30 जनवरी, 2026, लखनऊ: उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान द्वारा वृंदावन लाल वर्मा एवं जयशंकर प्रसाद की स्मृति में शुक्रवार 30 जनवरी, 2026 को एक दिवसीय संगोष्ठी का आयोजन हिंदी भवन के निराला सभागार लखनऊ में पूर्वाह्न 10.30 बजे से किया गया।
दीप प्रज्वलन, माँ सरस्वती की प्रतिमा पर माल्यार्पण, पुष्पार्पण के उपरांत वाणी वंदना डाॅ. कामिनी त्रिपाठी द्वारा प्रस्तुत की गयी।
सम्माननीय अतिथि डाॅ. पुनीत बिसारिया, श्री सुरेंद्र अग्निहोत्री एवं डाॅ. नीरज कुमार द्विवेदी का स्वागत उत्तरीय एवं स्मृति चिह्न भेंट कर डाॅ. अमिता दुबे, प्रधान सम्पादक, उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान द्वारा किया गया। अतिथियों ने वृंदावन लाल वर्मा और जयशंकर प्रसाद और उनकी रचनाओं के ऊपर अपनी बात रखी।

डाॅ. पुनीत बिसारिया ने कहा, वृंदावन लाल वर्मा अपने साहित्य में हमें एक अलग तरह के इतिहास से परिचित कराते हैं। वृंदावन लाल वर्मा के ‘झाँसी की रानी’ उपन्यास में नारी सशक्तिकरण का एक अभूतपूर्ण चित्रण मिलता है। उनकी रचना ‘विराटा की पद्मिनी‘ एक ऐतिहासिक उपन्यास है। वृंदावन लाल वर्मा जी में अभूतपूर्व कल्पना शक्ति थी, जिसे उन्होंने अपनी रचनाओं में प्रयोग किया है। उनकी रचना ‘शरणागत’ में भारतीय संस्कृति दिखायी देती है कि कैसे एक शरणागत की रक्षा की जाती है। वृंदावन लाल वर्मा की ‘मृगनयनी‘ प्रेम आधारित रचनाओं में अप्रतिम रचना है। वृंदावन लाल वर्मा ने बुंदेलखंड की संस्कृति को अपनी रचनाओं में जीवंत कर दिया।
श्री सुरेंद्र अग्निहोत्री ने कहा, “वृंदावन लाल वर्मा ने हमें ‘झाँसी की रानी‘, ‘विराटा की पद्मिनी‘, ‘गढ़कुंढ़ार‘, ‘मृगनयनी‘, ‘कचनार’ जैसे उपन्यासों के माध्यम से पाठकों के सामने ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को प्रस्तुत किया है। वृंदावन लाल वर्मा के मन में बचपन से ही लेखन के प्रति रुचि थी। ‘गढ़कुंढ़ार‘ उनकी एक प्रसिद्ध कृति है। ‘गढ़कुंढ़ार’ उपन्यास में ऐतिहासिक तत्वों का समावेश है। ‘विराटा की पद्मिनी‘ उपन्यास में सांस्कृतिक वैभव परिलक्षित होता है। वृंदावन लाल वर्मा के उपन्यासों में नारी सशक्तिकरण की प्रबलता दिखायी पड़ती है। उनके उपन्यासों में बुंदेलखंड की भाषा एवं संस्कृति के तत्व विद्यमान हैं।”

डाॅ. नीरज कुमार द्विवेदी ने कहा, “जयशंकर प्रसाद जी ने सारगर्भित साहित्य की रचना की। प्रसाद जी की रचनाओं में राष्ट्रीयता के तत्व विद्यमान हैं। प्रसाद जी के जीवन की विरह वेदनाओं का प्रभाव उनके साहित्य में दिखायी पड़ता है। उन्होंने साहित्य का गहन अध्ययन मनन के उपरांत ही अपने साहित्य का सृजन किया। ‘कानन कुसुम’ उनकी खड़ी बोली की रचना है। ‘झरना’, ‘कामायनी’, ‘कानन कुसुम’ प्रसाद की प्रसिद्ध काव्य रचनाएँ हैं। ‘करुणालय’ एक गीत नाट्य रचना है। उनकी रचना ‘अजातशत्रु’ नाटक उनकी एक प्रसिद्ध रचना है। ‘स्कंद गुप्त’ उनका एक चर्चित नाटक रहा है।
इस अवसर पर वृंदावन लाल वर्मा के उपन्यास ‘कीचड़ और कमल’ के अंश का पाठ सुश्री सौम्या मिश्रा एवं ‘अमरबेल’ के अंश का पाठ सुश्री उपासना जायसवाल तथा जयशंकर प्रसाद की रचना ‘कंकाल’ के अंश का पाठ सुश्री अनमोल शर्मा एवं ‘आनंद सर्ग’, ‘कामायनी’, ‘आँसू’ का पाठ सुश्री मुस्कान सिंह द्वारा प्रस्तुत किया गया।
डाॅ. अमिता दुबे, प्रधान सम्पादक, उ.प्र. हिंदी संस्थान द्वारा कार्यक्रम का संचालन एवं संगोष्ठी में उपस्थित समस्त साहित्यकारों, विद्वत्तजनों एवं मीडिया कर्मियों का आभार व्यक्त किया गया।
