संस्करण विवरण:
फॉर्मैट: पेपरबैक | पृष्ठ संख्या: 22 | प्रकाशक: सस्ता साहित्य मंडल प्रकाशन | चित्रांकन: राजकुमार घोष
पुस्तक लिंक: अमेज़न
कहानी
पाँचवी में पढ़ने वाली नैना घर लौट के आयी तो मम्मी को वह दुखी सी लगी। जब मम्मी नैना के कमरे में गयी तो उन्होंने पाया कि वो रो रही थी। पूछने पर उसने मम्मी को बताया कि वह अब से स्कूल नहीं जाएगी। उसके साथ पढ़ने वाले बच्चे उसे काली कलूटी जामुन कहकर जो बुलाते थे।
वह उसे क्यों चिढ़ाते थे?
क्या नैना स्कूल जाने को तैयार हुई?
टिप्पणी
इंसानी रंग को लेकर हमारे समाज में एक तरह की सोच सदैव व्याप्त रही है। यहाँ एक रंग को अच्छा समझा जाता है और एक रंग को कमतर समझा जाता है। यह भेदभाव परिवार में भी बचपन से ही शुरु हो जाता है और इस कारण परिवार में पलने वाले बच्चे के मन में भी अपने रंग को लेकर असुरक्षा का भाव पैदा हो जाता है। प्रस्तुत पुस्तक ‘काली कलूटी जामुन’ इसी सोच और उसके कारण बच्चे के मन में पड़ने वाले असर को दर्शाती है।
‘काली कलूटी जामुन’ कमल वर्मा द्वारा लिखित बाल कथा है। पुस्तक सस्ता साहित्य मंडल प्रकाशन द्वारा प्रकाशित की गयी। पुस्तक के केंद्र में नैना नाम की लड़की है जिसे उसके सहपाठी उसके श्यामवर्णी होने के कारण चिढ़ाते हैं। वहीं घर पर उसकी माँ और बाकी रिश्तेदार भी उसके रंग को लेकर चिंतित रहते हैं। वह इसी उपाय में रहते हैं कि कैसे नैना गौरवर्णी हो या जितनी श्यामवर्णी है उतनी न दिखे। घर वालों की इस चिंता और सहपाठियों के चिढ़ाने का क्या असर एक बालमन पर पड़ता है यह लेखिका दर्शाने में सफल हुई है। ऐसा करके परिवार वाले कैसे बच्चों के में एक अनावश्यक असुरक्षा का भाव जागृत होता है यह कहानी में अच्छे से दर्शाया गया है।
कहानी जैसे जैसे आगे बढ़ती है वैसे ही एक और किरदार मीनू का प्रवेश भी कहानी में होता है। मीनू कहानी में आकर किस तरह नैना का सोचने का नजरिया बदलती है यह देखना सुखद होता है।
कहानी की खास बात ये है कि लेखिका यहाँ कोई आदर्शवादी स्थति नहीं दर्शाती हैं। लेखिका जानती हैं कि बच्चे हैं तो चिढ़ना-चिढ़ाना तो चलता ही रहेगा। लोग बदलने वाले नहीं हैं लेकिन बदलाव हमें अपने में लाना होगा। हम रंग को लेकर जो असुरक्षा का भाव अपने बच्चों को देते हैं उससे हमें खुद ही उन्हें उभारने की ज़रूरत है। हम अगर रंग को लेकर बच्चों में हीन भावना नहीं भरेंगे तो वह भी अपने रंग को लेकर आश्वस्त रहेंगे और समाज के अन्य तत्वों द्वारा किया गया तंज उन पर असर नहीं डाल पाएगा। ऐसी परवरिश कैसे बच्चे को आत्मविश्वासी बना सकती है यह भी लेखिका मीनू के माध्यम से दर्शाने में सफल होती हैं।
कथा की भाषा सहज और सरल है जिससे बाल पाठकों के लिए यह रचना पठनीय बन पड़ी है। वहीं राजकुमार घोष द्वारा किया गया रंगीन चित्रांकन कहानी के आकर्षण को बढ़ा देता है।
अंत में यही कहूँगा कि ‘काली कलूटी जामुन’ एक महत्वपूर्ण विषय लिखी बाल कथा है। बाल पाठकों के साथ उनके अभिभावकों को भी यह पुस्तक पढ़नी चाहिए ताकि वह अनजाने में भी ऐसे काम न करे जिससे बच्चों के मन में अनावश्यक असुरक्षा का भाव जागृत हो। वहीं बच्चे को ये पढ़नी चाहिए ताकि वह नैना और मीनू के माध्यम से ये जान सके कि अगर ऐसी परिस्थिति उनके साथ उत्पन्न होती है तो उन्हें कैसे उस परिस्थिति का सामना करना चाहिए।
पुस्तक लिंक: अमेज़न
