उपन्यास 10 जुलाई 2020 से 14 जुलाई 2020 के बीच पढ़ी गयी
संस्करण विवरण:
फॉर्मेट: पेपरबैक
पृष्ठ संख्या: 318
प्रकाशक: रवि पॉकेट बुक्स
आईएसबीएन: 9798177894843
श्रृंखला : विनय रात्रा #1
वन शॉट – कँवल शर्मा |
पहला वाक्य:
सर्द दिसम्बर की उस घने कोहरे वाले गहरी स्याह रात में एक काली वैन तेजी से उस हाइवे पर दौड़ी जा रही थी जो दोनों और सिर उठाये खड़े पहाड़ों के बीच से गुजरता हुआ आगे राजनगर और उससे और आगे ऊपर शिमागो तक जाता था।
कहानी:
वह एक शॉट था जिसने रोहन रात्रा की आत्मा को उसके शरीर से जुदा कर दिया था।
वह एक शॉट था जिसने विनय रात्रा को अपने भाई से हमेशा के लिए जुदा कर दिया था।
राजनगर की पुलिस की माने तो रोहन ने आत्महत्या की थी। लेकिन जिन हालातों में रोहन की लाश मिली थी उसमें पुलिस की यह दलील तर्कसंगत नहीं लग रही थी। विनय को लगता था कि रोहन को किसी ने मारा है।
यही कारण था कि विनय ने अपने भाई के कत्ल की गुत्थी को सुलझाने का फैसला कर लिया था।
आखिर रोहन पर वह एक शॉट दागने वाला व्यक्ति कौन था?
क्या रोहन का कत्ल हुआ था या पुलिस का कहना ही सच था?
अगर रोहन का कत्ल हुआ था तो उसके कत्ल के पीछे कौन था? क्यों राजनगर की पुलिस इसे आत्महत्या का मामला बनाना चाहती थी? आखिर रोहन अपनी इस हालत तक कैसे पहुँचा था?
ऐसे ही कई सवालों का जवाब अब विनय को जानना था।
क्या वह जान पाया?
मुख्य किरदार:
नूरअलदीन – रॉ का एजेंट जो कि बाद में डबल एजेंट बन गया था
विनय रात्रा – रॉ का एजेंट
कर्नल स्वामीनाथन – रॉ का चीफ
जयंत सिन्हा – विनय का रिपोर्टिंग अफसर
मथुरा प्रसाद – विनय का सहयोगी
मालिनी – रॉ के दिल्ली दफ्तर की रिसेपशनिस्ट
तेनजिन ताशी – इंस्पेक्टर जो रोहन की मौत का मामला देख रहा था
नेगी, खजूरी – हवलदार
डॉ तोशनीवाल – डॉक्टर जिसने रोहन का पोस्टमार्टम किया था
रोहन रात्रा – विनय का भाई जिसकी राजनगर में एक जासूसी फर्म मैक्सिमम सिक्योरिटीज थी
सहाद्री राणे – रोहन की प्रेमिका
नमिता जोशी- रोहन की सेक्रेटरी जिसके साथ उसका अफेयर था
राजेश – रॉ के दफ्तर में एक स्टेनो
उजागर – रोहन के ऑफिस का हेल्पर जो कि उधर फ्लोर के अलग अलग दफ्तरों में भी काम करता था
राजबीर सिंह रायचंद – मेयर
बद्दन – मेयर का गुर्गा
खालिद खट्टा – एक आपराधिक चरित्र जिसे मेयर का संरक्षण प्राप्त था
जुम्मन – खालिद का साथी
यास्मीन – सिग्मा ट्रेवल्स को देखने वाली
प्रमिला रायचंद – मेयर की बीवी
मेरे विचार:
वन शॉट कँवल शर्मा जी का पहला उपन्यास था जिसे मैंने मँगवा तो काफी पहले लिया था लेकिन पढ़ने का मौक़ा अभी लगा है। यह उपन्यास विनय रात्रा श्रृंखला का पहला उपन्यास है। इसके बाद इस श्रृंखला का दूसरा उपन्यास टेक थ्री प्रकाशित हुआ था जो कि मैंने काफी पहले पढ़ लिया था।
विनय रात्रा की बाबत अगर आप नहीं जानते हैं तो यह जानना काफी है कि विनय भारतीय इंटेलिजेंस एजेंसी रॉ का एजेंट है। जब वह रॉ के मिशन्स पर खतरों से नहीं खेल रहा होता है, तब वह एक प्रोफेसर के रूप में दिल्ली के कॉलेज में बच्चों को इतिहास पढ़ाता है।
अब वन शॉट की बात करें तो किताब दो हिस्सों में विभाजित है।
पहला हिस्सा लेखकीय है जो कि तेरह पृष्ठों का है। लेखकीय किताब की वह जगह होती है जहाँ लेखक अपने पाठकों से रूबरू होता है। यह उसका खुद का स्पेस है जहाँ वो अपने मन मुताबिक अपने पाठकों से जो साझा करना चाहे साझा कर सकता है। इस किताब के लेखकीय में भी कँवल जी ने काफी बातें साझा की है। चूँकि उपन्यास का मुख्य किरदार एक खूफिया जासूस है तो लेखकीय की सामग्री भी जासूसी के इर्द गिर्द ही रची गयी है। लेखक ने पाठकों के साथ रॉ से जुड़ी जानकारियाँ साझा करने के साथ साथ विश्व में महिला जासूसों द्वारा किये गये कारनामों को भी साझा किया है। महिला जासूस के नाम पर मैंने माताहारी का नाम ही केवल सुना था लेकिन इस लेखकीय के चलते नूर इनायत खान, नैंसी वेक, मैरी ब्राउजर, शेवलियर डीयोन, योशिको काबाशीमा जैसी कई महिला जासूसों का नाम मुझे पता चला। अगर आपकी जासूसी में रूचि है तो यह लेखकीय आपको रोचक लगेगा।
उपन्यास के दूसरा हिस्सा उपन्यास का कथानक है। वन शॉट एक भाई के अपने मृत भाई को इंसाफ दिलाने की दास्तान है। विनय रात्रा एक रॉ एजेंट है जिसे अपने भाई की मौत की खबर मिलती है तो वह अपने मिशन को खत्म कर अपने भाई के शहर पहुँचता है।
उपन्यास शुरुआत से ही आपको बाँधकर रखता है। विनय की एंट्री बेहतरीन बन पड़ी है। विनय को पाठक एक मिशन के बीच में देखते हैं जहाँ वह अपने देश की अमानत को एक डबल एजेंट से वापस लाने की जुगत बिठा रहा होता है। व्यक्तिगत तौर पर इससे हिस्से को पढ़ते हुए मुझे लग रहा था कि यह हिस्सा इतना रोचक है कि इसे उपन्यास से अलग एक दूसरा उपन्यास लेखक को बनाना चाहिए था। चूँकि अभी लेखक ने इसे विनय की एंट्री के तौर पर लिखा है तो मामले के अंत तक पहुँचने पर ही पाठक कहानी में आता है और किस्सा जल्दबाजी में निपटाया हुआ सा लगता है। उम्मीद है आगे चलकर लेखक इसे एक वृहद कथानक बनायेंगे।
उपन्यास का बाकी का घटनाक्रम राजनगर नाम के एक काल्पनिक शहर में घटित होता है। अगर आप हिन्दी अपराध साहित्य पढ़ते हैं तो आप जानते ही होंगे कि राजनगर एक ऐसा शहर है जहाँ कई बड़े हिन्दी अपराध लेखकों ने अपनी कहानियों को बसाया है। ऐसे में कँवल जी का अपने पहले उपन्यास के कथानक को इस शहर में बसाना मेरे हिसाब से उनका उन लेखकों, जिन्हें वो अपना गुरु भी तस्लीम करते हैं, के प्रति एक तरह का ट्रिब्यूट है। यह मेरा कयास ही है बाकि असल बात तो वही बता पाएंगे।
खैर, राजनगर में विनय की एंट्री होते ही इस बात का एहसास हो जाता है कि उसका सफर आसान नहीं होने वाला है। विनय जैसे जैसे वह मामले की तह तक जाता है उसे पता चलता है कि उसका भाई एक ऐसे धंधे में लिप्त हो चुका था जिसे गैरकानूनी ही कहा जायेगा और अब उसकी मौत पर पर्दा डालने के लिए शहर के बड़े बड़े रसूख वाले लोग अपनी अपनी कोशिश कर रहे हैं। वह इन लोगों से टकराकर कैसे अपने भाई को इंसाफ दिलाता है यह जानने के लिए आप उपन्यास पढ़ते चले जाते हैं। लेखक ने कहानी में ऐसे कई लोगों को रखा है जिन पर हत्या का शक जाता रहता है। इस कारण कथानक में ट्विस्ट आते जाते हैं और उपन्यास में रूचि बनी रहती है।
उपन्यास का मुख्य किरदार विनय रात्रा मुझे पसंद आया। वह रॉ एजेंट है और इस कारण वह ऐसे फैसले लेने के लिए प्रशिक्षित है जो कि कई बार क़ानून के दायरे के बाहर रहते हैं। ऐसे फैसले वह इस उपन्यास में भी लेता है और कई बार वो ऐसी चाल भी चलता है कि साँप भी मर जाता है और लाठी भी नहीं टूटती है। इस कारण उसके अगले कारनामों को पढ़ने की रुचि पाठक में खुद ब खुद जाग जाती है।
विनय का साथ देने के लिए उपन्यास में राजेश है। राजेश कहने को तो रॉ के दफ्तर में स्टेनो है लेकिन कई जरूरी बातों पर विनय का ध्यान यही दिलाता है। राजेश को लेकर भी लेखक को कुछ लिखना चाहिए।
उपन्यास के बाकी किरदार कहानी के अनुरूप ही हैं।
उपन्यास की कमियों की बात करूँ तो उपन्यास का कथानक अभी 299 पृष्ठों में फैला हुआ है। इन पृष्ठों में से कई पृष्ठ संवादों को दिए हुए हैं। यह संवाद कई बार जरूरत से ज्यादा लम्बे प्रतीत होते हैं। एक अच्छे थ्रिलर का सबसे बड़ा गुण कथानक का तेज रफ्तार होना होता है और इस उपन्यास में ये लम्बे संवाद कथानक की गति को कम करते हैं। संवादो में कई बार दोहराव भी महसूस होता है। ऐसे में संवादों को छोटा और क्रिस्प बनाया जा सकता था। इससे कथानक की गति तेज रहती और रोमांच बढ़ जाता।
कथानक में एक दो बातें हैं जो मुझे अटपटी लगी।
विनय जब रायचंद से मिलकर जाता है तो रायचंद किसी को फोन करके विनय के नमिता से मिलने की बात बताता है और फिर दूसरी तरफ से मामला सम्भालने की बात होती है। पढ़ते हुए मेयर की यह हरकत अजीब नहीं लगती है लेकिन कहानी खत्म होने के बाद उसका यह फोन किये जाने का कोई तुक समझ नहीं आता है। उसे यह करने की जरूरत ही नहीं थी।
वहीं विनय ट्रेनड एजेंट है तो मैं यह मानकर चलता हूँ कि उन्हें तकनीक की ट्रेनिंग भी दी जाती होगी। ऐसे में टीमव्यूवर जो कि आम सा सॉफ्टवेर है के विषय में उसका अनजान होना मुझे तो अतपटा लगा था। आम आदमी होता तो शायद इतना अटपटा न लगता।
इन कमियों के अलावा मेरे पास मौजूद संस्करण के पृष्ठ भी थोड़े अव्यवस्थित थे। बीच में फिर सही पृष्ठ ढूँढकर पढ़ने में लय बिगड़ी थी। वहीं संस्करण की बाईंडिंग भी कमजोर है। एक बार पढ़ने में ही यह जगह जगह से खुल गयी है। रवि पॉकेट बुक्स वालों को इस पर ध्यान देना चाहिए। उनकी ज्यादातर किताबों में बाईंडिंग की दिक्कत होती है। इससे उपन्यास पढ़ने का अनुभव ही खराब होता है जिसका खामियाजा लेखक ही उठाएगा क्योंकि पाठक आगे से ऐसे कम क्वालिटी वाली किताब नहीं लेगा।
अंत में यही कहूँगा कि वन शॉट मुझे पसंद आया। अगर एक रोचक क्राइम थ्रिलर पढ़ना चाहते हैं तो इसे एक बार पढ़कर देख सकते हैं। विनय रात्रा एक तगड़ा किरदार है जिसके आगे के कारनामे मैं जरूर पढ़ना चाहूँगा।
उपन्यास की कुछ पंक्तियाँ जो मुझे पसंद आईं:
आदमी की आदमियत का सही अंदाजा इस बात से नहीं लगता कि उसने आम हालातों में, अपनी कन्विनिएंस के दिनों में क्या रुख अपनाया, क्या स्टैंड लिया, बल्कि इस बाबत उसकी हैसियत का सही अंदाजा इस बिना पर लगता है कि उसने अपने बुरे दिनों में, अपने खराब, बेहद खराब, हालातों में क्या फैसला लिया!
(पृष्ठ 38)
कुछ समझदार अक्लमंद और खूब दानिशमंद औरतें ही जानती हैं कि प्यार कैसे किया जाता है, लेकिन फिर सबसे अक्लमंद औरत ही जानती है कि प्यार किसे किया जाता है।
(पृष्ठ 127)
ख्वाब देखना, उन ख्वाबों को पूरा करने के लिए दिन-रात पसीना बहाना और आखिरकार उन्हें हासिल करना-ये इनसानी फितरत है, लेकिन आगे अपने इस हासिल का आनन्द उठाना उसका मज़ा लेना एक इन्तेहाई जुदा मसला है और बदकिस्मती से आदमजात की आधुनिक औलादों में ऐसे बेहद कम लोग हैं जो इस महीन फर्क को समझ सकें और खुद को आगे उस अगले दूसरे मुकाम तक भी पहुँचा सकें।
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आपने खुद के लिए निर्धारित लक्ष्यों को हासिल कर लिया, ये आपकी योग्यता है, आपकी काबिलियत है, लेकिन आपने अपनी उस हासिल कामयाबी का आनन्द उठाया, ये आपकी दानाई है, ये आपकी अक्लमंदी है।
(पृष्ठ 142)
कितनी अजीब बात है कि इस फानी दुनिया में कैंसर से ज्यादा लोग अपने दीन, अपने धर्म के नाम पर मारे गए हैं, लेकिन बदकिस्मती कि हम अभी भी कैंसर का ही इलाज ढूँढ़ रहे हैं।
(पृष्ठ 186)
रेटिंग: 3/5
अगर आपने इस किताब को पढ़ा है तो आपको यह कैसी लगी? अपने विचारों से मुझे जरूर अवगत करवाईयेगा।
कँवल शर्मा जी की दूसरी रचनाओं के प्रति मेरी राय:
हिन्दी पल्प साहित्य की दूसरी रचनाओं के प्रति मेरी राय:
© विकास नैनवाल
बेहतरीन समीक्षा की है विकास जी आपने 'वन शॉट' की । मुझे भी यह उपन्यास बहुत पसंद है तथा मैं इसकी समीक्षा करने के साथ-साथ 'राजनगर' पर आधारित अपने लेख में भी इसका उल्लेख कर चुका हूँ । मैं लम्बे लेखकीयों का समर्थक नहीं क्योंकि ऐसी पुस्तकों को ख़रीदने वाले अधिकांश पाठक उन्हें उनके कथानकों से मनोरंजन प्राप्त करने के लिए ही ख़रीदते हैं न कि लम्बे-लम्बे लेखकीयों के लिए ।
जी आभार सर। मैंने आपके दोनों ही लेख पढ़ चुका हूँ। जी आपने सही कहा कि लेखकीय लम्बे नहीं होने चाहिए। पाँच से दस पृष्ठों के बीच ही हों तो सही रहता है।
Thank u Vikas Ji. U have done an honest review and that is a great help.
Its been years now when i penned it and to be honest, i created Vinay as a shadow of my colleague professor.
Similarly – u got it right when u said that use of 'Rajnagar' is a tribute to my Guru.
Will love to have a diacussion with u personally some day.
My best wishes.
Yes Sir,will do a discussion on it someday. Thanks for coming and commenting.
कंवल जी का प्रथम उपन्यास काफी रोचक लगा मुझे।
बेहतरीन थ्रिलर कथानक।
अनावश्यक रूप से लंबे संवाद कथा को प्रभावित करते हैं।
धन्यवाद।
जी सही कहा। थ्रिलर में चुस्त कथानक जरूरी होता है और लम्बे संवाद कथानक की गति कई बार कम कर देते हैं।