वर’ 2026 के वक्ता

● उन्नति चौधरी कलाकार हैं। उन्होंने अशोका यूनिवर्सिटी, हरियाणा से अंग्रेज़ी साहित्य में एम.ए. किया है। उनका काम मुख्य रूप से पुस्तक-आवरण, चित्रांकन और डिज़ाइन से जुड़ा है। वे सुजनी कला से जुड़ी एक प्रदर्शनी भी क्यूरेट कर चुकी हैं। पब्लिशिंग नेक्स्ट द्वारा भारतीय भाषाओं की श्रेणी में सर्वश्रेष्ठ कवर डिज़ाइन—2024 से पुरस्कृत उन्नति फ़िलहाल एक स्वतंत्र कलाकार के रूप में सक्रिय हैं।

● पंकज कुमार जामिया मिल्लिया इस्लामिया, नई दिल्ली से पी-एच.डी. कर रहे हैं। उनका शोध-कार्य भारतीय समाज में जाति और लोकतंत्र के बदलते सम्बन्धों पर केन्द्रित है, जिसमें उनका ख़ास जोर ग्लोबलाइजेशन के चलते जाति-व्यवस्था में हो रहे सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक परिवर्तनों को समझने पर रहा है। प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में छपे उनके शोध-आलेख बहुधा चर्चा का विषय बने हैं।

● पराग पावन ने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली से पी-एच.डी. की उपाधि प्राप्त की है। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में उनकी कविताएँ और शोध आलेख प्रकाशित होते रहे हैं। अंग्रेज़ी समेत कई भारतीय भाषाओं में उनकी कविताओं के अनुवाद भी प्रकाशित हैं। हाल ही में आए उनके पहले कविता-संग्रह ‘जब हर हँसी संदिग्ध थी’ ने व्यापक स्तर पर पाठकों का ध्यान खींचा है।

● शहनाज़ रहमान ने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से पी-एच.डी. की है। उर्दू कहानी और आलोचना में उनकी रचनात्मकता ने सबका ध्यान आकर्षित किया है। आलोचना में पाठ-केन्द्रित विश्लेषण पर जोर देने वाली शहनाज़ ने अपनी कहानियों में मुस्लिम समाज की उन विसंगतियों को रेखांकित किया है जिनका सीधा असर महिलाओं के जीवन पर पड़ता है। उनका एक कहानी संग्रह ‘नैरंग-ए-जुनूँ’ प्रकाशित है जिसके लिए उन्हें साहित्य अकादेमी युवा पुरस्कार मिल चुका है।

● सोनल पटेरिया पत्रकार हैं। उन्होंने सामाजिक न्याय, लैंगिक मुद्दों, राजनीति और हाशिये के समुदायों ये जुड़े मसलों को अपनी पत्रकारिता में प्रमुखता दी है। मुश्किल और जोखिम भरे माहौल में बिना डरे ऑन-ग्राउंड कवरेज के लिए जानी जाती हैं। फिलहाल एक अग्रणी डिजिटल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म के साथ बतौर सीनियर रिपोर्टर काम कर रहीं सोनल लाडली मीडिया अवार्ड से पुरस्कृत हो चुकी हैं।


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